उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास की क्या यही कीमत है? चमोली की विष्णुगाड़-पीपलकोटी टनल से जो तस्वीरें सामने आई हैं, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। 13 अगस्त की शाम करीब 7 बजे, जब पूरा देश अपने घरों में था, तब इस टनल के अंदर काम कर रहे मजदूरों पर अचानक पहाड़ टूट पड़ा। आधिकारिक तौर पर 7 श्रमिकों के हताहत होने की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 3 अब भी लापता हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा है या फिर सुरक्षा मानकों की वो अनदेखी, जिसने इतने परिवारों को कभी न भूलने वाला जख्म दे दिया है? आज व्यवस्था को इस पर जवाब देना होगा! यह घटना इतनी भयावह थी कि टनल के अंदर करीब डेढ़ किलोमीटर के हिस्से में सिर्फ पानी और जानलेवा दलदल भर गया। बिरही नदी के पास अचानक हुए इस भारी भूस्खलन ने अंदर काम कर रहे श्रमिकों को संभलने तक का मौका नहीं दिया। राहत की बात यह रही कि मुस्तैदी दिखाते हुए 19 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जिनका इलाज इस वक्त गोपेश्वर जिला अस्पताल और श्रीनगर बेस अस्पताल में चल रहा है। लेकिन हादसे के बाद की तस्वीरें डराने वाली हैं।
दोस्तो घटनास्थल पर चुनौती सिर्फ मलबे को हटाने की नहीं है, बल्कि टनल के अंदर जमा उस घुटनों तक गहरे कीचड़ की है जो रेस्क्यू टीमों के कदमों को आगे बढ़ने से रोक रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर हालात का जायजा ले रहे हैं। NDRF, SDRF और सेना के जवान अपनी जान हथेली पर रखकर उन 3 लापता जिंदगियों को तलाश रहे हैं, जिनकी सलामती के लिए पूरा देश दुआ कर रहा है। लेकिन दोस्तो इस पूरे मामले में बड़ी लापरवाही की बू आ रही है। स्थानीय लोगों और श्रमिकों का आरोप है कि टनल के अंदर लंबे समय से पानी का रिसाव हो रहा था, जिससे पहाड़ अंदर ही अंदर कमजोर हो चुका था। बिना किसी पुख्ता सेफ्टी ऑडिट और जियोलॉजिकल सर्वे के, संवेदनशील पहाड़ों के सीने को छलनी किया जा रहा था। याद रखिए, यह बेल्ट सिस्मिक ज़ोन-5 में आती है। साल 2023 का उत्तरकाशी सिल्क्यारा टनल हादसा हो, जोशीमठ का धंसाव हो या फिर अब चमोली का यह वाकया—प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। जब विकास की कीमत इंसानी जिंदगियों से चुकानी पड़े, तो उस प्रोजेक्ट की प्लानिंग पर दोबारा सोचने की सख्त जरूरत है। दोस्तो आज एक बार फिर उत्तराखंड में टनल को लेकर सवाल है। खैर इस पर किसी दूसरे वीडियो में बात तरुंगा, लेकिन दोस्तो ये सच है कि आज कई घर तबाह हो गए, कई परिवार उजड़ गए। सरकार ने हेल्पलाइन नंबर्स जारी कर दिए हैं और जांच की बात भी कही जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही है—आखिर कब तक उत्तराखंड की ये टनलें इसी तरह हादसों का केंद्र बनी रहेंगी? क्या इस बार जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई होगी, या फिर इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? चमोली हादसे से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट के लिए आप बने रहिए हमारे साथ। वीडियो को शेयर कीजिए और कमेंट में अपनी राय जरूर लिखिए।