दोस्तो, आपने देवी-देवताओं के मंदिर तो बहुत देखे होंगे, लेकिन क्या कभी ऐसा नज़ारा देखा है, जब एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों देवी-देवता खुद अपने भक्तों के बीच पहुंचते हैं? ढोल-नगाड़ों की गूंज, हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब और सजी हुई देव पालकियां, यहां दशहरा खत्म होने के बाद शुरू होता है आस्था का ऐसा अद्भुत उत्सव, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। आखिर क्या है इस अनोखी परंपरा का रहस्य? क्यों सैकड़ों देवी-देवता एक ही जगह पर जुटते हैं? और कैसे सदियों से चली आ रही ये परंपरा आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है? आइए देखते हैं, देवभूमि की इस अद्भुत देव-संस्कृति की पूरी कहानी! दोसतो क्या आपने कभी ऐसा सुना या देखा है कि पूरा देश जहां एक त्योहार को मनाकर शांत हो जाता है, वहीं इस धरती पर एक ऐसी जगह भी है जहां उस त्योहार का जश्न उसके बाद शुरू होता है? एक ऐसी रहस्यमयी और पवित्र घाटी, जहां इंसानों के बुलावे पर स्वर्ग से एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों देवी-देवता खुद धरती पर उतर आते हैं! जब ढोल-नगाड़ों की थाप पर पहाड़ों की चोटियां गूंज उठती हैं, तो रहस्य और रोमांच का एक ऐसा ताना-बाना बुनता है, जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया थमी की थमी रह जाती है। आखिर क्या है इस अद्भुत देव-मिलन का रहस्य? और क्यों यहां की परंपरा पूरी दुनिया से जुदा है? आइए आपको ले चलते हैं आस्था के उस समंदर में, जहां भगवान खुद रथ पर सवार होकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। दोस्तो देश के कोने-कोने में जैसे ही दशहरे का त्योहार खत्म होता है, इस पावन देवभूमि की वादियों में आस्था का एक नया सवेरा होता है। हवाओं में तैरती देव-वाद्यों की अलौकिक धुनें और चारों तरफ गूंजता ‘जय श्रीराम’ और ‘जय रघुनाथ’ का जयघोष! ये शुरुआत है उस ऐतिहासिक महाकुंभ की, जिसे दुनिया अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के नाम से जानती है। 376 से ज्यादा सालों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी सदियों पहले थी। जब राजा जगतसिंह ने अपना सारा राजपाट भगवान रघुनाथ के चरणों में सौंप दिया था, तब से शुरू हुआ यह सिलसिला आज एक वैश्विक उत्सव बन चुका है।
दोस्तो इस सात दिवसीय उत्सव का आगाज़ किसी चमत्कार से कम नहीं होता। घाटी के कोने-कोने से, दुर्गम पहाड़ों को पार कर 340 से ज्यादा देवी-देवता अपनी सुंदर पालकियों में सवार होकर ऐतिहासिक ढालपुर मैदान की तरफ बढ़ते हैं। मनाली की अधिष्ठात्री देवी मां हिडिंबा और बिजली महादेव जैसी दिव्य शक्तियां जब एक साथ इस मैदान में कदम रखती हैं, तो पूरा माहौल अलौकिक ऊर्जा से भर जाता है। हर देवता के साथ चलते हैं उनके कारदार, पुजारी और पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाते भक्त। दोस्तो उत्सव का सबसे मुख्य और रोमांचक पल होता है—भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा। लकड़ी से बने एक विशाल और नक्काशीदार रथ पर जब अधिष्ठात्री देव भगवान रघुनाथ विराजमान होते हैं, तो हजारों भक्त उस रथ की पवित्र रस्सी को छूने के लिए बेताब हो उठते हैं। माना जाता है कि इस रथ की रस्सी को खींचने मात्र से इंसान के सारे पाप धुल जाते हैं। शाम के वक्त जब यह रथ ढालपुर मैदान के रथ ग्राउंड पहुंचता है, तो आस्था का ऐसा समंदर उमड़ता है जिसे देखकर आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। दोस्तो लेकिन कुल्लू का यह दशहरा सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। बदलते वक्त के साथ इसने एक अंतरराष्ट्रीय रूप ले लिया है। इस साल उत्सव में आधुनिकता का तड़का भी लगा है, जहाँ आसमान में होने वाले शानदार लेज़र और ड्रोन शो भक्तों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विदेशों से आए सांस्कृतिक दल भी यहाँ अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। विदेशी सैलानी भी हिमाचली लोक धुनों पर झूमते और पारंपरिक नाटी नृत्य करते नजर आते हैं।
सुरक्षा के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस और सीसीटीवी कैमरों की पैनी नजर है, ताकि इस महाआयोजन में कोई खलल न पड़े। दोस्तो सात दिनों तक चलने वाला यह अनूठा मेला 27 अक्टूबर को लंका दहन की पारंपरिक रस्म के साथ संपन्न होगा। जब लंका दहन के बाद सभी देवी-देवता वापस अपने-अपने देवालयों की ओर लौटेंगे, तो भक्तों की आंखें नम हो जाएंगी। लेकिन यह भव्य विदाई अपने पीछे छोड़ जाएगी एक लंबा इंतजार और अटूट विश्वास कि अगले साल फिर ये वादियां देवताओं के स्वागत में सजेंगी। हिमाचल की यह समृद्ध देव-संस्कृति दुनिया को सिखाती है कि आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों और परंपराओं को कैसे सीने से लगाकर रखा जाता है। दोस्तो कुल्लू का यह अंतरराष्ट्रीय दशहरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानों और ईश्वर के बीच के उस अटूट रिश्ते का प्रमाण है जो सदियों से चला आ रहा है। तकनीक के इस दौर में भी जब सैकड़ों गांव के लोग अपने देवताओं को कंधों पर उठाकर मिलों दूर पैदल चलकर आते हैं, तो यह साबित होता है कि आस्था से बड़ा कोई विज्ञान नहीं है।