दोस्तो, उत्तरकाशी के धराली में 25 फीट मलबे के नीचे दबे प्राचीन कल्प केदार मंदिर की तलाश शुरू हो गई है! मान्यता है कि इस मंदिर का इतिहास पांडवों के दौर से जुड़ा है। आखिर क्या मिलेगा मलबे के नीचे और क्या फिर सामने आएगा महादेव का ये प्राचीन धाम? देखिए आस्था, इतिहास और उम्मीद से जुड़ी ये खास रिपोर्ट। दोस्तो कहते हैं कि शिव ही सत्य है, शिव ही अनंत है और शिव को न तो कोई कुदरती आफत मिटा सकती है और न वक़्त का कोई थपेड़ा! देवभूमि उत्तराखंड के उत्तरकाशी से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जो विज्ञान और आस्था के अनोखे संगम को बयां करती है! पिछले साल 5 अगस्त को जब धराली की खीरगंगा नदी में प्रलयकारी बादल फटा था, तो वहां तबाही का ऐसा मंज़र दिखा जिसने केदारनाथ त्रासदी की यादें ताज़ा कर दी थीं। उस खौफनाक जल-प्रलय में धराली की पहचान, महाभारत कालीन प्राचीन कल्प केदार मंदिर करीब 25 फीट गहरे मलबे के महा-सागर में पूरी तरह विलीन हो गया था, लेकिन अब, पूरे 14 महीने बाद, जब आराध्य सोमेश्वर देवता की डोली ने हरी झंडी दी, तो नवरात्र के पावन मौके पर पोकलेन मशीनों के साथ महादेव को इस समाधि से बाहर निकालने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी है! क्या है इस रहस्यमयी मंदिर का पौराणिक इतिहास और क्यों यह बार-बार धरती में समा जाता है?
दोस्तो शारदीय नवरात्र के पहले दिन उत्तरकाशी के धराली में बजते ढोल-दमाऊ और गूंजते जयकारे इस बात के गवाह बने कि पहाड़ की आस्था को कभी दबाया नहीं जा सकता. पिछले साल आई विनाशकारी आपदा के बाद से ही कल्प केदार मंदिर समिति और ग्रामीण इस ऐतिहासिक धरोहर को खोजने के लिए व्याकुल थे। 5 अगस्त को आपदा की बरसी पर ग्रामीणों ने अपने आराध्य सोमेश्वर देवता की देवडोली से खुदाई की अनुमति मांगी थी. देवता के आदेशानुसार ठीक नवरात्र के पहले दिन भूमि-पूजन किया गया और जीपीएस (GPS) तकनीक की मदद से सटीक जगह की पहचान कर अब 25 फीट नीचे दबे मंदिर के अवशेषों को खोजने का काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया गया है। दोस्तो आखिर इस मंदिर को खोजने के लिए लोग इतने बेताब क्यों हैं? कल्प केदार मंदिर का इतिहास बेहद रहस्यमयी और अलौकिक है. केदारखंड के स्कंदपुराण में वर्णित यह मंदिर हूबहू केदारनाथ धाम के प्रतिरूप जैसा कत्यूरी शैली में बना हुआ है। इसका गर्भगृह धरातल से करीब 7 मीटर नीचे था और इसके अंदर स्थापित मुख्य शिवलिंग केदारनाथ की तरह ही नंदी की पीठ (बैल के कूबड़) जैसी आकृति वाला है. सबसे अद्भुत बात यह थी कि खीरगंगा का पवित्र जल स्वाभाविक रूप से हमेशा इस शिवलिंग को जलमग्न रखता था। पौराणिक काल में इस पावन संगम स्थल को ‘श्यामप्रयाग’ के नाम से पुकारा जाता था। दोस्तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,
महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव ब्रह्म हत्या और गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति के लिए केदारनाथ की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने इसी क्षेत्र में भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। और दोस्तो इधर स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, पांडवों ने यहाँ 240 छोटे-छोटे मंदिरों के एक विशाल समूह की स्थापना की थी, जिनमें ‘कल्प केदार’ सबसे मुख्य और भव्य धाम था। हालांकि दोस्तो समय के साथ आए भौगोलिक परिवर्तनों और आपदाओं के कारण अन्य मंदिर धीरे-धीरे इतिहास के गर्त में दफन हो गए, लेकिन कल्प केदार आज भी धराली की अस्मिता और पहचान के रूप में सीना ताने खड़ा था। दोस्तो हैरानी की बात यह है कि इतिहास में चौथी बार इस मंदिर को मलबे से खोदकर निकालने का प्रयास किया जा रहा है! साल 1803 के महा-भूकंप और बाढ़ में यह मंदिर पहली बार विलुप्त हुआ था। इसके बाद 1869 में ब्रिटिश फोटोग्राफर सामुअल ब्राउन ने यहाँ तीन मंदिरों की तस्वीरें ली थीं। साल 1926 की आपदा में मुख्य मंदिर फिर आधा ज़मीन में धंस गया, जिसे ग्रामीणों ने कड़े प्रयास से खोदा। बाद में 1945 और 1982 की बाढ़ में भी यह मंदिर बार-बार दफन होता रहा और हर बार आस्थावानों ने इसे ढूंढ निकाला। दोस्तो पिछले साल की आपदा में इसका ऊपरी गुंबद भी बिखर गया था, लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जीर्णोद्धार के वादे और ग्रामीणों के अटूट विश्वास ने एक बार फिर उम्मीदें जगा दी हैं। दोस्तो जमीन का सीना चीरकर पोकलेन मशीनें आगे बढ़ रही हैं और पूरा उत्तराखंड उम्मीद लगाए बैठा है कि जल्द ही कल्प केदार के कपाट एक बार फिर भक्तों के लिए खुलेंगे। कुदरत की मार पर भारी पड़ती इंसानी आस्था के इस महा-अभियान पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि इस पौराणिक धरोहर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाना चाहिए? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। इस गौरवशाली इतिहास और लाइव खोज की खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।