दोस्तो, एक तरफ मां नंदा की भावुक विदाई और दूसरी तरफ 40 साल बाद मां नैणी के आगमन से गूंज उठा डूंग्री गांव!होमकुंड में महापूजा संपन्न हुई, तो नारायणबगड़ के डूंग्री में भक्तों को मिला मां नैणी का दिव्य दीदार।आखिर 40 साल बाद क्यों हुआ मां नैणी का आगमन? क्या है इस परंपरा की पूरी कहानी? देखिए देवभूमि के इस अद्भुत संयोग की पूरी कहानी। दोस्तो उत्तराखंड को यूं ही देवताओं की भूमि नहीं कहा जाता। यहाँ जब एक उत्सव का पर्दा गिरता है, तो दूसरे महा-उत्सव की बारात सज जाती है। अभी पूरा उत्तराखंड मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा के होमकुंड में संपन्न हुए महा-अनुष्ठान और आंसुओं से भरी विदाई की चर्चा कर ही रहा था, कि चमोली जिले से एक और अलौकिक खबर आ गई! लोग कंफ्यूज हैं कि एक तरफ मां विदा हो रही हैं, तो दूसरी तरफ ढोल-दमाऊं क्यों बज रहे हैं? असल में, जहाँ एक ओर लाडली नंदा कैलाश की ओर बढ़ गईं, वहीं दूसरी ओर ठीक 40 साल के लंबे इंतजार के बाद मां नैणी डूंगरी अपने भक्तों के आंगन में कदम रख चुकी हैं! आखिर क्या है इन दोनों यात्राओं का अलौकिक कनेक्शन? और क्यों इस दूसरी यात्रा के लिए भक्तों को चार दशक तड़पना पड़ा? बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो समुद्र तल से 13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित पवित्र होमकुंड गवाह बना उस पल का, जिसे देखने के लिए आंखें तरस जाती हैं।
मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा, जिसे देवभूमि की ‘बड़ी जात’ कहा जाता है, उसकी मुख्य पूजा होमकुंड में संपन्न हो गई। साक्षात देव-अवतरण के बीच चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया गया और मां की डोलियां नम आंखों से वापस लौट आईं। अब कुरुड़ मंदिर में इसका विधिवत समापन होना है, लेकिन भक्तों के बीच कंफ्यूजन तब पैदा हुआ जब सोशल मीडिया पर एक और मां की यात्रा के वीडियो वायरल होने लगे, लोग पूछने लगे कि नंदा की विदाई के तुरंत बाद ये कौन सी यात्रा शुरू हो गई है? दोस्तो इस कंफ्यूजन का जवाब छिपा है चमोली के ही नारायणबगड़ के डूंग्री गांव में। जहां मां नंदा मायके से ससुराल विदा हुईं, वहीं जेठूला बार-डूंग्री की आराध्य मां नैणी देवी (मां नागिनी) ठीक 40 साल बाद अपने मायके और भक्तों के बीच लौट आई हैं! जी हां, पूरे 39 साल के लंबे इंतजार के बाद डूंग्री गांव में मां नैणी की भव्य देवरा यानी क्षेत्र भ्रमण यात्रा का शंखनाद हो गया है। जैसे ही गांव में ‘घट उद्भव’ (पवित्र कलश की स्थापना) का अनुष्ठान पूरा हुआ, बूढ़े-बुजुर्गों से लेकर युवाओं की आंखें खुशी से छलक उठीं। जो बच्चे 40 साल पहले गोद में थे, आज वो खुद बाल-बच्चों वाले होकर मां के इस महा-उत्सव के साक्षी बन रहे हैं। दोस्तो अब सवाल यह है कि आखिर इस यात्रा में 40 साल का वक्त क्यों लगा? दरअसल, उत्तराखंड की लोक संस्कृति में कुछ देवरा यात्राएं बेहद कड़े धार्मिक नियमों, मन्नत पूरी होने और ‘देव आदेश’ (देवताओं की अनुमति) मिलने पर ही आयोजित होती हैं। मां नैणी डूंगरी की यह यात्रा अगले 6 महीनों तक लगातार चलेगी।
इन 6 महीनों में मां की डोली क्षेत्र के हर गांव, हर घर और इस इलाके की ब्याही गई बेटियों (ध्याणियों) के आंगन में जाएगी। इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए देश के कोने-कोने से प्रवासी उत्तराखंडी अपने गांवों की ओर दौड़ पड़े हैं। दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड का यही मिजाज इसे अद्भुत बनाता है। एक तरफ मां नंदा की ‘बड़ी जात’ अपने अंतिम पड़ाव कुरुड़ की ओर बढ़कर संपन्न हो रही है, जिससे विदाई का एक सन्नाटा है, तो दूसरी तरफ मां नैणी डूंगरी की डोली अगले 6 महीनों के लिए खुशियों की सौगात लेकर निकल पड़ी है। ये देवभूमि की आस्था ही है जो कभी खत्म नहीं होती, बस एक रूप से दूसरे रूप में चलती रहती है। दोस्तो हिमालय के शिखरों पर जहाँ मां नंदा की ऐतिहासिक राजजात (बड़ी जात) संपन्न हुई है, वहीं नारायणबगड़ की वादियों में मां नैणी डूंगरी का 40 साल बाद ऐतिहासिक स्वागत हो रहा है। आस्था के इस अलौकिक संगम को देखकर बस यही कहा जा सकता है— ‘धन्य है देवभूमि और धन्य है यहाँ की संस्कृति’। आपको हमारा यह विशेष पैकेज कैसा लगा, कमेंट में लिखकर जरूर बताएं और कमेंट बॉक्स में ‘जय मां नंदा, जय मां नैणी’ लिखना न भूलें।