दोस्तो जिस पूर्व सैनिक ने अपनी पूरी जिंदगी देश सेवा में खपा दी, जब वही बीमार पड़ा तो क्या उसे इलाज के लिए सड़क और सिस्टम की लड़ाई लड़नी पड़ेगी? क्या यही है हमारे वीर जवानों के सम्मान का सच? उत्तराखंड के पहाड़ों से सामने आई ये तस्वीर कई बड़े सवाल खड़े कर रही है। एक पूर्व सैनिक की तबीयत बिगड़ी, लेकिन गांव तक सड़क नहीं थी एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी और आखिरकार ग्रामीणों को खुद स्ट्रेचर बनाकर बीमार पूर्व सैनिक को कई किलोमीटर पैदल ढोकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा। सवाल ये है कि आखिर आज भी पहाड़ के गांव बुनियादी सुविधाओं से क्यों जूझ रहे हैं? और जो जवान कभी देश की सुरक्षा में खड़े रहे, क्या उनके लिए सिस्टम इतना भी नहीं कर पाया कि वक्त पर इलाज मिल सके? पूरी खबर मेरी इस रिपोर्ट में। दोस्तो मेने एक वीडियो देखा हाल में तब सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि आखिर कब तक ये सब देखने को मिलेगा ऐसी तस्वीरें जो अंदर तक झकझौर देती हैं। मै आपको पूरी खबर के साथ सवाल भी करूं उससे पहले उत्तराखंड के कई ग्रामीण पहाड़ी क्षेत्रों की नीयति बन चुकी। दोस्तो ऐसा कोई दिन शायद ही को ऐसी तस्वीरें मेरे आपके सामने नहीं आती हों लेकिन सवाल उठाने के अलावा मै कर भी क्या सकता हूं, लेकिन गुस्सा इस बात पर आता है कि उत्तराखंड को बने 25 साल हो गए और हमारी व्यवस्था जीते जी चार कंधों पर चल रही है। दोस्तो उत्तराखंड में डांडी-कांडी कोई नई बात नहीं है। पहाड़ के कई गांवों के लिए यह आज भी जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है। दोस्तो ये तस्वीर चमोली जिले के देवाल ब्लॉक के बालाण गांव की है, जहां ग्रामीणों ने 54 वर्षीय तुलसी देवी को इलाज के लिए करीब 3 किलोमीटर तक डांडी-कांडी के सहारे सड़क तक पहुंचाया।
दोस्तो आज भले ही ऐसे दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल होते हों, लेकिन उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में बीमारी, आपात स्थिति और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए यही व्यवस्था वर्षों से हकीकत बनी हुई है, सड़कें कागजों और घोषणाओं तक जरूर पहुंची है, लेकिन पहाड़ के कई गांव आज भी असली कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं अब कहूं ही क्या क्योकि इसके बाद वाली तस्वीर तो और हैरान करती है। दोस्तो उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई गांव सड़क सुविधा से वंचित हैं। ऐसे में बीमारी या आपात स्थिति के दौरान मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों को खुद उठानी पड़ती है। चमोली जनपद के देवाल विकासखंड के दूरस्थ पिनाऊ गांव में एक बार फिर ऐसी ही तस्वीर सामने आई है। यहां ग्रामीणों ने बीमार बुजुर्ग को खुद के संसाधनों से बनाए गए स्ट्रेचर पर कंधों में उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया। दरअसल, दोस्तो पिनाऊ गांव निवासी पूर्व सैनिक केसर सिंह, उम्र करीब 65 वर्ष, की अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव तक सड़क सुविधा न होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी जिसके बाद ग्रामीणों ने तत्काल लकड़ी और अन्य स्थानीय संसाधनों से स्ट्रेचर तैयार किया। इसके बाद दोस्तो मरीज को करीब 10 से 12 किलोमीटर कठिन पहाड़ी रास्तों से पैदल सड़क तक पहुंचाया फिर बीमार पूर्व सैनिक को अस्पताल ले जाया गया। इन तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह ग्रामीण जान जोखिम में डालकर मरीज को कंधों पर उठाकर दुर्गम रास्तों से गुजर रहे हैं। यह दृश्य सरकार के सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों की जमीनी हकीकत को भी उजागर करता है, सबसे बडी और चौकाने वाली बात देखिए क्या है। सड़क की फाइल 10 साल से शासन में लटकी है।
जी हां दोस्तो ये गांव पिनाऊ पूर्व विधायक स्वर्गीय शेर सिंह दानू का गांव है. उत्तर प्रदेश के समय से लेकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तक आज भी गांव सड़क सुविधा से वंचित है। उन्होंने कहा कि धुरा-धारकोट-बांक पिनाऊ मोटर मार्ग की फाइल पिछले करीब 10 वर्षों से शासन स्तर पर लंबित है। ग्रामीण लगातार शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सड़क निर्माण का कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया। दोस्तो स्थानीय लोग और स्थानीय नेता कहते हैं कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव तक पहुंचते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं। चुनाव जीतने के बाद गांव की समस्याओं को भुला दिया जाता है। सड़क सुविधा न होने से ग्रामीणों को हर दिन कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है. पिनाऊ गांव देवाल विकासखंड का सबसे दूरस्थ गांव माना जाता है, लेकिन आज तक यहां मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं और दोस्तो गौर करने वाली बात ये भी कि थराली विधानसभा सीट से बीजेपी के भूपाल राम टम्टा विधायक हैं। इन्हीं के विधानसभा क्षेत्र में देवाल ब्लॉक का पिनाऊ गांव आता है। सतपाल महाराज उत्तराखंड के पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर हैं, जिनके विभाग के जिम्मे सड़क बनाने का काम है, तो सवाल सिर्फ एक पूर्व सैनिक या एक गांव का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो आज भी पहाड़ के लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर रही है। उत्तराखंड राज्य बने 25 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां बीमार इंसान को अस्पताल पहुंचाने के लिए सड़क नहीं, बल्कि चार कंधों का सहारा लेना पड़ता है.सरकारें बदलती रहीं घोषणाएं होती रहीं, लेकिन पिनाऊ जैसे गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य और आपात सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक पहाड़ का दर्द सिर्फ वायरल वीडियो बनकर रह जाएगा और कब जमीन पर बदलाव दिखाई देगा?