उत्तराखंड, वीरों की धरती जहां हर घर से एक सैनिक निकलने की परंपरा रही है और इसी धरती ने देश को दी—एक ऐसी रेजिमेंट जिसका नाम सुनते ही दुश्मन भी कांप उठता है गढ़वाल राइफल्स जिसे साहस, अनुशासन और अदम्य पराक्रम की मिसाल माना जाता हैआखिर क्यों कहा जाता है इसे देश की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक?क्या है वो जज़्बा जो इन्हें हर युद्ध में अडिग रखता है?चाहे विश्व युद्ध हो कारगिल की लड़ाई या सियाचिन की बर्फीली चोटियां। हर मोर्चे पर गढ़वाल राइफल्स ने अपने शौर्य का लोहा मनवाया है। 5 मई 1887 को हुई थी स्थापना और आज हैं वीर गथाएं हैं पूरी कहानी बताउंगा आपको अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो बद्री विशाल लाल की जय ये सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि उस आस्था और ताकत की पहचान है जो हर जवान के दिल में बसती है, जी हां दोस्तो आज में आपको बताउंगा साहस, बलिदान और पराक्रम की वो पूरी कहानी जो गढ़वाल राइफल्स को बनाती है—देश की सबसे दमदार रेजिमेंट्स में से एक। दोस्तो 5 मई 1887, एक तारीख जिसने भारतीय सेना के इतिहास में साहस और पराक्रम की एक अमिट गाथा लिखी।अल्मोड़ा की धरती से शुरू हुई गढ़वाल राइफल्स की यह यात्रा आज भी वीरता, अनुशासन और बलिदान की मिसाल बनी हुई है।विश्व युद्धों के रणक्षेत्र से लेकर। कारगिल की ऊंचाइयों और सियाचिन की बर्फीली चुनौतियों तक इस रेजिमेंट ने हर मोर्चे पर देश का मान बढ़ाया है। दोस्तो पहाड़ों से भी मजबूत हौसला, संमदर की लहरों को चीर देने की ताकत रखने वाले, दिन में 14 घंटे सिर्फ युद्धस्तर की तैयारी करने वाले, आंखों में उबाल मारता खून और देशभक्ति का कभी ना खत्म होने वाला जुनून, ये है गढ़वाल राइफल, जिसे देश की सबसे ताकतवर और तेज तर्रार सेना कहा जाता है। अफगान युद्ध में सूबेदार बलभद्र सिंह के साहस को देखकर तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल सर एफएस रॉबर्टस् ने कहा था कि एक कौम जो बलभद्र जैसा आदमी पैदा कर सकती है, उनकी अपनी अलग बटालयिन होनी ही चाहिए। 1887 में इसकी स्थापना हुई और 1892 में अधिकारिक तौर पर इसे गढ़वाल राइफल्स की उपाधि मिली।
इसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध और दूसरे विश्व युद्ध में इस राइफल के जवानों ने अपनी वीरता का परिचय दुनिया को दिया था। तबसे इन्हें वीर गढ़वाली कहा जाता है। दोस्तो 1941-42 में द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा पर लैंसडाउन में गढ़वाल राइफल्स की 7 नई बटालियन बनाई गई थी। इन सात बटालियनों ने ना जितने कितने वीरता पुरस्कार और सम्मान अपने नाम किए हैं। गढ़वाल राइफल को रॉयल रस्सी दी गई है, जिसे जवान अपने कंधे पर पहनते हैं। ये रस्सी वीरता. साहस और शौर्य का सूचक है। 1947 -48 में जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन, 1948 में टिथवाल का युद्ध, 1962 में भारत-चीन युद्ध, 1965 में भारत-पाक युद्ध, 1965 में ही सियालकोट सेक्टर में फिलौरा की लड़ाई, 1965 में ही बुटर डोगरांडी की लड़ाई, 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1971 में ही रायपुर क्रासिंग का युद्ध, 1984 में ऑप्रेशन ब्लू स्टार और इसके बाद करगिल के युद्ध में गढ़वाली वीरों ने अपनी हुंकार से दुश्मनों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.. जरा इस पर भी गौर कीजिए आजादी के बाद विभिन्न मोर्चों में रेजीमेंट को मिले पदक
- अशोक चक्र : 01
- महावीर चक्र : 04
- कीर्ति चक्र : 11
- वीर चक्र : 52
- शौर्य चक्र : 38
- सेना मेडल : 194
- मेंशन इन डिस्पैच : 107
दोस्तो ऐसे ना जाने कितने ही पल हैं जब इस गढ़वाल राइफल ने देश का सीना फक्र से ऊंचा किया है। हर बार अपनी हुंकार से ये जवान दुश्मन को रौंदकर आगे बढ़े। गढ़वाल राइफल को आज उसकी तेजी, फुर्ती और वीरता के लिए देश की सबसे ताकतवर राइफल्स में शुमार किया जाता है। ना जाने कितने ऐसे वीर इस राइफल ने देश को दिए, जो सीमा पर लड़ते लड़ते अपने प्राणों को न्यौछावर कर गए। हर बार दुश्मन के लिए ये और ज्यादा घातक बने। आज कहीं भी युद्ध छिड़ता है तो सबसे पहले गढ़वाल राइफल को सीमा पर भेजा जाता है। जिस रॉयल रस्सी को गढ़वाली सैनिक अपने कंधों पर पहनते हैं, वो उन्हें इनके साहस और ईमानदारी के लिए पुरस्कार स्वरूप प्रदान की गई थी। गढ़वाल के 53 क्षेत्रों के युवाओं को गढ़वाल राइफल्स में शामिल किया जाता है। आप भी दिल से सलामी दें गढ़वाल राइफल के इन वीर जवानों को कैसे 5 मई 1887 को शुरू हुई ये कहानी आज भी साहस, पराक्रम और बलिदान की मिसाल बनकर जिंदा है।गढ़वाल राइफल्स सिर्फ एक रेजिमेंट नहीं बल्कि वीरता की वो परंपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी देशभक्ति का जज़्बा जगाती आई है। विश्व युद्धों से लेकर कारगिल और सियाचिन तक हर मोर्चे पर इन वीर जवानों ने ये साबित किया है—कि जब बात देश की सुरक्षा की हो तो गढ़वाली सैनिक सबसे आगे खड़े होते हैं।उनकी हुंकार उनका जोश और “बद्री विशाल लाल की जय” का उद्घोष आज भी दुश्मनों के दिलों में डर पैदा कर देता है।ये वही वीर हैं। जो अपनी जान की परवाह किए बिना सीमा पर डटे रहते हैं ताकि हम सुरक्षित रह सकें।आज जरूरत है कि हम सिर्फ इनकी कहानियां ना सुनें बल्कि दिल से उनका सम्मान करें क्योंकि गढ़वाल राइफल्स सिर्फ उत्तराखंड का नहीं, पूरे देश का गर्व है जय हिंद!