शांत बैठे ‘हरदा’ अचानक हुए एक्टिव? | Harish Rawat | Congress | Uttarakhand News

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दोस्तो, तीन महीने की खामोशी के बाद हरदा की उत्तराखंड वापसी ने सियासत में भूचाल क्यों ला दिया?नारसन से देहरादून तक उमड़ा समर्थकों का सैलाब आखिर क्या संकेत दे रहा है?शांत बैठे ‘पहाड़ के शेर’ अचानक एक्टिव क्यों हुए? क्या हरदा की इस हुंकार ने BJP खेमे की सियासी बेचैनी बढ़ा दी है? और क्या है कांग्रेस का हाल। दोस्तो उत्तराखंड की सियासत में जब-जब लगता है कि शांति है, तब-तब एक ऐसा सियासी भूचाल आता है जो सत्ता की कुर्सियों को हिलाकर रख देता है। कई महीनों से शांत बैठे, सोशल मीडिया पर सिर्फ कविताएं और यादें साझा कर रहे उत्तराखंड के सबसे कद्दावर और बुजुर्ग नेता हरीश रावत ने अचानक ऐसा गियर बदला है कि देहरादून से लेकर दिल्ली तक की राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। नारसन से लेकर रुड़की तक सड़कों पर उमड़ा यह जनसैलाब कोई आम हुजूम नहीं है, यह हरीश रावत की 2026 की वो सियासी बिसात है, जिसने बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। आखिर इस ‘धन्यवाद यात्रा’ के पीछे हरदा का असली मास्टरस्ट्रोक क्या है? दोस्तो इसे कहते हैं सियासत का ‘अल्टीमेट कमबैक’! जो विरोधी यह मानकर बैठे थे कि 70 पार के हरीश रावत अब थक चुके हैं, जो राजनीतिक पंडित हरदा को उत्तराखंड की राजनीति के इतिहास का पन्ना मान चुके थे, उन सबको हरीश रावत ने नारसन की धरती से एक ऐसा करारा जवाब दिया है जिसकी गूंज पूरे सूबे में सुनाई दे रही है। नारसन से रुड़की तक का हाइवे गाड़ियों के काफिले और समर्थकों के नारों से पट गया। कहने को तो यह सिर्फ कार्यकर्ताओं और जनता का आभार जताने के लिए एक ‘धन्यवाद यात्रा’ थी, लेकिन सड़कों पर उमड़ी यह भारी भीड़ गवाही दे रही है कि यह धन्यवाद कम और बीजेपी सरकार के खिलाफ एक खुला सियासी ‘वॉर डिक्लेरेशन’ यानी युद्ध का ऐलान ज्यादा है। सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर काफी दिनों से नेपथ्य में, यानी शांत बैठे हरदा अचानक इतने एक्टिव क्यों हो गए?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हरदा जानते हैं कि उत्तराखंड में इस समय जनता के भीतर सत्ता विरोधी लहर धीरे-धीरे सुलग रही है। अंकिता भंडारी केस से लेकर हालिया नंदा राजजात यात्रा में कुप्रबंधन और ग्रामीण संघर्ष के मुद्दों ने जनता को आंदोलित किया है। ऐसे में हरदा ने सही समय पर सही नस दबाई है, वो घर पर बैठकर ट्वीट करने वाले नेता नहीं हैं, वह जमीन पर उतरकर माहौल भांपने वाले राजनीति के वो चाणक्य हैं जिन्हें पता है कि जब लोहा गर्म हो, तभी हथौड़ा मारना चाहिए। दोस्तो अब समझिए कि हरदा के इस भव्य स्वागत के मायने क्या हैं और यह बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती है। हरीश रावत ने इस यात्रा के जरिए यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड कांग्रेस में आज भी जनबल के मामले में उनका कोई सानी नहीं है। बीजेपी जो अब तक कांग्रेस को गुटबाजी में उलझी हुई मानकर बेफिक्र बैठी थी, उसके लिए हरीश रावत की यह भीड़ एक वेक-अप कॉल है। हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में हरदा की ये पकड़ बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग के गणित को बिगाड़ सकती है। हरदा की सक्रियता का सीधा मतलब है कि बीजेपी को अब हर मोर्चे पर आक्रामक घेरने की तैयारी हो चुकी है। दोस्तो लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस के भीतर सब कुछ मैनेज हो जाएगा? उत्तराखंड कांग्रेस का इतिहास गुटबाजी से भरा रहा है। प्रीतम गुट हो या हरीश रावत गुट, हमेशा शह और मात का खेल चलता आया है। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग है। हरीश रावत ने अपनी इस यात्रा से हाईकमान को भी और अपने विरोधियों को भी साफ संदेश दे दिया है कि उत्तराखंड में कांग्रेस की नैया पार लगाने की ताकत आज भी उन्हीं के कंधों में है। जब जमीन पर इतनी बड़ी भीड़ किसी नेता के पीछे खड़ी हो, तो पार्टी के भीतर के विरोधियों को भी सरेंडर करना पड़ता है। हरदा ने यह दिखा दिया है कि कांग्रेस में गुटबाजी चाहे जितनी हो, जनता के बीच उनका चेहरा ही सबसे बड़ा ब्रांड है और चुनाव आते-आते बाकी कतरनें अपने आप मैनेज हो जाएंगी। दोसतो नारसन से शुरू हुआ हरदा का यह रथ रुड़की तक आते-आते उत्तराखंड की भावी राजनीति की नई इबारत लिख गया है। अब देखना यह होगा कि बीजेपी इस सियासी तूफान की क्या काट ढूंढती है और कांग्रेस के भीतर छिपे उनके धुर विरोधी इस जनसैलाब को देखकर अपनी रणनीति कैसे बदलते हैं। लेकिन आज क्या कहेंगे इस तस्वीर पर।