Dehradun पुलिस एनकाउंटर पर सवाल | Fake Encounter | Akram | Investigation | Uttarakhand News

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देहरादून में एक एनकाउंटर और अब उठ रहे हैं बड़े सवाल!अकरम एनकाउंटर पर सस्पेंस गहराता जा रहा है,और पुलिस की कार्रवाई अब जांच के घेरे में है।क्या ये एनकाउंटर असली था या कहानी कुछ और हैआखिर किन हालातों में हुई फायरिंग, और क्या सभी नियमों का पालन हुआ?क्यों मजिस्ट्रियल और पुलिस जांच के आदेश देने पड़े?सवालों के जाल में उलझी देहरादून पुलिस और सच क्या है, ये जानना अब बेहद जरूरी हो गया है। दोस्तो देहरादून में 30 अप्रैल को हुए कुख्यात अपराधी अकरम एनकाउंटर हुआ और इस मामले में बड़ा अपडेट सामने आया, तो हड़कंप मच गया। प्रेमनगर इलाके में पुलिस और आरोपियों की मुठभेड़ में मारे गए अपराधी अकरम को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। इस मामले में अब देहरादून डीएम सविन बंसल ने मजिस्ट्रियल और पुलिस जांच के आदेश दे दिए हैं। आपको बता दें कि आरोपी के परिजन ने भी मजिस्ट्रियल जांच की मांग की थी। दोस्तो अब सवाल सबसे बड़ा ये उठ रह है कि अकरम एनकाउंटर क्या फर्जी था अगर ऐसी कोई आशंका नहीं होती तो शायद इस बड़ी जांच के आदेश होते.. लेकिन जांच हो क्यों रही है। वो बताता हूं आपको राजधानी देहरादून से सटे प्रेमनगर के पौंधा जंगल में हुए अकरम एनकाउंटर के बाद पुलिस की कहानी अब कई सवालों में उलझती दिख रही है। जैसे-जैसे घटनाक्रम की परतें खुल रही हैं उनकी कड़ियां आपस में मेल नहीं खा रही हैं।

देहरादून से सटे प्रेमनगर के पौंधा जंगल में हुए अकरम एनकाउंटर पर सामने आई पुलिस की उलझी हुई कहानी और फिर डीएम के मजिस्ट्रियल जांच के आदेश ने उन सवालों को हवा दी है। जो मृतक का परिवार उठा रहा था। मृतक के परिजनों का कहना है कि एनकाउंटर करोड़ों की जमीन के लेनदेन के चलते हुआ है। दोस्तो एनकाउंटर केस में सबसे बड़ा सवाल तो यहीं है कि जिस अकरम को 30 अप्रैल को अदालत में पेश होना था तो फिर उसे पेशी से चंद घंटे पहले लूट जैसी वारदात को अंजाम देने की जरुरत क्यों पड़ी। दोस्तो इस एनकाउंटर कि पूरी कहानी में सबसे कमजोर कड़ी यही है कि क्यों अकरम ने ऐसी वारदात कर पुलिस का ध्यान अपनी ओर खींचा। उधर परिवार एनकाउंटर की वजह करोड़ों की जमीन बता रहा है। जिसका लेनदेन हो चुका था। दोस्तो इधर अकरम के परिवार के आरोपों के बाद देहरादून ज़िलाधिकारी संविन बंसल ने मामले मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए। हरिद्वार के सीओ सिटी मामले की जांच कर रहे हैं। वहीं घटना में शामिल अकरम के साथियों की धड़पकड़ के लिए पुलिस दबिश भी दे रही है यहां आपको ये भी बता दूं कि दोनों आरोपी अब तक पुलिस की गिरफ्त से फरार हैं। पुलिस अब तक ये साफ़ नहीं कर पाई है कि अकरम के साथ दोनों आरोपी कौन थे और वो उनके संपर्क में कैसे आया। उधर दोस्तो चर्चा में प्रेमनगर थाना प्रभारी नरेश राठौर से अकरम का पुराना संजोग भी आ चुका है।

दरअसल, साल 2014 में नकरौंदा के चर्चित अंकित थपलियाल हत्याकांड के बाद जब अकरम फरार हुआ तो उसे दून पुलिस ने 2017 में गुजरात से गिरफ्तार किया था। दोस्तो उस दौरान भी प्रेमनगर थाने की कमान नरेश राठौड़ संभाल रहे थे। राठौड़ गिरफ्तारी वाली टीम का भी हिस्सा थे। लगभग नौ साल बाद अकरम की उसी थाना क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई और इतेफाक देखिए कि इस समय भी राठौर ही प्रेमनगर थाने के प्रभारी हैं। थोड़ा इसपर भी गौर कीजिए अकरम केस में क्या हुआ था एक एक कर बताता हूं आपको पौंधा रोड पर पेट्रोल पंप कारोबारी से लूटपाट हुई। अकरम और उसके साथियों का पुलिस ने पीछा किया। जंगल में मुठभेड़ में अकरम मारा गया। अकरम के साथी मौका पाकर फरार हो गए। बहरहाल अब अकरम एनकाउंटर केस में देखना ये है कि मजिस्ट्रियल जांच से क्या कुछ निकल कर आता है। सीसीटीवी फुटेज, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अकरम की कॉल डिटेल कैसे टूटी हुई कड़ियों को जोड़ती है। दून के प्रेमनगर मुठभेड़ ने एक बार फिर राजधानी में अपराध और पुलिस कार्रवाई के बदलते स्वरूप को सामने ला दिया है। पिछले डेढ़-दो वर्षों में शहर और बाहरी इलाकों में जिस तरह लूट, हत्या, रंगदारी, कारोबारी विवाद, हथियारबंद गैंग गतिविधियां और बाहरी अपराधियों की सक्रियता बढ़ी है, उसी अनुपात में पुलिस और बदमाशों के बीच आमना-सामना भी बढ़ा है। अंतर केवल इतना रहा कि वर्ष 2009 के बाद पुलिस अधिकतर मामलों में आरोपितों को जिंदा पकड़ने की रणनीति अपनाती रही र ज्यादातर मुठभेड़ों में बदमाशों के पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तारी हुई। तीन जुलाई 2009 को रायपुर के लाडपुर क्षेत्र में गाजियाबाद निवासी रणबीर सिंह की मौत वाली मुठभेड़ के बाद पुलिस पर लंबे समय तक सवाल उठे। मामला फर्जी निकला और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच के बाद 17 पुलिसकर्मियों को सजा हुई, तो अकरम एनकाउंटर। अब सिर्फ एक पुलिस कहानी नहीं, बल्कि कई अनसुलझे सवालों का मामला बन चुका है।मजिस्ट्रियल जांच के आदेश के बाद अब सच सामने आने का इंतजार है।क्या जांच में साफ होगा कि एनकाउंटर सही था या इसमें कोई गड़बड़ी थी। क्या परिवार के लगाए गए जमीन विवाद वाले आरोपों में कोई दम है?और क्या इस बार भी कहीं ऐसा तो नहीं कि सच सामने आने में देर हो जाए?याद कीजिए, रणवीर एनकाउंटर भी जांच के बाद फर्जी साबित हुआ था। अब देखना होगा कि अकरम एनकाउंटर में सच्चाई क्या निकलकर सामने आती है—क्या पुलिस की कहानी सही साबित होगी, या फिर उठते सवालों को मिलेंगे नए जवाब?फिलहाल नजरें जांच पर टिकी हैं।