Adi Kailash 9,000 फीट पर गाड़ियों का सैलाब! | Pithoragarh | Tourism Pressure | Uttarakhand News

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दोस्तो, जिस सुकून की तलाश में लोग हजारों किलोमीटर दूर से पहाड़ों तक पहुंचते हैं, क्या वही भीड़ अब पहाड़ों के लिए मुसीबत बनती जा रही है?गाड़ियों की ऐसी कतार कि लोगों को चार-चार घंटे जाम में फंसना पड़ा!कहीं आदि कैलाश में गाड़ियों का सैलाब है, तो कहीं कैंची धाम के रास्ते पर ट्रैफिक का ऐसा दबाव कि कुछ किलोमीटर का सफर घंटों में पूरा हो रहा है।लेकिन सवाल सिर्फ जाम का नहीं है। क्या पहाड़ों की क्षमता से कहीं ज्यादा दबाव हम उन पर डाल रहे हैं?पर्यटन से रोजगार जरूरी है, विकास जरूरी है, लेकिन अगर विकास की रफ्तार में पहाड़ ही हांफने लगें, तो क्या हमें अपनी रफ्तार पर दोबारा सोचना नहीं चाहिए?आज बात उसी कड़वे सवाल की। क्या हम पहाड़ घूमने जा रहे हैं या अनजाने में पहाड़ों का दम घोंट रहे हैं? दोस्तो जिस शांति की तलाश में आप दिल्ली, नोएडा, चंडीगढ़ या मुंबई के कंक्रीट के जंगलों से भागकर पहाड़ों की ओर दौड़ते हैं। क्या आपको पता है कि आपकी गाड़ियों का वही शोर, वही धुआं और वही बेहिसाब भीड़ आज शांत पहाड़ों का दम घोंट रही है? एक कैंची धाम भी भीड़ जाम और दूसरे में ये आदी कैलाश का जी हां!

दोस्तो ये तस्वीरें किसी मेट्रो शहर के चौराहे की नहीं हैं, ये तस्वीरें हैं पहाड़ों पर पड़ रहे उस दबाव की जिसको समझ पाना शायद लोगों के बस की बात नहीं। जो सिर्फ खूमने और मौज मंत्री या फिर किसी धाम में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पहली तस्वीर अभी हाल में कैचीं धाम बाबा नीम करोली के धाम की है और दूसरी तस्वीर है 9,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित सीमांत क्षेत्र आदि कैलाश की! दोस्तो कैसी धाम पर खूब शोर हुआ है लेकिन अब तो हद हो रही है आदिकैलास जहां गाड़ियों की मील लंबी कतारें लगी हैं और लोग चार-चार घंटे तक जाम में बिलबिला रहे हैं। नैनीताल से कैंची धाम तक का हाल तो यह है कि हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री तक बाबा के दर्शन नहीं कर पाए! विकास हुआ, सड़कें बनीं, कनेक्टिविटी बढ़ी, लेकिन क्या इस कनेक्टिविटी की कीमत हम पहाड़ों की मौत से चुकाएंगे? आज बात सीधे और कड़वे सुलगते सवालों की, क्योंकि पहाड़ बोल नहीं सकते, वरना आज वो चीख पड़ते! दोस्तो पहाड़ों में सड़कें बेहतर हुईं, कनेक्टिविटी बढ़ी और दूर-दराज के दुर्गम इलाके लोगों की पहुंच में आए—यह विकास की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर है। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। जैसे ही कोई लंबा वीकेंड आता है, मैदानों से गाड़ियों का एक ऐसा सैलाब पहाड़ों की ओर उमड़ पड़ता है, मानो दिल्ली-एनसीआर की सड़कें उठकर हिमालय की गोद में आ गई हों। जहां तक सड़क जाती है, लोग अपनी गाड़ी ठूंस देना चाहते हैं। न जगह की क्षमता का ख्याल है, न पहाड़ की संवेदनशीलता का और न इस बात की फिक्र, कि जिस खूबसूरती को निहारने वे आए हैं।

वही खूबसूरती इस बेतहाशा दबाव से धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। सच कहें तो, हमारे पहाड़ अब हांफ रहे हैं! दोस्तो हजारों-लाखों गाड़ियों का भारी-भरकम वजन अपनी छाती पर ढोते पहाड़ों का कोना-कोना आज कराहता दिखाई देता है। संकरी सड़कों पर वाहनों की अंतहीन कतारें, पहाड़ों की वादियों में गूंजते लगातार तीखे हॉर्न, धुआं, धूल, प्लास्टिक और पर्यटकों की बेहिसाब हुड़दंगी भीड़—मानो ये शांत पहाड़ चीख-चीखकर हमसे कह रहे हों कि ‘अब बस करो। अब और बर्दाश्त नहीं होता अब झेला नहीं जाता।’ लेकिन अफसोस! इस कराह को, इस चीख को सुनने की फुर्सत आखिर किसके पास है? दोस्तो विड़ंबना देखिए, यहाँ आकर हमारा सिस्टम भी बेबस दिखाई देता है। जब भी पर्यावरण की खातिर पर्यटकों की संख्या को सीमित करने या गाड़ियों पर रोक लगाने की बात आती है, तो स्थानीय सरोकार सामने आ खड़ा होता है। होटल, टैक्सी, रेस्टोरेंट और पर्यटन पर निर्भर हजारों पहाड़ी परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल सिस्टम के हाथ बांध देता है। स्थानीय व्यवसायियों का दबाव अपनी जगह जायज है और पर्यावरण की तबाही की चिंता अपनी जगह। यही आज पहाड़ों की सबसे बड़ी विडंबना बन चुकी है—सड़कें बनीं ताकि पहाड़ दुनिया से जुड़ सकें, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि यही अनियंत्रित भीड़ एक दिन पहाड़ों का अस्तित्व ही मिटा दे। दोस्तो पर्यटन जरूरी है, पहाड़ों का रोजगार भी जरूरी है। लेकिन सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि क्या हर खूबसूरत और पवित्र जगह के गर्भगृह तक अपनी गाड़ियों का काफिला लेकर पहुंचना जरूरी है? शायद अब वह वक्त आ गया है जब हमें पहाड़ों को केवल एक कमर्शियल ‘पर्यटन स्थल’ या टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि एक जीवित और बेहद संवेदनशील इको-सिस्टम की तरह देखना होगा। पहाड़ बोल नहीं सकते, लेकिन ये चरमराती सड़कें उनकी तरफ से हमसे एक ही गुहार लगा रही हैं—’हमें देखने जरूर आओ, हमारे मेहमान बनो, लेकिन हमें इतना मत कुचलो कि हमारा सांस लेना ही मुश्किल हो जाए!