जी हां दोस्तो अपने उत्तराखंड में घर बचाओ, पेंशन पाओ, तो क्या घर-कुड़ी योजना से रुकेगा पलायन। ये सवाल इसलिए दोस्तो क्योंकि उत्तराखंड के खाली होते गांवों को आबाद करने के लिए हरीश रावत ने चला नया दांव! 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने ऐसा कौन सा पेंशन फॉर्मूला सामने रखा है, जिसकी चर्चा तेज हो गई है? नाम है ‘घर-कुड़ी पेंशन योजना’! पहाड़ में घर बचाने वाली महिलाओं को हर महीने पेंशन देने का वादा, क्या इससे रुकेगा पलायन? क्या बीजेपी की महिला योजनाओं को चुनौती देने की तैयारी है? या फिर चुनाव से पहले एक और बड़ा वादा? दोस्तो उत्तराखंड के वो पहाड़, जहाँ से रोजगार की तलाश में जवानी और इलाज की तलाश में बुढ़ापा लगातार नीचे मैदानों की तरफ भाग रहा है, क्या अब उन खाली होते गांवों को बचाने के लिए राजनीति में एक नया फॉर्मूला आ गया है? साल २०२७ के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है, और पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत ने एक ऐसा चुनावी मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है जिसने बीजेपी के खेमे में भी खलबली मचा दी है! रावत का साफ ऐलान है—अगर २०२७ में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो सूबे में ‘घर-कुड़ी पेंशन योजना’ लागू की जाएगी! आखिर क्या है इस योजना का पूरा सच? क्या यह सिर्फ एक चुनावी लॉलीपॉप है या पलायन को रोकने का असली इलाज? दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति को करीब से जानने वाले जानते हैं कि हरीश रावत हमेशा से ‘पहाड़, पानी और जवानी’ की बात करते आए हैं। अब उन्होंने सीधे तौर पर देवभूमि की क्षेत्रीय अस्मिता और संस्कृति को सहलाते हुए ‘घर-कुड़ी पेंशन योजना’ का वादा किया है। दरअसल, गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली में ‘कुड़ी’ का मतलब ‘लड़की’ नहीं, बल्कि ‘घर या मकान’ होता है। हरीश रावत ने साफ किया कि जो महिलाएं पहाड़ों में रहकर अपने पारंपरिक घरों को जिंदा रख रही हैं, अपनी ‘बाड़ी’ यानी घरेलू किचन गार्डन को आबाद रख रही हैं, उन्हें सीधे सरकार की तरफ से पेंशन के दायरे में लाया जाएगा। यानी अगर आप अपने गांव का घर छोड़कर शहर नहीं गईं, तो सरकार आपके इस जज्बे को सलाम करते हुए सीधे आपके खाते में हर महीने पेंशन भेजेगी! दोस्तो उत्तराखंड इस वक्त एक बेहद खतरनाक संकट से जूझ रहा है—और वो संकट है ‘पलायन’। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पहाड़ों के सैकड़ों गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें सरकारी भाषा में ‘घोस्ट विलेज’ या भूतिया गांव कहा जाता है। युवा शहरों की तरफ चले गए हैं और पीछे रह गई हैं पहाड़ की वो महिलाएं, जिन्हें उत्तराखंड की आर्थिकी की रीढ़ कहा जाता है।
दोस्तो हरीश रावत का यह दांव सीधे तौर पर उन्हीं महिलाओं को केंद्रित करता है। कांग्रेस का मानना है कि अगर गांव में रुकने का कोई आर्थिक फायदा महिलाओं को सीधा मिलने लगेगा, तो लोग अपने पुरखों के घर में ताला लगाने से पहले दस बार सोचेंगे। यह योजना सीधे तौर पर उस पहाड़ी आबादी को रोकने की कोशिश है जो अपनी माटी से जुड़े रहना चाहती है लेकिन मजबूरी में पलायन कर जाती है, लेकिन दोस्तो इस आक्रामक चुनावी दांव के पीछे की सियासी टाइमिंग को भी समझिए। भारतीय जनता पार्टी देश के तमाम राज्यों में ‘लाडली बहना’ जैसी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के दम पर चुनाव जीतती आ रही है। उत्तराखंड में भी बीजेपी महिला वोट बैंक के भरोसे बेहद मजबूत स्थिति में है। ऐसे में हरीश रावत ने बीजेपी के इस यूनिवर्सल कैश मॉडल को मात देने के लिए ‘लोकल पहाड़ी कार्ड’ खेला है। जहां बीजेपी की योजनाएं शहर और गांव दोनों के लिए समान हैं, वहीं रावत की ‘घर-कुड़ी योजना’ सिर्फ उन लोगों को ईनाम देगी जो पहाड़ों में टिके रहेंगे, पर सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या यह योजना सिर्फ वोट बटोरने का एक और चुनावी वादा है? क्या कांग्रेस के पास इस पेंशन को बांटने के लिए कोई वित्तीय खाका तैयार है, या फिर हर चुनाव की तरह यह भी एक हवा-हवाई घोषणा साबित होगी?दोस्तो हरीश रावत के इस ‘घर-कुड़ी’ वाले दांव ने 2027 की चुनावी जंग को बेहद दिलचस्प बना दिया है। देखना होगा कि बीजेपी इस क्षेत्रीय और भावुक दांव की क्या काट निकालती है। लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी अगर पहाड़ों के काम नहीं आई, तो ऐसी पेंशन योजनाएं भी सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह जाएंगी। इस योजना को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि इससे पलायन रुकेगा? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।