बर्फीली आफत से कैसे बची 29 जिंदगियां? | Uttarakhand News

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दोस्तो, उत्तराखंड के बर्फीले पहाड़ों में जिंदगी और मौत के बीच ऐसी जंग छिड़ी कि हर पल सांसें अटकी रहीं!ऑडेन कोल के माइनस डिग्री तापमान में फंसे 29 ट्रैकर्स को आखिरकार आसमानी रेस्क्यू के जरिए सुरक्षित निकाल लिया गया।लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि कालिंदी पास में रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी जारी है।ग्राउंड जीरो पर डीएम प्रशांत आर्य की निगरानी में पल-पल रणनीति बदल रही है। आखिर बर्फीले रण में क्या है अगली चुनौती? दोस्तो देवभूमि के सबसे दुर्गम और जानलेवा रास्तों से सबसे बड़ी और रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर आ रही है। ऑडेन कोल और कालिंदी पास, जहां हवाएं भी रास्ता भूल जाती हैं और तापमान हड्डियों को जमा देता है, वहां मौत को मात देकर 29 ट्रैकर्स को सुरक्षित बचा लिया गया है। भारतीय सेना, SDRF और NDRF के जवानों ने आसमान से उतरकर मौत के चंगुल से इन जिंदगियों को खींच निकाला है। हर्षिल हेलिपैड पर जब ये ट्रैकर्स उतरे, तो उनकी आंखों में जिंदगी वापस मिलने की खुशी साफ दिख रही थी। लेकिन चुनौती यहीं खत्म नहीं हुई है, कालिंदी पास में अभी भी रेस्क्यू की महाजंग जारी है। दोस्तो हिमालय की गगनचुंबी चोटियां, चारों तरफ सफेद मौत की चादर और हड्डियों को जमा देने वाली बर्फीली हवाएं। उत्तरकाशी का ऑडेन कोल क्षेत्र इस वक्त एक ऐसी ही खौफनाक जंग का गवाह बना, जहां 29 जिंदगियां मौत के मुहाने पर खड़ी थीं। लेकिन जब इरादे फौलादी हों, तो मौत को भी कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। देवभूमि उत्तराखंड के जांबाज जवानों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनके रहते कोई भी संकट भारी नहीं पड़ सकता। ऑडेन कोल क्षेत्र से सभी 29 ट्रैकर्स को सुरक्षित एयरलिफ्ट कर लिया गया है।

दोस्तो इन ट्रैकर्स को जब बेहद खराब मौसम के बीच हर्षिल हेलिपैड पर लाया गया, तो वहां जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात थीं। प्राथमिक उपचार के बाद जब डॉक्टरों ने इन्हें फिट घोषित किया, तब जाकर सिस्टम ने राहत की सांस ली। इस पूरे ऑपरेशन की कमान खुद जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने संभाल रखी थी। उन्होंने जमीनी मोर्चे पर डटकर न सिर्फ स्थिति का जायजा लिया, बल्कि हर एक ट्रैकर से बात कर उनका हौसला बढ़ाया। सुनिए इस बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन और आगे की रणनीति पर जिलाधिकारी प्रशांत आर्य का यह बड़ा बयान। जिलाधिकारी के इस बयान से साफ है कि प्रशासन किसी भी कीमत पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और एक-एक जिंदगी को सुरक्षित निकालना ही पहली प्राथमिकता है। लेकिन इस रेस्क्यू की असली और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी उन ट्रैकर्स की जुबानी सुनिए, जिन्होंने उस सफेद रेगिस्तान में मौत को बेहद करीब से देखा है। जब सांसें उखड़ने लगी थीं और उम्मीदें टूट रही थीं, तब सरकार के त्वरित एक्शन ने इन्हें कैसे नया जीवन दिया। दोस्तो ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो जज्बात हैं जो मौत के मुंह से बाहर निकलने के बाद आंसुओं और मुस्कान के साथ फूट पड़े हैं। इन जांबाज ट्रैकर्स ने उत्तराखंड सरकार और स्थानीय प्रशासन की इस रफ्तार को सलाम किया है।

लेकिन ध्यान रखिए, ऑडेन कोल की जंग भले ही फतह हो चुकी है, पर संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है। दोस्तो ऑडेन कोल में हेलिकॉप्टर की लैंडिंग ज़ोन (LZ) तैयार की जाती है। चुनौती अब और भी ज्यादा भीषण है, क्योंकि कालिंदी पास क्षेत्र में रेस्क्यू अभियान अब भी लगातार और पूरी आक्रामकता के साथ चलता बताया गया। दोस्तो कालिंदी पास, जो देश के सबसे कठिन और जानलेवा ट्रेक रूटों में से एक माना जाता है, वहां अभी भी हमारी रेस्क्यू टीमें मोर्चा संभाले हुए हैं। SDRF, NDRF, स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन की टीमें पल-पल की रणनीति बदलकर प्रकृति की मार को चुनौती दे रही हैं। खराब मौसम और दुर्गम भूगोल इस ऑपरेशन में लगातार विलन बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमारे जवानों का हौसला इस आसमान से भी ऊंचा है। उत्तरकाशी से लेकर देहरादून तक, सरकार की नजरें टिकी हुई हैं। लक्ष्य सिर्फ एक है, हर एक ट्रैकर को सुरक्षित वापस लाना और यह जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक आखिरी ट्रैकर सुरक्षित अपने घर नहीं पहुंच जाता।