दी हां दोस्तो 11 साल, 10 सत्र, सिर्फ 35 दिन, बाकी दिन देहरादून में ऐश? आखिर क्यों पहाड़ों की ठंडक में कांपते हैं ‘माननीयों’ के पैर? बेरोजगार युवा दर-दर भटक रहे, और नेता सिर्फ बजट चमका रहे!11 साल में सिर्फ 35 दिन सदन चला, तो सवाल उठना लाजिमी है— गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सपना आखिर कब पूरा होगा?बेरोजगारी, पलायन और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से जूझते पहाड़ को क्या सिर्फ दो दिन की सियासत से जवाब मिल जाएगा? या फिर इस बार भी माननीय लौट जाएंगे और पहाड़ के सवाल वहीं के वहीं रह जाएंगे?देखिए, गैरसैंण से उठते सवालों पर हमारी खास रिपोर्ट! दोस्तो त्तराखंड का वो सपना, जिसे आंदोलनकारियों ने अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी सपने के साथ लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में सरेआम भद्दा मजाक किया जा रहा है! आज से गैरसैंण के भराड़ीसैंण में उत्तराखंड विधानसभा का दो दिवसीय सत्र शुरू हो चुका है। लेकिन सवाल ये है कि क्या दो दिन में पहाड़ के नौजवानों की तकदीर बदल जाएगी? क्या दो दिन का ये सत्र उत्तराखंड के बेरोजगार युवाओं के घावों पर मरहम लगा पाएगा? दोस्तो करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर सिर्फ दो दिनों के लिए पहाड़ों की तरफ रुख करने वाली धामी सरकार आखिर युवाओं के रोजगार पर मौन क्यों है? और सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न— आखिर क्यों हमारे माननीयों के पैर इस पहाड़ की पवित्र माटी पर दो-चार दिनों से ज्यादा नहीं टिकते? इतिहास के पन्नों को खंगालते आंकड़े आज हुक्मरानों के चेहरों को बेनकाब करने के लिए काफी हैं।
दोस्तो जब उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, तो बुनियादी लड़ाई इस बात की थी कि पहाड़ का विकास पहाड़ से होगा, मैदानों से नहीं। लेकिन 27 अक्टूबर 2026 को शुरू हुआ यह विधानसभा सत्र यह साबित करने के लिए काफी है कि पहाड़ों को सिर्फ एक पर्यटन स्थल और मौज-मस्ती का जरिया समझ लिया गया है। सरकार 7 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनुपूरक बजट तो टेबल पर रखने जा रही है, लेकिन उत्तराखंड की वादियों में भटक रहे लाखों बेरोजगार युवाओं के हाथों को रोजगार देने के लिए इस दो दिवसीय सत्र में कोई कार्ययोजना नहीं है। दोस्तो कांग्रेस और विपक्षी दलों का सीधा आरोप है कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर राज्य की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। दो दिन में विधायकों के 400 से ज्यादा सवाल कैसे सुने जाएंगे? क्या यह जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है? आइए दोस्तो अब आपको वो आंकड़े दिखाते हैं, जिन्हें देखकर किसी भी पहाड़ी का खून खौल उठेगा। मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी रिकॉर्ड्स के अनुसार, पिछले 11 सालों में ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैंण) में सिर्फ 10 विधानसभा सत्र आयोजित किए गए हैं! और आपको जानकर हैरानी होगी कि इन 10 सत्रों को मिलाकर सरकारें पहाड़ों में सिर्फ 35 दिन ही बैठी हैं! यानी हर साल औसतन महज 3 दिन! और इसको कुछ ऐसे भी समझिए।
कांग्रेस शासन (3 सत्र), विजय बहुगुणा सरकार में महज 3 दिन और हरीश रावत सरकार में सिर्फ 4 दिन का सत्र चला। बीजेपी शासन (6 से अधिक सत्र) त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के समय सबसे लंबा 19 दिन का बजट सत्र रिकॉर्ड हुआ था, लेकिन उसके बाद धामी सरकार में सत्रों की अवधि सिमटकर 7 दिन और अब 2026 में आकर यह सिर्फ 2 दिन की रह गई है! अब OAMDLA सबसे कड़वा और चुभता हुआ सवाल— आखिर इन माननीयों के पैर गैरसैंण में टिकते क्यों नहीं हैं? क्या पहाड़ों की सर्द हवाएं इनके आलीशान ऐशो-आराम के बीच आ जाती हैं? असलियत यह है कि ब्यूरोक्रेसी से लेकर बड़े-बड़े नेताओं के परिवार, बच्चे और खुद वे खुद देहरादून, दिल्ली या अन्य मैदानी इलाकों के वातानुकूलित कमरों में रहते हैं। दोस्तो पहाड़ों में आकर हफ्तों बैठना, वहां की जनता के दुख-दर्द को करीब से देखना और बुनियादी समस्याओं पर नीतियां बनाना इन हुक्मरानों को एक ‘बोझ’ लगता है। यही वजह है कि सत्र शुरू होने से पहले की महत्वपूर्ण बैठकें भी गैरसैंण के बजाय देहरादून में निपटा ली जाती हैं। पहाड़ की जनता को सिर्फ कागजी राजधानी देकर बहलाया जा रहा है। दोस्तो अगर पहाड़ों में स्थाई राजधानी होती, तो आज गांव-गांव में स्कूल होते, रोजगार के साधन होते, पलायन रुकता और अस्पतालों की बदहाली दूर होती। लेकिन दो दिन की इस रस्म अदायगी से यह साफ हो गया है कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी आज भी सिर्फ नारों तक सीमित है। दोस्तो 35 दिनों की इस 11 साल की राजनीतिक नौटंकी पर अब पहाड़ का युवा जाग चुका है। देखना होगा कि दो दिन बाद जब ये माननीय वापस देहरादून की तरफ भागेंगे, तो पीछे पहाड़ के बेरोजगारों के लिए क्या छोड़कर जाते हैं— सिर्फ वादों का एक नया पुलिंदा या फिर हर बार की तरह एक और धोखा!