चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड कांग्रेस में घमासान तेज हो गया है! हरीश रावत ने जनसंवाद यात्रा शुरू कर शक्ति प्रदर्शन किया, लेकिन इसी यात्रा से कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं की दूरी ने सियासी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर हरदा की यात्रा से इन नेताओं ने किनारा क्यों किया? क्या ये सिर्फ कार्यक्रम से दूरी है, या फिर कांग्रेस के भीतर बढ़ती खेमेबाजी का खुला संकेत? तो क्या दोस्तो चुनाव से ठीक पहले टूट की कगार पर जा पहुंची हैं उत्तराखंड कांग्रेस, ये सवाल आज क्यों हो रहा है वो बताउंगा मै आपको। दोस्तो सवाल तो की हैं जैसे क्या उत्तराखंड कांग्रेस विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आटत्महत्या करने की राह पर चल पड़ी है? क्या बीजेपी से दो-दो हाथ करने का दावा करने वाली कांग्रेस खुद के ही दो खेमों में बंटकर बिखरने वाली है? जी हां, इस वक्त की सबसे बड़ी और सनसनीखेज खबर उत्तराखंड के सियासी गलियारों से आ रही है! पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ ने उत्तराखंड कांग्रेस को बीच से फाड़ दिया है! दोस्तो आलाकमान चीखता रहा, प्रभारी कुमारी सैलजा मना करती रहीं, लेकिन ‘हरदा’ ने यात्रा नहीं रोकी। लेकिन असली झटका तो अब लगा है। कांग्रेस के भीतर का गृहयुद्ध अब खुलकर सड़कों पर आ गया है। इस यात्रा से उत्तराखंड कांग्रेस के दो सबसे दिग्गज नेताओं ने पूरी तरह दूरी बना ली है! पार्टी के भीतर अब ‘हम’ और ‘वो’ की दो समानांतर सरकारें चल रही हैं। क्या चुनाव से ऐन पहले यह सिरफुटौव्वल कांग्रेस की बची-कुची उम्मीदों पर पानी फेर देगी?
दोस्तो चुनाव सिर पर हैं, लेकिन उत्तराखंड कांग्रेस इस वक्त चुनावी मोड में नहीं, बल्कि ‘वर्चस्व की जंग’ में व्यस्त है! पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की जिद ने पार्टी के भीतर बारूद का वो ढेर लगा दिया है, जिसमें कभी भी ब्लास्ट हो सकता है। हरीश रावत की यात्रा जब हरिद्वार से होते हुए उधमसिंह नगर पहुंची, तो कांग्रेस के भीतर दो फाड़ की तस्वीर साफ हो गई। इस यात्रा में हरीश रावत के साथ पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और करीब आधा दर्जन विधायक तो कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखे, लेकिन पार्टी का एक बहुत बड़ा धड़ा इस शक्ति प्रदर्शन से पूरी तरह नदारद रहा। दोस्तो अब जरा उन चेहरों को देखिए जिन्होंने हरीश रावत की इस यात्रा को पूरी तरह अंगूठा दिखा दिया है। कांग्रेस के भीतर बने दूसरे सबसे बड़े खेमे के अगुआ हैं। इन दिग्गज नेताओं के साथ ही वो तमाम विधायक भी शामिल हैं, जिन्होंने हरदा की यात्रा से एक सोची-समझी रणनीति के तहत दूरी बना रखी है। साफ है कि उत्तराखंड कांग्रेस अब दो राजाओं के दो अलग-अलग दरबारों में तब्दील हो चुकी है, जहाँ एक गुट हरदा के साथ है, तो दूसरा गुट उनके खिलाफ लामबंद हो चुका है..दोस्तो दिलचस्प बात यह है कि इस यात्रा को रोकने के लिए दिल्ली से लेकर देहरादून तक पूरा जोर लगाया गया। उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने साफ-साफ शब्दों में पत्र लिखकर चेताया था कि चुनाव से पहले ऐसी कोई भी ‘निजी’ या समानांतर यात्रा कार्यकर्ताओं और जनता के बीच गुटबाजी का बेहद गलत संदेश पहुंचाएगी। राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी साफ किया था कि पार्टी किसी भी व्यक्तिगत अभियान को स्वीकार नहीं करेगी। लेकिन इसके बावजूद हरीश रावत ने अपने गुट के नेताओं को साथ लेकर यात्रा शुरू कर दी।
दोस्तो जब अपनों ने ही दूरी बनाई और दिल्ली से फटकार लगी, तो हरीश रावत ने अपनी ही पार्टी पर बेहद कड़ा पलटवार कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर यहाँ तक लिख दिया कि, “जब लंबे समय से संगठन का जमीन पर कोई अभियान दिख ही नहीं रहा है, तो मेरी यात्रा से आधिकारिक कार्यक्रम कैसे प्रभावित हो रहे हैं? दोस्तो कांग्रेस के इस आत्मघाती ड्रामे पर अब बीजेपी को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने तंज कसते हुए कहा है कि कांग्रेस की गुटबाजी और खेमेबाजी अब देवभूमि की जनता के सामने पूरी तरह नग्न हो चुकी है! दोस्तो इतिहास खुद को दोहरा रहा है। उत्तराखंड कांग्रेस का पुराना रोग फिर से हरा हो गया है। चुनाव जीतने की रणनीति बनाने के बजाय, कांग्रेस के ये सूरमा एक-दूसरे को नीचा दिखाने और अपना वजूद बचाने की जंग सड़कों पर लड़ रहे हैं। 7 और 8 अक्टूबर को हरीश रावत दिल्ली में आलाकमान के सामने पेश होने वाले हैं, लेकिन तब तक उत्तराखंड कांग्रेस की गुटबाजी का जो रायता सड़क पर फैल चुका है, क्या उसे दिल्ली दरबार समेट पाएगा? दोस्तो अगर सेनापति और मोहरे आपस में ही लड़ेंगे, तो चुनाव की वैतरणी कैसे पार होगी, यह कांग्रेस के थिंक-टैंक को सोचना होगा। इस गुटबाजी पर आपकी क्या राय है? क्या कांग्रेस चुनाव से पहले खुद ही अपनी लुटिया डुबो रही है? कमेंट बॉक्स में बताएं।