Kichha में BJP को झटका! क्या बदल रहा मूड?| Congress | BJP | Tilakraj Behad | Uttarakhand News

Spread the love

जी हां दोस्तो किच्छा में बीजेपी को झटका तो क्या बदल रहा है मूड या फिर और कुछ। किच्छा के नतीजों ने उत्तराखंड की सियासत में ऐसा सियासी धमाका किया कि BJP के दिग्गजों की रणनीति पर ही सवाल उठने लगे!सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खुली मतपेटियों से लेकर नतीजों तक। आखिर किच्छा के रण में ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस ने बाजी पलट दी?तिलकराज बेहड़ की जीत के बाद ‘छोटू-मोटू’ वाले तंज और ‘गुंडाराज’ के खिलाफ चेतावनी ने सियासी पारा और चढ़ा दिया है!अब सवाल सिर्फ किच्छा का नहीं—क्या ये 2027 के महा-मुकाबले से पहले उत्तराखंड के बदलते पॉलिटिकल मूड का ट्रेलर है? दोस्तो राजनीति में जब जनता ‘अहंकार’ का सूपड़ा साफ करने पर आती है, तो कोर्ट से लेकर सड़कों तक लड़ी गई हर साजिश धरी की धरी रह जाती है। उत्तराखंड के उधम सिंह नगर की सबसे हॉट सीट किच्छा नगर पालिका चुनाव के नतीजों ने देहरादून से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में एक ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसकी गूंज शांत होने का नाम नहीं ले रही है! दोस्तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 7 अक्टूबर को कड़ी सुरक्षा के बीच जब मतगणना हुई, तो जनता का जो मूड सामने आया उसने बीजेपी के बड़े-बड़े दिग्गजों को चारों खाने चित कर दिया। कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह की इस ऐतिहासिक जीत के बाद किच्छा के कद्दावर विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल ने ऐसा आक्रामक मोर्चा खोला है कि विरोधियों के खेमे में सन्नाटा पसर गया है! तिलकराज बेहड़ ने साफ कह दिया है कि ‘किच्छा को गुंडाराज और शराब का अड्डा नहीं बनने देंगे’।

वहीं राजकुमार ठुकराल ने दहाड़ते हुए कहा कि ‘ये छोटू-मोटू के मुंह पर करारा थप्पड़ है’। इस जीत के बाद किच्छा की सड़कों पर एक ही नारा गूंज रहा है— ‘ये तो अभी झांकी है, पूरा उत्तराखंड बाकी है!’ आखिर क्या है इस नारे का मतलब और क्या वाकई उत्तराखंड की जनता का मूड अब बदलने लगा है? दोस्तो देखा आपने कैसे जोश हाई कर दिया एक छोटे चुनाव ने दोस्तो ये महज़ एक नगर पालिका का चुनाव नहीं था, ये नाक की लड़ाई थी, साख की लड़ाई थी और सत्ता के रसूख की लड़ाई थी। जिस चुनाव को रोकने के लिए, वार्डों को अलग करने के लिए महीनों तक भारी बवाल का दौर चला, जहाँ मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, वहाँ 7 अक्टूबर को जब कड़ी सुरक्षा में मतपेटियां खुलीं, तो जनता ने एकतरफा फैसला कांग्रेस के हक में सुना दिया। कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा के संदीप अरोड़ा को मटियामेट करते हुए अध्यक्ष पद की कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन असली धमाका तो नतीजों के बाद हुआ है, जब दो बड़े सियासी सूरमाओं ने बीजेपी पर तीखे बाण छोड़ दिए। दोस्तो जीत के तुरंत बाद किच्छा के ताकतवर विधायक तिलकराज बेहड़ का बड़ा और बेहद आक्रामक बयान सामने आया। बेहड़ ने सीधे-सीधे क्षेत्र की कानून व्यवस्था और जनहित के मुद्दों को उठाते हुए चेतावनी दी कि “किच्छा को अब गुंडाराज और शराब का अड्डा नहीं बनने देंगे।” बेहड़ का यह इशारा साफ तौर पर उन ताकतों की तरफ था जो सत्ता के संरक्षण में इस सीमावर्ती क्षेत्र में अपना दबदबा बनाना चाहती थीं। बेहड़ ने साफ कर दिया कि जनता ने गुंडागर्दी और अव्यवस्था के खिलाफ वोट की चोट की है।

दोस्तो विवादों और अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए मशहूर पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल भी इस जीत के जश्न में पीछे नहीं रहे। ठुकराल ने इस परिणाम को उन लोगों के लिए करारा जवाब बताया जो चुनाव में अपनी ताकत और प्रभाव का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे थे। ठुकराल ने सीधे हमला बोलते हुए कहा कि “यह जीत उन छोटू-मोटू के मुंह पर करारा थप्पड़ है, जो खुद को किच्छा का भाग्य विधाता समझ रहे थे।” याद रहे कि चुनाव से पहले स्ट्रांग रूम की सुरक्षा को लेकर भी ठुकराल ने सीसीटीवी फुटेज की मांग करते हुए आरटीआई दाखिल की थी और धांधली की आशंका जताई थी। दोस्ोत अब बात उस नारे की, जो किच्छा से निकलकर पूरे देवभूमि में गूंज रहा है— “ये तो अभी झांकी है, पूरा उत्तराखंड बाकी है!” राजनीतिक पंडित इस एक नारे के पीछे उत्तराखंड के बदलते हुए सियासी मूड को देख रहे हैं। इस जीत का सीधा मतलब ये है कि अब धीरे-धीरे ही सही, उत्तराखंड का आम वोटर और जनता सत्ताधारी दल की नीतियों, स्थानीय निकायों में की जा रही मनमानी और बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी से तंग आकर विकल्प की तलाश करने लगी है। किच्छा और सिरौली कलां दोनों जगह कांग्रेस का परचम लहराना इस बात का साफ संकेत है कि बीजेपी का कैडर और उसकी चुनावी मशीनरी अब अजेय नहीं रही। दोस्तो किच्छा की ये जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी बूटी की तरह है। पार्टी के कार्यकर्ता अब इस जीत को 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देख रहे हैं। अगर स्थानीय मुद्दों पर जनता इसी तरह सत्ता के खिलाफ खड़ी होती रही, तो आगामी बड़े चुनाव में देहरादून के सिंहासन को बचाना बीजेपी के लिए एक लोहे के चने चबाने जैसा साबित होगा। दोस्तो किच्छा और सिरौली कलां के इन चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। विधायक तिलकराज बेहड़ और राजकुमार ठुकराल के बयानों ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस ‘थप्पड़’ और ‘झांकी’ के बाद बीजेपी अपनी रणनीति में क्या बदलाव करती है। आपको क्या लगता है? क्या वाकई उत्तराखंड का मूड बदल रहा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमें ज़रूर बताएं