उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर, नंदा राजजात यात्रा अपने सबसे संवेदनशील और हृदयस्पर्शी मोड़ पर पहुंच गई है। यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड में हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में मां नंदा के मायके से विदाई का वह भावुक पल आया, जब चार सींगों वाला अनोखा चौसिंग्या खाड़ू अकेले ही निर्जन कैलाश पर्वत की ओर बढ़ गया। इस दौरान पूरा हिमालयी क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के उद्घोष और श्रद्धालुओं के आंसुओं से सराबोर हो गया। पहाड़ की जीवंत परंपरा में इस विदाई को एक बेटी की मायके से ससुराल की विदाई के रूप में देखा जाता है, जहां हर आंख नम और हर दिल मां की याद में भावुक नजर आया।
सैकड़ों किलोमीटर के अत्यंत दुर्गम, पथरीले और ऊंचे हिमालयी रास्तों की यात्रा में यह चौसिंग्या खाड़ू पूरी निष्ठा के साथ मां नंदा की डोली के आगे-आगे मार्गदर्शक बनकर चलता रहा। होमकुंड पहुंचने पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुरोहितों और भक्तों ने इसका विशेष पूजन किया, जिसके बाद उसकी पीठ पर सजी आभूषणों, स्थानीय पकवानों और धार्मिक भेंट की पोटली को उतारकर उसे आगे के सफर के लिए स्वतंत्र कर दिया गया। घने कोहरे, हाड़ कंपाने वाली ठंड और बर्फबारी के बीच, बिना किसी इंसानी सहारे के खाड़ू का अकेले रहस्यमयी कैलाश की ओर कदम बढ़ाना आस्था की उस अटूट पराकाष्ठा को दर्शाता है जो सदियों से उत्तराखंड की संस्कृति को बांधे हुए है।