Uttarakhand राजनीति में बड़ा ट्विस्ट! | Pauri | Dilip Singh Rawat | Protest | Uttarakhand News

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क्या आपने कभी ऐसा देखा है कि सरकार भी अपनी हो, विधायक भी उसी सरकार का हो लेकिन धरना अपनी ही सरकार के खिलाफ हो? उत्तराखंड के पौड़ी जिले के नैनीडांडा क्षेत्र से ऐसी ही तस्वीर सामने आई है। जहां बीजेपी विधायक ग्रामीणों के साथ सड़क पर दिखाई दिए और नारे भी सत्ता के खिलाफ खूब लगे। आखिर ऐसा क्या हुआ कि पहले कभी अपने इस्तीफे तक की पेशकश कर चुके विधायक ने अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाना बेहतर समझा। बताउंगा आपको उत्तराखंड की राजनीति में आए इस बड़े ट्विस्ट के बारे में। दोस्तो आगे में आपको बीजेपी के विधायक के बयान को दिखाउंगा उससे पहले मै आपको खबर बताता हूं। दोस्तो जैसा की आपने हाल के दिनों ये खूब देखा होगा कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली जानवरों के हमले से लोगों ने अपनी जान गवाई। कई लोग घायल हो गए। और कई जगह वन विभाग और सरकार के खिलाफ लोगों का गूस्सा भी खूब फूटा। दोस्तो ऐसा ही कुछ उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में नैनडांडा में हुआ। यहां बाघ के हमले में महिला की के जान गवाने के बाद लोगों में आक्रोष है। दोस्तो जहां नैनीडांडा क्षेत्र में गुलदार के हमले ने झकझोर कर रख दिया। वहीं ये घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि उन तमाम पहाड़ी इलाकों की चिंता बन गई है जहां आए दिन वन्यजीवों के हमले लोगों की जान ले रहे हैं। दोस्तो इसी घटना के बाद ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा, बड़ी संख्या में लोग धरने पर बैठ गए और वन विभाग के साथ-साथ सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। लंबे समय से क्षेत्र में गुलदार का आतंक बना हुआ है, लेकिन ठोस कार्रवाई अब तक दिखाई नहीं दी।

दोस्तो इसी धरने की सबसे बड़ी तस्वीर तब सामने आई जब लैंसडौन विधानसभा से बीजेपी विधायक दिलीप सिंह रावत भी प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंच गए और धरने पर बैठ गए। यानी दोस्तो सरकार भी बीजेपी की, विधायक भी बीजेपी का लेकिन विरोध अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली का दोस्तो इस धरनप्रदर्शन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और वन मंत्री सुबोध उनियाल के खिलाफ भी नारे लगाए गए। इससे साफ दिखाई दिया कि लोगों का गुस्सा अब केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सरकार से भी तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, हालांकि बीजेपी के विधायक दिलीप रावत सरकार विरोधी नारों को लगाने में बचते रहे, लेकिन उनके अगल बगल बैठे लोग उनको नारा लगाने के लिए कहते रहे। इस दौरान दोस्तो ज्ञापन में आदमखोर गुलदार को तत्काल पकड़ने, प्रभावित गांवों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने, वन विभाग की लगातार निगरानी सुनिश्चित करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी कार्ययोजना बनाने की मांग की गई। दोस्तो ग्रामीणों का कहना है कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई चाहिए। उनका आरोप है कि लगातार हो रहे हमलों के बावजूद वन विभाग समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठा पाया।

वहीं धरने को संबोधित करते हुए विधायक दिलीप सिंह रावत ने कहा कि क्षेत्र में बढ़ते वन्यजीव हमलों को लेकर वे बेहद गंभीर हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस पूरे मामले को सरकार और संबंधित विभागों के सामने मजबूती से उठाया जाएगा। साथ ही पीड़ित परिवार को हर संभव सहायता दिलाने का भी आश्वासन दिय। दोस्तो ऐसा नहीं दिलीप रावत ने पहली बार ऐसा कुछ किया है, जिससे बीजेपी और बीजेपी की उत्तराखंड में सरकार असहज हुई हो। इससे पहले जंगली जानवरों के हमलों को लेकर उन्होंने एक बार इस्तीफा देने तक की बात कर डाली थी यानि की जैसा समाधान स्थानीय लोग ग्रामीण या स्थानीय विधायक चाहते हैं वैसा समाधान या वैसी कर्रवाई नहीं हो रही है। लेकिन दोस्तो इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पहाड़ों में वन्यजीवों का बढ़ता आतंक अब प्रशासन के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है? क्या हर बड़ी घटना के बाद केवल मुआवजा और आश्वासन ही समाधान है? दोस्तो अगर सत्ता पक्ष का विधायक भी धरने पर बैठने को मजबूर है, तो क्या यह व्यवस्था की विफलता का संकेत है?क्या वन विभाग के पास ऐसे संवेदनशील इलाकों के लिए कोई प्रभावी और स्थायी रणनीति है? और हां दोस्तो क्या किसी और परिवार को अपनों को खोने के बाद ही व्यवस्था जागेगी? फिलहाल दोस्तो ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि जब तक आदमखोर गुलदार को नहीं पकड़ा जाता और इलाके में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। अब सभी की निगाहें सरकार और वन विभाग पर हैं। देखना होगा कि यह विरोध सिर्फ आश्वासनों तक सीमित रहता है या वास्तव में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं, क्योंकि सवाल सिर्फ एक गुलदार का नहीं, सवाल उन पहाड़ी परिवारों की सुरक्षा का है जो हर दिन डर के साये में जीने को मजबूर हैं।