कांग्रेस की न्याय यात्रा शुरू हुई, लेकिन पहले ही पड़ाव पर एकजुटता की जगह गुटबाजी की तस्वीर सामने आ गई! मंच पर हरक सिंह रावत और आर्येंद्र शर्मा के समर्थकों के बीच नारेबाजी, प्रीतम सिंह को संभालना पड़ा मोर्चा। सवाल है—जनता को न्याय दिलाने निकली कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ताओं को एक मंच पर क्यों नहीं रख पाई? क्या टिकट की दावेदारी ने अभी से पार्टी के भीतर तनाव बढ़ा दिया है? और जब चुनाव से पहले मंच पर ही ऐसी तस्वीर दिखे, तो कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल उठना लाजिमी है। देखिए, सेलाकुई की इस सियासी खींचतान की पूरी कहानी। दोस्तो सवाल बड़ा है कि जो पार्टी खुद को जोड़ने में नाकाम साबित हो रही है, क्या वो आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता की दहलीज तक पहुँच पाएगी? सवाल यह भी है कि राहुल गांधी की ‘मोहब्बत की दुकान’ का दावा करने वाली कांग्रेस के भीतर इतनी नफरत और गुटबाजी क्यों उबल रही है? दोस्तो उत्तराखंड के सेलाकुई से जो तस्वीरें सामने आई हैं, उसने पूरी कांग्रेस आलाकमान को कटघरे में खड़ा कर दिया है। देवभूमि की जनता को न्याय दिलाने के संकल्प के साथ शुरू हुई ‘उत्तराखंड न्याय यात्रा’ की शुरुआत ही महा-अन्याय और भारी कलह के साथ हुई है। वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह मंच पर मौजूद थे, लेकिन उनके ठीक सामने पार्टी के दो दिग्गज नेता—पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत और वरिष्ठ नेता आर्येंद्र शर्मा के समर्थक मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर आपस में भिड़ गए। मंच पर कब्जे और टिकट की दावेदारी को लेकर मचे इस घमासान ने कांग्रेस की अंदरूनी खेमेबाजी को सरेआम चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुक्यमत्री हरीश रावत क्या कहते हैं।
दोस्तो उत्तराखंड कांग्रेस में अंदरूनी कलह और खेमेबाजी का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। सहसपुर विधानसभा क्षेत्र के सेलाकुई में कांग्रेस की ‘उत्तराखंड न्याय यात्रा’ एकजुटता दिखाने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन यह गुटबाजी और वर्चस्व की जंग का अखाड़ा बन गई। जैसे ही पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत मंच पर पहुंचे, वैसे ही टिकट के दूसरे दावेदार आर्येंद्र शर्मा के समर्थक भड़क गए। दोनों गुटों के कार्यकर्ता मंच पर चढ़ गए और अपने-अपने नेताओं के समर्थन में आक्रामक नारेबाजी करने लगे। देखते ही देखते माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि कार्यक्रम में अफरा-तफरी मच गई। मंच पर मौजूद चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष और चकराता विधायक प्रीतम सिंह के सामने यह सारा तमाशा होता रहा। कार्यकर्ताओं को मर्यादा भूलते देख प्रीतम सिंह के पसीने छूट गए। उन्होंने खुद माइक संभाला और बेहद तल्ख लहजे में फटकार लगाते हुए पूछा—”अगर ऐसे ही आपस में लड़ते रहे, तो ऐसे कैसे जीतेगी कांग्रेस?” उन्होंने कार्यकर्ताओं को डांटते हुए साफ कहा कि नारे लगाने हैं तो कांग्रेस जिंदाबाद के लगाओ और सरकार के खिलाफ आवाज उठाओ, आपस में लड़कर जग हंसाई मत कराओ। प्रीतम सिंह के सख्त रुख के बाद जैसे-तैसे मामला शांत हुआ और यात्रा आगे बढ़ सकी।
दरअसल, दोस्तो इस पूरे ड्रामे के पीछे आगामी विधानसभा चुनाव के टिकट की होड़ है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आर्येंद्र शर्मा इस सीट से टिकट के पुराने तलबगार हैं, जबकि पिछले चुनाव से बाहर रहे हरक सिंह रावत की नजरें भी अब सहसपुर सीट पर टिकी हुई हैं। इसी गुटीय खींचतान और वर्चस्व की जंग ने न्याय यात्रा का कबाड़ा कर दिया। आज की स्थिति में कांग्रेस जनता के मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरने का दावा तो कर रही है, लेकिन उसकी अपनी ही नाव खेमेबाजी के भंवर में फंसी हुई है। अगर चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपनी इस ‘कलह यात्रा’ को नहीं रोका, तो देवभूमि की सत्ता में वापसी का उसका ख्वाब एक बार फिर चकनाचूर हो सकता है। सेलाकुई की इस घटना ने उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर तालमेल और गुटबाजी को लेकर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। न्याय यात्रा का मकसद सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरना है, लेकिन कार्यक्रम के दौरान हुई नारेबाजी ने पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को भी चर्चा में ला दिया। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व इस तरह के मतभेदों को समय रहते सुलझा पाएगा? हरक सिंह रावत और आर्येंद्र शर्मा के समर्थकों के बीच दिखी खींचतान का असर आगे भी दिखाई देगा या पार्टी एकजुट होकर जनता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगी? विधानसभा चुनाव से पहले इन सवालों के जवाब कांग्रेस की आगे की रणनीति के लिहाज से अहम होंगे।