Nainital कार में तड़पते रहा वकील, देरी पर सवाल! | Advocate Case | Justice | Uttarakhand News

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दोस्तो सरोवर नगरी नैनीताल, जहां कानून की आवाज़ गूंजती है, वहीं कलेक्ट्रेट पार्किंग में एक अधिवक्ता की मौत ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ कार के अंदर जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे वकील और दूसरी तरफ पत्नी लगातार मदद की गुहार लगाती रही तो क्या ये सिर्फ एक आत्महत्या का मामला है या फिर लापरवाही की एक दर्दनाक कहानी?क्यों मौके पर समय रहते मदद नहीं पहुंच सकी?क्यों इलाज से पहले जांच को प्राथमिकता दी गई? और हां क्या 3 घंटे की देरी ने किसी की जिंदगी छीन ली?आखिर क्या है इस पूरे केस की सच्चाई? मेरी रिपोर्ट मे। दोस्तो उत्तराखंड के नैनीताल में उस समय हड़कंप मच गया जब कलेक्ट्रेट पार्किंग क्षेत्र में खड़ी एक कार के अंदर अधिवक्ता पूरन सिंह भाकुनी का शव संदिग्ध अवस्था में मिला। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार उन्होंने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इस घटना से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। दोस्तो जानकारी के अनुसार कार पार्किंग में खड़ी थी। अचानक गोली चलने की आवाज सुनकर आसपास मौजूद लोगों का ध्यान उस ओर गया। जब लोगों ने कार के अंदर झांककर देखा तो अधिवक्ता गंभीर हालत में पाए गए। इसके बाद पार्किंग संचालक ने तुरंत अन्य अधिवक्ताओं और पुलिस को इसकी सूचना दी। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और कार का निरीक्षण किया। कार के अंदर अधिवक्ता का शव मिला। पुलिस को घटनास्थल से मृतक के हाथ में पिस्टल मिली, जबकि कार के आगे डैशबोर्ड से एक कथित सुसाइड नोट भी बरामद हुआ।

इसके बाद पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर आगे की कार्रवाई शुरू की। अब मै आपको बताता हूं कि सुसाइड नोट में क्या लिखा था?सुसाइड नोट में मृतक ने अपनी बीमारी और मानसिक तनाव (डिप्रेशन) का जिक्र किया है। बताया जा रहा है कि उसमें यह भी लिखा था कि वे अब जिंदगी का बोझ नहीं उठा पा रहे थे। साथ ही नोट में कुमाऊं आयुक्त, डीएम और एसएसपी से उनकी पत्नी का ख्याल रखने की अपील भी की गई है। उधर दोस्तो पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की गहन जांच शुरू कर दी है। घटनास्थल पर फोरेंसिक टीम को भी बुलाया गया, जो साक्ष्य जुटाने में लगी हुई है। पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच कर रही है ताकि घटना की सच्चाई सामने आ सके लेकिन इस बीच एक चौकाने वाली ये देखने को मिली जब मृतक वकील की पत्नि ने पुलिस कई आरोप लगा दिए। दोस्तो नैनीताल में हुई दर्दनाक घटना के बीच पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि घटना के बाद करीब तीन घंटे तक न तो अधिवक्ता को अस्पताल पहुंचाया गया और न ही मौके पर डॉक्टरों की टीम को तुरंत बुलाया गया। मृतक की पत्नी मौके पर मौजूद रहीं और लगातार अपने पति के इलाज की गुहार लगाती रहीं, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उनकी बातों को नजरअंदाज किया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हंगामे के बाद ही करीब दोपहर 2 बजे बीडी पांडे अस्पताल से एंबुलेंस मौके पर पहुंची। जिला अस्पताल के डॉक्टर कहना ये कि उन्हें घटना की सूचना लगभग दोपहर 1:30 बजे मिली, जिसके बाद वह मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक अधिवक्ता की मौत हो चुकी थी। दोस्तो जिला न्यायालय और कलेक्ट्रेट परिसर के पास हुई घटना के बाद अब अधिवक्ताओं में रोष देखने को मिल रहा है. बार एसोसिएशन का भी ये कहना कि सुबह करीब 9:30 बजे के बाद घटना हुई। पुलिस ने अपना फर्ज निभाते हुए घायल अवस्था में अधिवक्ता को अस्पताल ले जाना चाहिए था। मगर उन्होंने अधिवक्ता को अस्पताल ले जाने के बजाय घटनास्थल पर रखा और मृत घोषित कर दिया। जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़े करते हैं क्योंकि किसी को भी मृत घोषित करने का अधिकार पुलिस को नहीं, डॉक्टर को होता है। वहीं कुछ वकीलों का ये कहना है कि घटना में पुलिस का उदासीन रवैया देखने को मिला। जिला कोर्ट के अधिवक्ता द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम के बाद पुलिस देरी से पहुंची। साथ ही ना तो कोई डॉक्टर की टीम पहुंची ना ही उन्हें कोई प्राथमिक उपचार दिया गया। अस्पताल पहुंचाने के बजाय पुलिस फोरेंसिक टीम को बुलाकर घटना की जांच करती रही. सुभाष ने कहा जब तक पुलिस जांच कर रही थी, हो सकता है अधिवक्ता जीवित होते। तो दोस्तों, नैनीताल की इस घटना ने सिर्फ एक अधिवक्ता की मौत का मामला नहीं छोड़ा है, बल्कि कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब अब तक सिस्टम के पास भी नहीं दिखते।क्या वाकई समय पर मदद पहुंचती तो एक जिंदगी बचाई जा सकती थी?या फिर जांच और प्रक्रिया के बीच कहीं इंसानियत पीछे छूट गई?पत्नी की गुहार, मौके पर मौजूद लोग, और सिस्टम की देरी क्या ये सब सिर्फ एक संयोग था या फिर गंभीर लापरवाही?और सबसे बड़ा सवाल—क्या अब ऐसी घटनाओं से सबक लिया जाएगा या फिर एक और केस बनकर यह भी फाइलों में दब जाएगा? फिलहाल जांच जारी है।