Pauri में बदला सियासी मिजाज? BJP का क्या होगा? ।NSUI । ABVP । Srinagar University। Uttarakhand News

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गढ़वाल के सियासत के सबसे बड़े गढ़ में केसरिया परचम धराशायी! क्या श्रीनगर और पौड़ी के इन चुनावी नतीजों ने उत्तराखंड की सत्ता के सिंहासन को हिला दिया है? एबीवीपी की ऐतिहासिक हार और ‘जेन-जी’ (Gen-Z) के बदले तेवरों ने क्या बता दिया है कि पहाड़ का युवा अब सरकार से आर-पार के मूड में है? Student Union Election Results देखिए हमारी यह खास रिपोर्ट, उत्तराखंड में छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने सियासी हलकों में हलचल जरूर बढ़ा दी है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के श्रीनगर बिड़ला कैंपस में ABVP को बड़ा झटका लगा, जबकि जय हो ग्रुप और NSUI ने कई अहम पदों पर जीत दर्ज की। पौड़ी के BGR कैंपस में भी NSUI का दबदबा देखने को मिला।इन नतीजों को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि पौड़ी जिले की सभी छह विधानसभा सीटों पर फिलहाल बीजेपी के विधायक हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले छात्र राजनीति के ये नतीजे राजनीतिक दलों के लिए एक संकेत के तौर पर देखे जा रहे हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या कॉलेजों में बदला छात्र राजनीति का मिजाज आने वाले विधानसभा चुनावों पर भी असर डालेगा? या फिर छात्रसंघ चुनाव को सिर्फ छात्र राजनीति तक ही सीमित माना जाना चाहिए?क्योंकि छात्र राजनीति और प्रदेश की चुनावी राजनीति अलग जरूर है, लेकिन जब राजनीतिक दल कैंपस में सक्रिय होते हैं तो दोनों के बीच की दूरी काफी कम हो जाती है। अब देखना होगा कि 2027 से पहले गढ़वाल के युवाओं का ये बदला मिजाज किस ओर इशारा करता है। दोस्तो हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति हमेशा से उत्तराखंड और खासकर गढ़वाल की मुख्यधारा की राजनीति का थर्मामीटर रही है। इस बार श्रीनगर परिसर में ‘जय हो’ छात्र संगठन के हिमांशु भंडारी ने अध्यक्ष पद पर भारी अंतर से जीत दर्ज की, तो वहीं पौड़ी परिसर में एनएलयूआई (NSUI) ने आयुष थपलियाल की अगुवाई में अध्यक्ष समेत प्रमुख पदों पर क्लीन स्वीप किया। यह सिर्फ छात्रसंघ के चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता के मजबूत किले में सेंधमारी है।

दोस्तो जिस पौड़ी और टिहरी बेल्ट को बीजेपी का सबसे सेफ जोन और अटूट किला माना जाता था, वहां के युवाओं का इस तरह एबीवीपी से विमुख होना पार्टी के लिए बड़ी चेतावनी है। जिन मंत्रियों और दिग्गजों के कंधों पर इस क्षेत्र की कमान है, उनके अपने घर के आंगन में छात्र राजनीति का यह रुख बताता है कि जमीनी स्तर पर पकड़ कमजोर हो रही है। दोस्तो गढ़वाल में पिछले कुछ समय से सरकार की नीतियों और व्यवस्था को लेकर एक अंदरूनी बेचैनी सुलग रही है। कई मुद्दों पर हुए आंदोलनों के बाद अब छात्र चुनावों में ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी का यह आक्रामक और बदलाववादी ट्रेंड साफ दिखने लगा है। यह युवा अब पारंपरिक नारों से आगे निकलकर सीधे कामकाज और रोजगार के सवालों पर जवाब मांग रहा है। दोस्तो अगर समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो यह छात्रसंघ चुनाव के नतीजे आने वाले बड़े राजनीतिक समीकरणों का ट्रेलर साबित हो सकते हैं। भाजपा को अपनी पुरानी रणनीतियों को दरकिनार कर नए सिरे से युवाओं के बीच पैठ बनाने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करना होगा। वरना पहाड़ की यह बयार सियासी समीकरणों को पूरी तरह पलट सकती है!