Lokkalakar Pandavas का हक 21 महीने से क्यों अटका? । CM Dhami । National Games । Uttarakhand News

Spread the love

दोस्तो अपने उत्तराखंड में हाल में एक खबर खूब चर्चा रही, कि विज्ञापनों पर करोंड़ो रुपये खर्च कर दिए गए। देखा ही होगा आपने पूरा मामला लेकिन अब वो ही सिस्टम कह रहा है कि उत्तराखंड की तिजोरी देवभूमि की संस्कृति को विश्व पटल पर ले जाने वाले अपने ही पहाड़ी कलाकारों के भुगतान के वक्त खाली हैं तो क्यों हो जाती है? कौन है जिसने उत्तराखंड की शान पांडवास के हट पर डाका डाल रहा है। दोस्तो एक बेहद शर्मनाक और हैरान करने वाला सच आज उत्तराखंड की वादियों से चीख-चीख कर बाहर आ रहा है। 38वें राष्ट्रीय खेलों में देश के प्रधानमंत्री और सूबे के मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जिस ‘पांडवास’ बैंड ने अपनी कला का लोहा मनवाया, आज उस महाआयोजन को बीते 20 महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन इन कलाकारों का भुगतान आज भी अटका हुआ है! सवाल उठ रहा है कि क्या मंच से उत्तराखंड के स्वाभिमान यानी ‘भू-कानून’ और ‘मूल निवास’ का मुद्दा उठाना सरकार में बैटे जिम्मेदारों और उत्तराखंड के सिस्टम को इतना चुभ गया कि उसने कलाकारों का हक ही रोक दिया? क्या ये सरकार और सिस्टम का छोटापन है या फिर उत्तराखंड के अपने लोक कलाकारों को दोयम दर्जे का समझने का कोई पुराना सियासी खेल? दोस्तो ये जो चमक-दमक आप देख रहे हैं, ये जनवरी 2025 में देहरादून में शुरू हुए 38वें राष्ट्रीय खेलों की है, जहाँ उत्तराखंड के सबसे चहेते फोक-फ्यूजन बैंड ‘पांडवास’ ने पूरे देश से आए एथलीटों के सामने देवभूमि का डंका बजाया था। इस ऐतिहासिक खेल के लिए खेल विभाग को करीब ₹532 करोड़ का बजट मिला था, जो बाद में बढ़कर ₹742 करोड़ तक पहुंच गया। लेकिन दोस्तो अफ़सोस! खेल खत्म, खिलाड़ी घर लौट गए, अफसरशाहों की जेबें भर गईं, मगर 20 महीने बीतने के बाद भी पहाड़ की माटी के इन कलाकारों को उनकी मेहनत की पाई-पाई के लिए तरसाया जा रहा है।

दोस्तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वजह क्या है? पांडवास बैंड के फाउंडर सदस्य कुणाल के मुताबिक, उन्होंने राष्ट्रीय खेलों के लिए न सिर्फ ‘हल्ला धूम धड़क्का’ थीम सॉन्ग बनाया, बल्कि मशाल यात्रा से लेकर ओपनिंग सेरेमनी तक अपनी जान लगा दी। दोस्तो पांडवास को 13 जिलों में 13 लाइव शो करने थे, जिनमें से कई शो उन्होंने पूरे भी किए, लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इस प्रस्तुति के दौरान और मंच के माध्यम से उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दों—’भू-कानून’ और ‘मूल निवास’ की आवाज बुलंद करना सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ आकाओं को रास नहीं आया। अगर सचमुच इस जनसरोकार की प्रस्तुति की वजह से उनका भुगतान रोका गया है, तो यह उस सिस्टम की बेहद छोटी सोच को दर्शाता है जो दिन-रात उत्तराखंडियत का ढोंग रचती है। दोस्तो खेल मंत्रालय और दिल्ली की इवेंट कंपनी—दीपली एंटरटेनमेंट—एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। जब कलाकार खेल मंत्रालय के चक्कर काटते हैं, तो अफसरशाही आंखें मूंद लेती है, क्या यही है अपनी संस्कृति का सम्मान?

दोस्तो खेल सिर्फ पांडवास तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में यह एक स्थाई ‘सिंड्रोम’ बन चुका है। इसको कुछ इस तरह से समझिए। कई वरिष्ट पत्रकार और बुद्धजीवी कहते हैं कि जब भी उत्तराखंड में ‘औद्योगिक इन्वेस्टर्स समिट’, ‘पर्यटन महोत्सव’ या ‘सांस्कृतिक संध्या’ होती है, तो मुंबई और दिल्ली से आने वाले बड़े-बड़े बाहरी कलाकारों, बॉलीवुड सिंगर्स और रील्स बनाने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को बुलाने के लिए 20 लाख से लेकर 50-50 लाख रुपये तक की भारी-भरकम रकमें एडवांस में सीधे उनके खातों में ट्रांसफर कर दी जाती हैं! इतना ही नहीं दोस्तो उनके रुकने के लिए फाइव स्टार होटल और वीआईपी गाड़ियां चुटकियों में अरेंज हो जाती हैं, लेकिन जब बात उत्तराखंड के मूल निवासी, पारंपरिक हुड़का वादक, जौनसारी, गढ़वाली और कुमाऊंनी लोक कलाकारों की आती है, तो उन्हें महज चंद हजार रुपये के मानदेय के लिए भी 2-2 साल तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। हाल ही में देहरादून में लोक कलाकार संरक्षण संघ के बैनर तले सैकड़ों स्थानीय कलाकारों को अपने रुके हुए भुगतान और हक के लिए मुख्यमंत्री आवास की तरफ कूच करना पड़ा था!। वहीं दोस्तो मौजूदा वक्त में पाडवास का सीएम हेलपलाइन पर लिखे गए पत्र या कहूं मांगी गई मदद की चर्चा खूब है। हालांकि खबर ये है कि सीएम हेल्पलाइन से भी इन पानडवास पहाड़ी कलाकारों को कोई मदद नहीं मिली है। दोस्तो यह दोहरा रवैया सीधे-सीधे उत्तराखंड के स्वाभिमान पर चोट है। अपनी माटी के कलाकारों से जीएसटी वसूलने वाली सरकार बाहरी इवेंट कंपनियों पर मेहरबान क्यों है? आखिर क्यों संस्कृति का संरक्षण करने वाले लोक कलाकारों को भुखमरी और आर्थिक संकट के कगार पर धकेला जा रहा है? अगर पहाड़ की लोक विधाएं और कलाएं दम तोड़ देंगी, तो किस मुंह से उत्तराखंड को ‘सांस्कृतिक रूप से समृद्ध’ कहा जाएगा? और क्या इस अफसरशाही के मकड़जाल को तोड़े और दीपली एंटरटेनमेंट जैसी कंपनियों पर नकेल कसकर ‘पांडवास’ समेत तमाम लोक कलाकारों का भुगतान तुरंत बहाल किया जाएगा, कब किया जाएगा। आखिर अपनी ही धरती पर, अपने ही हक के लिए पहाड़ के बेटों का यह रोना इस व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है। आप क्या कहेंगे।