दोस्तों ये इंसानों की नहीं, भेड़ों की आस्था है! उत्तरकाशी के जंगलों में सैकड़ों भेड़ें बिना किसी चरवाहे के आखिर किसके इशारे पर देव-परिक्रमा कर रही हैं? क्या ये महज एक परंपरा है या देवभूमि का सदियों पुराना रहस्य, जो आज भी लोगों को हैरान कर रहा है? 500 साल पुरानी इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी देखिए। दोस्तो आप भी दंग रह जाएंगे, दोस्तो जरा सोचिए। एक घना पहाड़ी जंगल, सामने भगवान सोमेश्वर की जलती धूप वाली डोली और उसके पीछे-पीछे बिना किसी रस्सी, बिना किसी चरवाहे के दौड़ता हुआ भेड़ों का एक रहस्यमयी झुंड! जैसे ही देवता का छत्र जमीन पर छूता है, ये बेजुबान जानवर खुद-ब-खुद परिक्रमा करने लगते हैं!दोस्तो आज आपको देवभूमि उत्तराखंड के एक ऐसे अनसुलझे रहस्य की ओर, जिसे देखकर विज्ञान भी हाथ जोड़ लेता है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हर तीसरे साल होने वाला ‘भेड़ों का थोलू’ कोई साधारण मेला नहीं है। क्या यह सिर्फ एक लोक-परंपरा है, या फिर इसके पीछे छिपा है द्वापर युग का वो रहस्य जिसका सीधा नाता भगवान श्रीकृष्ण, पांडवों और नाग पूजा से जुड़ता है? आखिर 4, 5 और 6 सितंबर को बोलियाधार के जंगलों में क्या हुआ? दोस्तो यह नजारा है उत्तराखंड के उत्तरकाशी का। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित हांडी जालन के बोलियाधार में जब इस साल 4, 5 और 6 सितंबर को सैकड़ों लोग इकट्ठा हुए, तो वजह थी 500 साल पुरानी एक ऐसी परंपरा जो इंसानी दिमाग को चकरा देती है। यहां पहाड़ की सदियों पुरानी पशुपालक संस्कृति और देवास्था का ऐसा मिलन होता है, जहां चरवाहा नहीं, बल्कि खुद अदृश्य दैवीय शक्ति भेड़ों के झुंड को हांकती है। जैसे ही देवता का छत्र आगे बढ़ता है, भेड़ें सम्मोहित होकर उसी दिशा में चलने लगती हैं। दोस्तो स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इस अद्भुत मेले की जड़ें द्वापर युग के उस दौर से जुड़ी हैं, जब भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के बाद पांडव स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की तरफ बढ़ रहे थे, लोकमान्यता कहती है कि पांडवों ने त्रियुगीनारायण में विश्राम किया था। उसी रात धर्मराज युधिष्ठिर को आकाशवाणी हुई कि यहां शिव मंदिर बनाया जाए। पांडवों ने मंदिर का निर्माण शुरू किया, लेकिन वह बार-बार धरती में धंस जाता था। तब महाबली भीम ने अपनी असीम शक्ति से उस मंदिर को ऊपर उठाया।
दोस्तो स्थानीय लोगों का विश्वास है कि आज भी मंदिर का जो हिस्सा थोड़ा तिरछा है, वो भीम के उसी पराक्रम की गवाही देता है। लेकिन दोस्तो इस कहानी का भेड़ों से क्या संबंध है? दरअसल, पहाड़ों के ये पशुपालक गर्मियों के मौसम में अपनी मवेशियों को लेकर मीलों दूर ऊंचे बुग्यालों में चले जाते हैं। वहां न कोई छत होती है, न कोई सुरक्षा। चारों तरफ खूंखार भेड़िए, भालू और जहरीले सांप होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं एक गोपालक थे, इसलिए चरवाहे उन्हें और नाग देवता को अपनी भेड़ों का रक्षक मानते हैं। मान्यता है कि बुग्यालों में इन भेड़ों की रक्षा स्वयं नागराज करते हैं। महीनों के इस जानलेवा सफर के बाद जब ये भेड़ें सुरक्षित लौटती हैं, तो देवभूमि के लोग इस ‘थोलू’ उत्सव के जरिए मन्नत पूरी होने का जश्न मनाते हैं। दोस्तो तीन दिनों तक चलने वाले इस कौथिक (मेले) में सबसे पहले सुरक्षित लौटीं भेड़ों की ऊन काटी जाती है। इसके बाद आखरी दिन होता है सबसे बड़ा चमत्कार—’देव मंडान’। देवता के पश्वा जब ढोल-दमाऊ की थाप पर थिरकते हैं, तो पूरा माहौल अलौकिक हो जाता है। भेड़-बकरियों को मंदिर और पवित्र स्थलों की परिक्रमा कराई जाती है, ताकि पूरे क्षेत्र में कोई बीमारी न फैले और समृद्धि बनी रहे। यह विज्ञान के दौर में आस्था की वो जीत है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। दोस्तों, देवभूमि उत्तराखंड को यूं ही चमत्कारों की धरती नहीं कहा जाता। जहां इंसान और प्रकृति के बीच का रिश्ता इतना गहरा है कि बेजुबान जानवर भी ईश्वर की चौखट को पहचानते हैं। उत्तरकाशी का यह भेड़ों का थोलू हमें सिखाता है कि जड़ें चाहे कितनी भी पुरानी हों, आस्था आज भी उतनी ही जीवंत है। इस अद्भुत रहस्य पर आपकी क्या सोच है? क्या आपने कभी ऐसा नजारा देखा है? कमेंट में हमें जरूर बताएं।