अपनी ही सरकार, फिर भी रो पड़े नेताजी!किच्छा चुनाव में आखिर ऐसा क्या हुआ?पहले ‘थप्पड़’ का बवाल फिर कैमरों के सामने छलके आंसू!ये सियासत है या रोज़-रोज़ का नया ड्रामा?थप्पड़ से आंसुओं तक किच्छा में पूरा सियासी तमाशा देखिए! मेरी इस रिपोर्ट में और यहां यहां लिखा है ये सियासत है या कोई डेली सोप ओपेरा। डेली सोप ओपेरा का मतलब ये कि कोई नया ड्राम जासा की आप सीरीयलस में देखते हैं। कोई नया मोड़ टाइप, तो हेलो फ्रेंड्स, वेलकम टू द न्यू ऐज पॉलिटिक्स! ये आज के जेन जी की भाषा है, लेकिन सियासत वैसी रही नहीं। दोस्तो जहाँ पावरफुल होना सिर्फ रैलियों तक सीमित नहीं है, अब ये ड्रामा और इमोशन्स का एक ऐसा कॉकटेल बन चुका है जो ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स को भी मात दे दे! उत्तराखंड का ऊधमसिंह नगर, जगह किच्छा। नगर पालिका चुनाव चल रहे हैं। लेकिन भाईसाहब, यहाँ जो स्क्रिप्ट चल रही है, उसे देखकर आज की जेनजी (GenZ) पीढ़ी बस एक ही बात कहेगी— ‘Bro, What is even happening?!’अपनी सरकार, अपना सिस्टम, लेकिन फिर भी कैमरे के सामने फूट-फूटकर रोना पड़ रहा है! एक तरफ बीजेपी के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला सिडकुल पुलिस चौकी में आँसू बहा रहे हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सिटिंग विधायक तिलकराज बेहड़ का दावा है कि उन्हें सरेआम थप्पड़ जड़ दिया गया!
दोनों बड़े नेता, दोनों की अपनी हनक, लेकिन दोनों कैमरे के सामने रो पड़े! क्या ये वाकई विक्टिम कार्ड खेलने की निंजा टेक्निक है या फिर अंदरूनी लाचारी? 22 सितंबर 2026 की ये तस्वीरें गवाह हैं कि किच्छा में लोकतंत्र के नाम पर क्या रायता फैला है। स्ट्रांग रूम की सुरक्षा और मतपेटियों पर पर्दा लगाने के मुद्दे को लेकर कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ धरने पर बैठते हैं। तभी एंट्री होती है बीजेपी के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की। और फिर? फिर शुरू होता है वो बवाल जो किसी भी एक्शन फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा है। दोनों पक्षों में जमकर नोकझोंक, धक्का-मुक्की और हाथापाई! लेकिन दोस्तो कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब दलबल के साथ बवाल काटने वाले नेताजी अचानक लाचार हो जाते हैं। राजेश शुक्ला का आरोप है कि कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने उनके साथ हाथापाई की और वो पुलिस चौकी में कैमरे के सामने रो पड़ते हैं। अब आज की युवा पीढ़ी सोचेगी— ‘बॉस, स्टेट में सरकार आपकी, पुलिस-प्रशासन आपका, फिर ये लाचारी वाले आँसू किसके लिए?’ क्या ये वाकई दिल टूटने वाले आँसू हैं या फिर सहानुभूति बटोरने की कोई क्रिंज रील पॉलिटिक्स? वहीं दोस्तो दूसरी तरफ हैं कांग्रेस के विधायक तिलकराज बेहड़, जिनके खिलाफ नारेबाजी ऐसी हो रही थी मानो वही सत्ता में बैठे हों… बेहड़ साहब का आरोप है कि राजेश शुक्ला के समर्थकों ने उन्हें थप्पड़ मारा है। वो भी भावुक दिखे और उनके समर्थन में अब पूरी कांग्रेस सड़कों पर उतरकर प्रशासन का पुतला फूंकने की तैयारी में है। मतलब कुल मिलाकर ये किच्छा का नगर पालिका चुनाव कम, एक ‘इमोशनल अत्याचार’ का अखाड़ा ज्यादा बन चुका है।
दोस्तो अब बात करते हैं उस युवा पीढ़ी की जो रील और रियल का फर्क अच्छे से समझती है। आज का यूथ इस ‘आँसू पॉलिटिक्स’ को किस तरह देखेगा? जेनजी के लिए यह कोई नई बात नहीं है, इसे वो कहेंगे ‘प्योर क्लॉट चेज़िंग’ (Clout Chasing)। जब नेताजी को लगता है कि लाठियों और नारों से बात नहीं बन रही, तो वो ‘क्राइंग कार्ड’ प्ले कर देते हैं। अपनी ही सरकार में एक पूर्व विधायक का इस कदर रोना, कहीं न कहीं लोकल लेवल पर सत्ता की कमजोर पकड़ या फिर अंदरूनी गुटबाजी का भी हिंट देता है। वहीं दोस्तो ताजा अपडेट यह है कि इस भारी बवाल और हंगामे के बाद पुलिस ने दोनों बड़े नेताओं को हिरासत में भी लिया था। फिलहाल, कोर्ट में मामला लंबित होने की वजह से मतगणना को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया गया है और स्ट्रांग रूम के बाहर भारी पुलिस फोर्स तैनात है, लेकिन जनता के बीच जो तमाशा होना था, वो तो हो चुका तो भाई लोग, किच्छा का यह सियासी ड्रामा हमें यह सिखाता है कि राजनीति में सिर्फ छाती ठोकना ही काफी नहीं है, कभी-कभी कैमरे के सामने ग्लिसरीन (या असली आँसू) भी काम आ जाते हैं। लेकिन आज का वोटर समझदार है। वो इन आंसुओं के पीछे छिपे वोटबैंक के गणित को अच्छे से समझता है। आपको क्या लगता है? क्या ये आँसू वाकई बेबसी के थे या चुनाव जीतने का आखिरी पैंतरा? कमेंट सेक्शन में अपनी राय जरूर बताएं