उत्तराखंड की सियासत का ‘रोना धोना’। Kichha । Tilak Raj Behad। Rajesh Shukla । Uttarakhand News

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दोस्तो, किच्छा के थप्पड़ कांड के बाद अब सियासत में एक और बड़ा ड्रामा सामने आया है! कैमरों के सामने पूर्व विधायक राजेश शुक्ला भावुक होकर रो पड़े और बोले—ऐसी गंदी राजनीति मैं नहीं करूंगा!आखिर किच्छा के चुनावी घमासान में अब ये नया मोड़ क्यों आया? थप्पड़ कांड के बाद आंसुओं की सियासत क्या संदेश दे रही है? क्या ये सिर्फ भावनाएं हैं या सियासी नैरेटिव बदलने की कोशिश?किच्छा से लेकर देहरादून तक गरमाई इस सियासत की पूरी कहानी देखिए। उत्तराखंड की मौजूदा सियासत का वो रंग है जो इससे पहले शायद ही आपने कभी देखा होगा। राजनीति में जब लाठियां कम पड़ जाती हैं, जब थप्पड़ का दांव उल्टा पड़ने लगता है, तो नेताओं का सबसे आखिरी और अचूक हथियार बाहर आता है— और वो हथियार है ‘आंसू’! जी हां, किच्छा नगर पालिका चुनाव का थप्पड़ कांड अब एक ऐसे ड्रामे में तब्दील हो चुका है, जिसे देखकर बॉलीवुड के स्क्रिप्ट राइटर भी शर्मा जाएं! एक तरफ 5 बार के कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें सरेआम थप्पड़ मारा गया, उनके समर्थकों पर पुलिस ने बर्बर लाठियां भांजीं। लेकिन इसके तुरंत बाद, दूसरी तरफ से एक ऐसा वीडियो आता है जो सोशल मीडिया पर आग लगा देता है। बीजेपी के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला मीडिया के कैमरों के सामने फूट-फूटकर रोने लगते हैं, सिसकियां भरने लगते हैं और कहते हैं कि— ‘राजनीति इतनी गंदी है तो मैं नहीं करूंगा!’ आखिर इन आंसुओं के पीछे की सियासी हकीकत क्या है? क्या ये सचमुच का दर्द है, या फिर साल 2027 के विधानसभा चुनाव की वो बिसात है जिसमें जनता के जज्बातों से खेलने की शुरुआत हो चुकी है? लग तो कुछ ऐसा ही रहा है। दोस्तो किच्छा की सियासत में मंगलवार को जो कुछ भी हुआ, उसने मर्यादा की धज्जियां उड़ा दीं। सुबह जहां स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने के आरोपों पर बवाल हुआ, समर्थकों पर लाठियां चलीं और दोनों बड़े नेताओं को हिरासत में लिया गया।

वहीं दोपहर होते-होते इस पूरी स्क्रिप्ट में एक नया इमोशनल एंगल जुड़ गया। हिरासत से बाहर आते ही पूर्व बीजेपी विधायक राजेश शुक्ला मीडिया के सामने आए, लेकिन इस बार उनके तेवर आक्रामक नहीं बल्कि बेहद भावुक थे। कैमरे ऑन होते ही शुक्ला फूट-फूटकर रोने लगे। सिसकियां भरते हुए उन्होंने कहा कि उनके राजनीतिक जीवन में आज तक ऐसा कीचड़ कभी नहीं उछाला गया। उन्होंने रोते हुए ऐलान कर दिया कि अगर राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है, तो वो ऐसी राजनीति से तौबा कर लेंगे। दोस्तो अब सवाल यह उठता है कि क्षेत्र का एक कद्दावर नेता, जो सालों से सत्ता और विपक्ष के बीच हर मोर्चे पर सीना ताने खड़ा रहा, वो अचानक कैमरों के सामने रोने क्यों लगा? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस थप्पड़ कांड के बाद किच्छा के बंगाली और स्थानीय मतदाताओं के बीच जो समीकरण बिगड़ रहे थे, उसे भांपते हुए यह एक सोची-समझी ‘सिमपैथी यानी सहानुभूति’ बटोरने की कोशिश हो सकती है, क्योंकि विधायक बेहड़ को थप्पड़ लगने के बाद कांग्रेस आक्रामक थी और बैकफुट पर आई बीजेपी को बचाने के लिए आंसुओं का यह दांव खेला गया। नेता जी के इन आंसुओं ने किच्छा के पूरे माहौल को थप्पड़ कांड से भटकाकर ‘भावुक ड्रामे’ की तरफ मोड़ दिया है। लेकिन इससे पहले तो कुछ ऐसे थे तेवर।

दोस्तो असल में यह पूरा का पूरा बवाल महज एक नगर पालिका या निकाय चुनाव का नहीं है। किच्छा की इस जमीन पर साल 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की बिसात आज ही से बिछा दी गई है। तिलक राज बेहड़ और राजेश शुक्ला के बीच की यह जंग बेहद पुरानी है। पिछले चुनाव की हार का बदला लेने और आने वाले चुनाव में अपनी गद्दी पक्की करने के लिए दोनों ही दल किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। यह थप्पड़, ये लाठीचार्ज, यह हंगामा और फिर ये घड़ियाली या असली आंसू— यह सब उसी बड़ी सियासी बिसात के मोहरे हैं, जिसके जरिए जनता को आने वाले चुनाव के लिए मोल्ड किया जा रहा है। ये तो सिर्फ ट्रेलर है, 2027 आते-आते देवभूमि की राजनीति में ऐसे कितने और ड्रामे देखने को मिलेंगे, इसका अंदाजा आज किच्छा की सड़कों को देखकर लगाया जा सकता है, लेकिन दोस्तो इस पूरे सियासी ड्रामे में सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ? नुकसान हुआ उन आम कार्यकर्ताओं का, उन समर्थकों का जिन्होंने अपने नेताओं की साख के लिए पुलिस की बेरहम लाठियां अपनी पीठ पर झेलीं। नेताजी तो रोकर, बयान देकर एसी गाड़ियों में बैठकर सुरक्षित अपने घरों को लौट गए, लेकिन जनता आज भी थप्पड़ और आंसुओं के इस कॉकटेल में उलझकर रह गई है। वाह नेता जी वाह! पहले सड़कों पर हंगामा, फिर विधायक को थप्पड़ का आरोप और जब खुद पर बात आई तो कैमरों के सामने आंसुओं की नदियां बहा दीं! किच्छा की जनता बहुत समझदार है, वो नेताओं के इन आंसुओं के पीछे छिपे ‘2027 के चुनावी लालच’ को बहुत अच्छी तरह समझ रही है। अब देखना यह है कि ये आंसू आगामी चुनाव में वोट बैंक की फसल काट पाते हैं या जनता इस बार नेताओं की इस ड्रामेबाजी को सिरे से नकार देती है। पूर्व विधायक के इन आंसुओं पर और किच्छा के इस बदले हुए माहौल पर आपका क्या सोचना है? क्या आपको लगता है कि यह सचमुच का दर्द है या सिर्फ 2027 की ड्रामेबाजी? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें। इस वीडियो को दबाकर शेयर करें।