उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में HIV संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हाल ही में सामने आई स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में कोरोना महामारी के बाद से नए संक्रमित मरीजों की पहचान में अप्रत्याशित तेजी आई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2002 से लेकर सितंबर 2026 तक जिले में कुल 400 लोग HIV पॉजिटिव चिह्नित किए जा चुके हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जिले में हर साल औसतन 10 से 15 नए HIV संक्रमित मरीज सामने आते थे। लेकिन हाल के वर्षों में यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो चुका है। अब जिले में प्रतिवर्ष 25 से अधिक नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि कोरोना काल के बाद जांच का दायरा बढ़ने और बड़े पैमाने पर प्रवासियों की वापसी के कारण छिपे हुए मामले भी अब स्क्रीन पर आ रहे हैं।
इस बार की रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू सामने आया है। कुल संक्रमितों में युवाओं के साथ-साथ 60 से 75 वर्ष की आयु वर्ग के करीब 35 बुजुर्ग भी शामिल हैं। हालांकि, संक्रमण का सबसे बड़ा हिस्सा कामकाजी और युवा आबादी में देखा जा रहा है, जो सीधे तौर पर जिले के भविष्य और आर्थिक ढांचे को प्रभावित कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय पुलिस की जांच में संक्रमण बढ़ने के पीछे कुछ नए और खतरनाक ट्रेंड्स सामने आए हैं: युवाओं में नशीले इंजेक्शनों का क्रेज तेजी से बढ़ा है। एक ही संक्रमित सिरिंज और सुई का कई युवाओं द्वारा आपस में साझा करना संक्रमण फैलने का एक बड़ा कारण बनकर उभरा है।
युवाओं में टैटू बनवाने का चलन बढ़ा है। स्थानीय स्तर पर बिना स्टरलाइज की गई सुइयों से टैटू बनाने के कारण भी अनजाने में लोग इस वायरस का शिकार हो रहे हैं। पारंपरिक कारणों में असुरक्षित यौन संबंध अभी भी जिले में वायरस के प्रसार की प्राथमिक वजह बना हुआ है। नशे और HIV के इस खतरनाक गठजोड़ को देखते हुए उत्तराखंड पुलिस ने जिले में ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि’ अभियान के तहत अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों पर पैनी नजर रख रही है, जबकि स्वास्थ्य विभाग दूरदराज के क्षेत्रों में जागरूकता शिविर आयोजित कर रहा है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, HIV अब कोई जानलेवा बीमारी नहीं रह गई है, बशर्ते इसका सही समय पर पता चल जाए। स्वास्थ्य विभाग ने जनता से अपील की है कि किसी भी संदिग्ध स्थिति या जोखिमपूर्ण व्यवहार के बाद बिना किसी सामाजिक डर के नजदीकी सरकारी अस्पताल या एआरटी सेंटर में जाकर मुफ्त जांच कराएं। एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी की मदद से संक्रमित व्यक्ति पूरी तरह सामान्य और लंबा जीवन जी सकता है।