दोस्तो धिक्कार है ऐसे सिस्टम पर! शर्म आनी चाहिए उन नेताओं और अफ़सरों को जो मंच पर खड़े होकर ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘चमकते उत्तराखंड’ का ढोल पीटते हैं! आज देवभूमि के पहाड़ों से आई इस खौफनाक तस्वीर को देखिए और अपनी आँखें खोलिए! एक गर्भवती महिला, जो असहनीय प्रसव पीड़ा से तड़प रही है, चीख रही है, लेकिन उसे ले जाने के लिए एम्बुलेंस तो छोड़िए, एक अदद पक्की सड़क तक नसीब नहीं है!जान हथेली पर रखकर, पत्थरों और खाइयों के बीच ये ग्रामीण इस बेबस माँ को कंधे पर लादकर 6 किलोमीटर तक पागलों की तरह दौड़ते हैं। लेकिन सिस्टम की क्रूरता का तमाचा देखिए— जब ये लोग लहू-लुहान होकर अस्पताल पहुँचते हैं, तो वहाँ इलाज करने वाला डॉक्टर ही गायब मिलता है! अस्पताल खाली, कुर्सियां खाली! क्या पहाड़ों में रहने वाले इंसान नहीं हैं? क्या हमारी माताओं-बहनों की ज़िंदगी का कोई मोल नहीं है? आज हम इस निकम्मे सिस्टम का चेहरा बेनकाब होगा, आखिर कब तक कंधों पर ढोई जाएगी पहाड़ की ज़िंदगी?! दोस्तो एक तरफ बड़े-बड़े शहरों में स्मार्ट सिटी और सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों से एक ऐसी दर्दनाक तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर आपकी आत्मा कांप जाएगी। एक महिला, जिसे असहनीय प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) हो रही है, उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस तो दूर, गाड़ी चलने लायक सड़क तक नहीं है। जिंदगी और मौत के बीच झूलती इस गर्भवती महिला को ग्रामीण कंधे पर लादकर 6 किलोमीटर तक खतरनाक पहाड़ियों पर दौड़ते हैं। लेकिन सिस्टम की क्रूरता देखिए, जब ये लोग जान हथेली पर रखकर अस्पताल पहुंचते हैं, तो वहां डॉक्टर ही गायब मिलते हैं! आखिर कब तक पहाड़ों की माताओं और बहनों को इस तरह मौत का जुआ खेलना पड़ेगा?
दोस्तो यह झकझोर देने वाली घटना उत्तराखंड के चमोली जिले के देवाल ब्लॉक के पिनाऊं गांव की है। गांव की रहने वाली एक आंगनबाड़ी कार्यकत्री खिमुली देवी को अचानक तेज प्रसव पीड़ा उठती है। घरवाले और ग्रामीण तुरंत मदद के लिए प्रशासन से गुहार लगाते हैं। विधायक और स्थानीय प्रशासन के प्रयासों से एक हेली एम्बुलेंस सेवा भेजने की तैयारी भी की जाती है। लेकिन पहाड़ का मौसम इस बेबस परिवार पर एक और सितम ढाता है। आसमान में विजिबिलिटी इतनी कम हो जाती है कि हेलीकॉप्टर आधे रास्ते से ही वापस लौट जाता है। दोस्तो शाम के साढ़े पांच बज चुके थे। विजिबिलिटी खत्म हो चुकी थी और हेलीकॉप्टर की उम्मीद टूट चुकी थी। इधर महिला की हालत लगातार बिगड़ रही थी। ऐसे में गांव के युवाओं और बुजुर्गों ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने पारंपरिक ‘डंडी-कंडी’ (लकड़ी और कुर्सी से बनी पालकी) तैयार की। महिला को उसपर बैठाया गया और चार ग्रामीणों ने उसे अपने कंधों पर उठा लिया। रास्ता इतना संकरा और खतरनाक था कि पैर फिसलते ही सीधे गहरी खाई थी। बारिश के कारण रास्ते की मिट्टी धंस रही थी, लेकिन ग्रामीणों के कदम थमे नहीं। वे एक गर्भवती को सुरक्षित सड़क तक पहुंचाने के लिए 6 किलोमीटर तक पैदल दौड़ते रहे। दोस्तो घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद ग्रामीण किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुंचे। वहां से गाड़ियों का इंतजाम किया गया और देर रात महिला को देवाल अस्पताल (पीएचसी) पहुंचाया गया। ग्रामीणों को लगा कि अस्पताल पहुंचते ही उनकी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी, लेकिन पहाड़ के इस बदहाल सिस्टम ने उन्हें एक और गहरा जख्म दिया।
अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि वहां कोई डॉक्टर मौजूद ही नहीं था! सोचिए, एक प्रसूता जो 6 किलोमीटर तक कंधे पर हिचकोले खाते हुए, जिंदगी और मौत से लड़कर अस्पताल पहुंची, उसे वहां प्राथमिक इलाज के लिए भी भटकना पड़ा। डॉक्टरों के न होने के कारण आनन-फानन में महिला को वहां से जिला अस्पताल बागेश्वर रेफर करना पड़ा।भाग 4: कब तक कंधों पर ढोई जाएगी जिंदगी? दोस्तो पिनाऊं गांव के ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उनका कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। आज देश को आजाद हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड के सैकड़ों गांवों के लोग आज भी एक अदद पक्की सड़क के लिए तरस रहे हैं। जब भी कोई बुजुर्ग बीमार होता है या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है, तो भगवान भरोसे ही उन्हें डंडी-कंडी या कुर्सी के सहारे सड़क तक लाना पड़ता है। कई बार तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम टूटने की खबरें सुर्खियां बनती हैं। दोस्तो चमोली की यह तस्वीर केवल एक प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि उन दावों पर करारा तमाचा है जो पहाड़ों में विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ग्रामीण आज भी पूछ रहे हैं— आखिर उनका यह सड़क का इंतजार कब खत्म होगा? कब पहाड़ों की माताओं को इलाज के लिए इस तरह ‘धक्के’ नहीं खाने पड़ेंगे? इस पूरी घटना और पहाड़ों की इस बदहाली पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि पहाड़ों में केवल पर्यटन का विकास हो रहा है, बुनियादी सुविधाओं का नहीं? हमें कमेंट कर जरूर बताएं। वीडियो को शेयर करें ताकि यह बात ज़िम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचे।