चमोली के सिमली से उठी आवाज अब देहरादून तक पहुंचने के लिए पैदल निकल पड़ी है! सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, पहाड़ के हजारों लोगों की जिंदगी और इलाज के अधिकार का है। 12 साल से अस्पताल की पूरी सुविधा का इंतजार, 50 से ज्यादा गांवों की नाराजगी और अब 2027 के चुनाव में वोट बहिष्कार की चेतावनी! आखिर सिमली के लोगों को अपना हक मांगने के लिए राजधानी तक पैदल मार्च क्यों करना पड़ रहा है? क्या सरकार इस महापदयात्रा के देहरादून पहुंचने से पहले जागेगी? दोस्तो कहावत है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं आती, लेकिन आज देखिए, पहाड़ के बुजुर्गों के घुटने और माताओं के पैरों के छाले अब सिस्टम की चूलें हिलाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं! इस खबर पर नेशनल मीडिया में कोई प्राइम-टाइम डिबेट नहीं होगी, कोई बड़ा न्यूज़ चैनल इसे अपनी हेडलाइन नहीं बनाएगा। लेकिन देवभूमि के चमोली जिले के सिमली में आज इतिहास लिखा जा रहा है! जहाँ 50 से अधिक गांवों की माताओं और आम जनता ने अपने हक के लिए पहाड़ों की संकरी और पथरीली सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी देहरादून के लिए पैदल ‘महा-पदयात्रा’ शुरू कर दी है! मांग कोई आलीशान महल या करोड़ों का पैकेज नहीं है, मांग सिर्फ इतनी है कि इलाज के अभाव में पहाड़ की कोई गर्भवती महिला या कोई बुजुर्ग दम न तोड़े। दोस्तो हाथों में हक की तख्तियां, होठों पर सिस्टम के खिलाफ आक्रोश और आंखों में एक उम्मीद का दीया।
चमोली जिले के कर्णप्रयाग-सिमली मार्ग पर शुरू हुआ यह सैलाब यह बताने के लिए काफी है कि पहाड़ की जनता का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है। ‘बेस अस्पताल संघर्ष समिति’ के बैनर तले, समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह नेगी और संयोजक देवेंद्र सिंह के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों ने मां चंडिका के पावन प्रांगण में महापंचायत की और फिर देहरादून के लिए कूच कर दिया। इस पदयात्रा का पहला पड़ाव ही 17 किलोमीटर दूर गौचर तय किया गया है। यह लड़ाई किसी नेता को कुर्सी पर बैठाने की नहीं, बल्कि पहाड़ की छाती पर बुनियादी इलाज की सहूलियत पाने की है। दोस्तो सिस्टम का क्रूर और भद्दा मज़ाक देखना हो, तो सिमली आकर देखिए। आज से ठीक 12 साल पहले यानी साल 2014 में यहाँ एक महिला अस्पताल का ढांचा खड़ा किया गया था। इमारत बनकर तैयार हो गई, लेकिन शासन-प्रशासन उसे एक पूर्ण और चालू बेस अस्पताल में तब्दील करना भूल गया। 12 साल बीत जाने के बाद भी यह अस्पताल महज़ एक आंशिक रेफरल सेंटर बना हुआ है. न यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, न जीवन रक्षक दवाएं और न ही आधुनिक मशीनें। हाल ही में थराली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक गर्भवती महिला को सिर्फ इसलिए हायर सेंटर रेफर कर दिया गया क्योंकि वहाँ गायनोलॉजिस्ट नहीं थी, और उस तड़पती मां ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया! ऐसी न जाने कितनी मौतें इन घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर रोज़ हो रही हैं, लेकिन हुक्मरान सोए हुए हैं।
दोस्तो पहाड़ की जनता ने अब ठान लिया है कि वो केवल कोरे आश्वासनों के भरोसे नहीं बैठेंगे। इस महा-आंदोलन से पहले संघर्ष समिति ने ‘गांव चलो, घर-घर चलो’ अभियान चलाया, जिसके तहत पिंडरघाटी, कर्णप्रयाग और गैरसैंण क्षेत्र के 50 से अधिक गांवों का दौरा किया गया। पहाड़ की रीढ़ कही जाने वाली महिला मंगल दलों ने इस आंदोलन को अपनी अस्मिता की लड़ाई बना लिया है। ग्रामीणों का सीधा और तीखा आरोप है कि स्थानीय विधायक अनिल नौटियाल ने 15 अगस्त तक इस अस्पताल के पूर्ण संचालन का शासनादेश जारी कराने का वादा किया था, लेकिन अगस्त बीता, सितंबर बीता और अक्टूबर आ गया, पर सरकार की फाइलें टस से मस नहीं हुईं। यही वजह है कि माताओं ने अब हुंकार भर दी है—‘अगर सिमली में पूर्ण बेस अस्पताल का शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में जनता पूरी तरह से पोलिंग बूथों का बहिष्कार करेगी! दोस्तो मांग बहुत मामूली और जायज़ है—’पहाड़ का इलाज, पहाड़ के पास’ जब मैदानों के बड़े-बड़े अस्पतालों में वीआईपी कल्चर के तहत इलाज की मलाई बांटी जाती है, तब हमारे उत्तराखंड के सीमांत जिले का एक आम नागरिक सिर्फ एक डॉक्टर की शक्ल देखने के लिए तरस जाता है। बीमारों को कंधों पर लादकर या लंबी रेंगती एम्बुलेंस में सैकड़ों किलोमीटर दूर ऋषिकेश या देहरादून के अस्पतालों की खाक छाननी पड़ती है। यह पदयात्रा देहरादून के वातानुकूलित कमरों में बैठे उन नीति-नियंताओं के चेहरे पर तमाचा है, जो केवल कागजों पर उत्तराखंड के विकास का ढिंढोरा पीटते हैं। यह भीड़, ये पैदल चलते पैर गवाही दे रहे हैं कि जब हुक्मरान बहरे हो जाते हैं, तो जनता को अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए सड़कों की धूल फाँकनी ही पड़ती है। दोस्तो पहाड़ की यह कराह और यह जन-आंदोलन देहरादून के सिंहासन तक पहुँचेगा और सरकार को इसका जवाब देना ही होगा। पर्यटन के लिए पहाड़ों में घूमने आने वाले करोड़ों सैलानी तो यहाँ की खूबसूरती देखते हैं, लेकिन क्या हमारी सरकार इन बुजुर्गों का यह दर्द देख पाएगी? इस बेहद गंभीर और सुलगते मुद्दे पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं। देवभूमि के इस बड़े हक की आवाज़ को दबाने मत दीजिए, इस वीडियो को ज़्यादा से ज़्यादा लाइक और शेयर करें।