दोस्तो, राजनीति भी बड़ी गजब चीज़ है। सरकार भी अपनी, केंद्र की सत्ता भी अपनी, लेकिन गुस्सा विपक्ष के दरवाज़े पर! देहरादून में कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। जहां बीजेपी कार्यकर्ता कांग्रेस भवन का घेराव करने निकल पड़े। अब सवाल ये नहीं कि विरोध क्यों हुआ। सवाल ये है कि जब सत्ता आपके हाथ में हो, तो सड़क पर संघर्ष किससे और किसलिए? कहावत है—घर की चाबी जेब में और तलाश पड़ोसी के आंगन में! कुछ ऐसा ही सियासी दृश्य देहरादून में देखने को मिला। सेदी दिखाउंगाआपको कैसे बीजेपी वाले के इंतजार में बैठे थे कांग्रेसी और फिर जो सड़क पर तस्वीर थी वो आपने शायद ही देखी होगीय। दोस्तो, कांग्रेस भवन के बाहर नारे भी लगे, धक्का-मुक्की भी हुई, पुलिस भी बीच में आई। और देखते ही देखते सियासत सड़क पर उतर आई। दोस्तो, दिल्ली में हुए घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं से देशभर की राज्य राजधानियों में कांग्रेस कार्यालयों का घेराव करने का आह्वान किया। इसी आह्वान के तहत बिहार की राजधानी पटना में भी बीजेपी कार्यकर्ता कांग्रेस कार्यालय की ओर बढ़े। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यकर्ता भी पहले से तैयार थे। इसके बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए और मौके पर जमकर हंगामा और धक्का-मुक्की देखने को मिली तो दोस्तो क्या उत्तराखंड की सियासत अब मुद्दों से ज्यादा “मुकाबले की तस्वीरें” बनाने पर चल रही है? दोस्तो देहरादून में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस मुख्यालय के घेराव का कार्यक्रम आयोजित किया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता महानगर से कांग्रेस मुख्यालय की ओर रवाना हुए। हालांकि, कांग्रेस मुख्यालय से पहले ही पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया।
इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने बैरिकेडिंग पर प्रदर्शन करते हुए “राहुल गांधी शर्म करो” के नारे लगाए। भाजपा के कांग्रेस मुख्यालय घेराव के ऐलान के बाद कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। कांग्रेस का कहना है कि छात्रों और युवाओं के मुद्दों पर जवाब देने के बजाय भाजपा विपक्ष की आवाज़ दबाने का प्रयास कर रही है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं से शांति और अनुशासन बनाए रखने की अपील की है, वहीं प्रशासन से कांग्रेस मुख्यालय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी की है। कांग्रेस का कहना है कि वह जनहित और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी लड़ाई आगे भी जारी रखेगी। दोस्तो, राजनीति में विरोध होना नई बात नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विरोध अब सिर्फ विरोध के लिए होने लगा है?एक तरफ भाजपा कह रही है कि वह राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीति का विरोध कर रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस का आरोप है कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल जनता का है। क्या छात्र, रोजगार, पेपर लीक, महंगाई और उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दे अब सियासी नारों के शोर में दबते जा रहे हैं?क्या सड़क पर शक्ति प्रदर्शन ही अब राजनीति का नया पैमाना बन गया है?या फिर चुनाव नजदीक आते ही हर दल अपनी-अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुट गया है?इतना तो साफ है कि देहरादून की सड़क पर आज सिर्फ बैरिकेडिंग नहीं लगी थी, बल्कि सत्ता और विपक्ष आमने-सामने खड़े थे। और आने वाले दिनों में चुनावी माहौल गरमाने के साथ ऐसी तस्वीरें शायद और भी ज्यादा देखने को मिलें।अब फैसला जनता को करना है कि उसे नारों की राजनीति चाहिए या मुद्दों की राजनीति।आपकी क्या राय है? क्या ऐसे प्रदर्शन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं या सिर्फ राजनीतिक माहौल को गरमाते हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए।