दोस्तों, उत्तराखंड BJP ने राज्यसभा के लिए ऐसा नाम सामने रख दिया, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी!नरेश बंसल की जगह दिनेश आर्य के नाम पर मुहर। सवाल ये कि धामी-शाह के इस दांव में आखिर कितने निशाने हैं?दलित वोट बैंक से लेकर कुमाऊं की सियासत और शुद्धिकरण विवाद तक, क्या BJP ने एक ही चाल में विपक्ष के कई सवालों का जवाब दे दिया?आखिर कौन हैं दिनेश आर्य और क्यों बना ये नाम BJP का ‘साइलेंट कार्ड’? क्या आप दिनेश आर्य को को जानते हैं ये नाम आपने कितनी बार सुना है। शायद ज्यादातर लोग इस नाम से अंजान होंगे, लेकिन बीजेपी ने अचानक इस नाम को सीधे उच्च सदन के लिए तय कर दिया क्यों किया, क्या है इसके पीछे की रणनीति सब कुछ बताउंगा। देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर! उत्तराखंड से राज्यसभा की एक सीट खाली हो रही थी और दिल्ली से लेकर देहरादून तक बड़े-बड़े दिग्गजों की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। सब सोच रहे थे कि नरेश बंसल की जगह कौन सा बड़ा चेहरा संसद जाएगा? लेकिन रविवार को भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसा नाम आगे कर दिया, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को निरुत्तर कर दिया। नाम है— दिनेश आर्य! दिखने में यह एक सामान्य सा चयन लग सकता है, लेकिन राजनीति के चश्मे से देखें तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने एक ही तीर से कई बड़े निशाने साध लिए हैं। विपक्ष के ‘दलित कार्ड’ को फेल करने से लेकर कुमाऊं का किला फतह करने तक। क्या है बीजेपी का यह मास्टरस्ट्रोक?
दोस्तो अचानक सियासी गलियारों में एक नाम गूंजा और देखते ही देखते बड़े-बड़े दिग्गज रेस से बाहर हो गए। भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए उत्तराखंड से एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि के कार्यकर्ता दिनेश आर्य के नाम पर मुहर लगा दी है। इस फैसले ने न सिर्फ विपक्ष को हतप्रभ कर दिया है, बल्कि खुद बीजेपी के भीतर लॉबिंग कर रहे कई बड़े चेहरों के पैरों तले से जमीन खिसका दी है। लेकिन ठहरिए, यह फैसला जितना चौंकाने वाला है, इसके पीछे का चुनावी और सामाजिक गणित उतना ही गहरा है। चलिए दोस्तो क्रोनोलॉजी को समझते हैं कि आखिर दिनेश आर्य ही क्यों? उत्तराखंड की सियासत में करीब 19 प्रतिशत आबादी दलित यानी अनुसूचित जाति की है। यह वो वोट बैंक है जो सूबे में किसी की भी सरकार बना सकता है और किसी को भी सत्ता से बेदखल कर सकता है। दोस्तो बीते दिनों हल्द्वानी का तथाकथित ‘शुद्धिकरण विवाद’ पूरे देश की सुर्खियों में रहा। कांग्रेस और विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर संसद से सड़क तक बीजेपी को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोस्तो मगर बीजेपी ने इसका जो काट निकाला, उसकी उम्मीद कांग्रेस को भी नहीं थी। हल्द्वानी के ही रहने वाले और दलित समाज के वरिष्ठ चेहरा दिनेश आर्य को सीधे राज्यसभा भेजने का फैसला लेकर बीजेपी ने विपक्ष के बनाए पूरे नैरेटिव और आरोपों की धार को एक झटके में कुंद कर दिया है। दोस्तो निशाना सिर्फ सोशल इंजीनियरिंग पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन पर भी है। पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़े गवाह हैं कि गढ़वाल मंडल में बीजेपी ने एकतरफा और शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन कुमाऊं मंडल में पार्टी की पकड़ थोड़ी ढीली रही थी। दिनेश आर्य मूल रूप से कुमाऊं मंडल के हल्द्वानी से आते हैं।
दोस्तो ऐसे में उन्हें संसद के उच्च सदन में भेजकर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कुमाऊं के लोगों और खासकर वहां के दलित मतदाताओं को एक सीधा और मजबूत राजनीतिक संदेश दे दिया है कि सरकार में उनका प्रतिनिधित्व बेहद खास है। दोस्तो अक्सर यह माना जाता है कि राज्यसभा की सीटें बड़े चेहरों, पूर्व मंत्रियों या बड़े उद्योगपतियों की जेब में चली जाती हैं, लेकिन बीजेपी ने यहां भी एक अलग लकीर खींच दी है। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड के रहने वाले दिनेश आर्य एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से हैं, नैनीताल के जिलाध्यक्ष रहे हैं और मुख्यमंत्री के ओएसडी (जनसंपर्क अधिकारी) के तौर पर भी काम कर चुके हैं। वर्तमान में उत्तराखंड राज्यस्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष दिनेश आर्य को यह टिकट देकर पार्टी ने अपने लाखों कैडर्स को यह संदेश दिया है कि अगर आप जमीन पर पसीना बहाएंगे, तो आपका मूल्यांकन सीधे दिल्ली दरबार में होगा। दोस्तो इस फैसले से जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है। दोस्तो आगामी नवंबर महीने में मौजूदा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल खत्म हो रहा है। उत्तराखंड बीजेपी कोर कमेटी ने कई नाम दिल्ली भेजे थे, लेकिन सीएम धामी के परामर्श और अमित शाह-जेपी नड्डा की सहमति के बाद दिनेश आर्य के नाम पर अंतिम मुहर लगी। साफ है कि बीजेपी का यह ‘साइलेंट दलित कार्ड’ उत्तराखंड की राजनीति में दूरगामी असर डालने वाला है और विपक्ष के लिए इस चक्रव्यूह को भेदना अब आसान नहीं होगा। दोस्तो तो इसे कहते हैं धाकड़ और सोची-समझी राजनीति। जहां विपक्ष हल्द्वानी के विवाद को लेकर बीजेपी को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति बना रहा था, वहीं बीजेपी ने हल्द्वानी के ही एक दलित और जमीनी कार्यकर्ता को सीधे संसद का टिकट थमाकर विपक्ष की पूरी बिसात को ही पलट दिया है। अब देखना यह होगा कि कुमाऊं की धरती से उठने वाली दिनेश आर्य की यह गूंज आगामी चुनावों में बीजेपी की झोली में कितने प्रतिशत दलित वोटों की फसल काट कर लाती है।