दोस्तो देहरादून में जहां विशेष सत्र शुरू होने से ठीक पहले विधानसभा गेट पर माहौल अचानक गर्मा गया। कि आखिर इतनी सुरक्षा के बीच भी ऐसा बड़ा हंगामा कैसे हो गया? गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को लेकर विरोध का तरीका भी चर्चा में है—किसानों की आवाज उठाने के लिए ट्रॉली में लदा गन्ना ही विधानसभा तक पहुंचा दिया गया। करीब ₹110 करोड़ के बकाया भुगतान का मुद्दा अब सड़क से सदन तक गूंज उठा वैसे मामला बड़ा लगता है। दोस्तो महिला आरक्षण पर बुलाए गए विशेष सत्र से पहले विधानसभा गेट पर उस वक्त हंगामा खड़ा हो गया, जब कांग्रेस विधायक वीरेन्द्र जाती ने गन्ने से भरी ट्रॉली पलटकर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान किसानों के बकाये भुगतान का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया। दोस्तो उत्तराखंड विधानसभा में नारी सम्मान और लोकतंत्र में महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा के लिए एक दिवसीय विशेष सत्र आयोजित किया गया, लेकिन सत्र शुरू होने से पहले ही विधानसभा परिसर के बाहर एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। कांग्रेस विधायक वीरेन्द्र जाती ने किसानों की समस्याओं को लेकर अनोखे अंदाज में विरोध दर्ज कराया। दोस्तो झबरेड़ा से विधायक वीरेन्द्र जाती गन्ने से लदी ट्रॉली लेकर विधानसभा पहुंचे और मुख्य गेट के बाहर ट्रॉली को पलट दिया। देखते ही देखते गन्ना सड़क पर फैल गया, जिससे कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। मौके पर मौजूद पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने तुरंत स्थिति को संभाला।
दोस्तो वीरेन्द्र जाती ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार से सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देना नहीं था, बल्कि किसानों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना था. उन्होंने कहा कि राज्य के गन्ना किसानों को लंबे समय से भुगतान नहीं मिल रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है। वहीं आपको ये बता दूं कि विधायक ने आरोप लगाया कि इकबालपुर शुगर मिल पर किसानों का लगभग 110 करोड़ रुपये बकाया है। बार-बार मांग उठाने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया, जिससे किसान परेशान हैं उन्होंने कहा कि जब तक किसानों का बकाया नहीं चुकाया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। इसके अलगावा ये कहा गया कि हमारा मकसद सुरक्षा तोड़ना नहीं है, बल्कि किसानों की आवाज़ उठाना है। इकबालपुर मिल पर करीब 110 करोड़ रुपये बकाया हैं, किसानों को उनका हक नहीं मिल रहा। मजबूरी में हमें इस तरह का विरोध करना पड़ रहा है, ताकि सरकार जागे और किसानों को उनका भुगतान मिले। द्सोत इस विरोध प्रदर्शन के चलते विधानसभा गेट पर कुछ समय के लिए आवागमन प्रभावित हुआ। पुलिस ने मौके पर अतिरिक्त बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया और ट्रॉली को हटाकर रास्ता साफ कराया। वहीं, विधानसभा के अंदर महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा चल रही थी, जबकि बाहर किसानों के मुद्दे ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया। विपक्ष ने इसे सरकार की नीतियों की विफलता बताया, जबकि सत्तापक्ष ने विरोध के इस तरीके पर सवाल उठाए। दोस्तो तो दोस्तो सवाल यही है कि जब विधानसभा के भीतर महिला आरक्षण जैसे अहम मुद्दे पर चर्चा चल रही थी, उसी वक्त बाहर किसानों का यह आक्रोशित प्रदर्शन क्या सरकार तक संदेश पहुंचाने का सही तरीका था, या फिर ये व्यवस्था को चुनौती देने वाला कदम था?क्या ₹110 करोड़ के बकाये की यह लड़ाई अब सिर्फ सड़कों पर ही सुनी जाएगी या फिर सरकार जल्द कोई ठोस कदम उठाएगी? और सबसे बड़ा सवाल—आखिर किसानों को बार-बार इस तरह के प्रदर्शन के लिए मजबूर क्यों होना पड़ रहा है?अब देखना होगा कि सरकार इस पूरे मामले को किस गंभीरता से लेती है और किसानों की समस्याओं का समाधान कब तक निकलता है।