Dehradun करोड़ों की व्यवस्था की ऐसे खुली पोल! | Shooting Range | Rekha Arya | Uttarakhand News

Spread the love

दोस्तो, अपने उत्तराखंड में दावे बड़े-बड़े हैं, लेकिन तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। करोड़ों की इमारत खड़ी है, लेकिन खिलाड़ी आज भी लाचार है। व्यवस्था के नाम पर करोड़ों खर्च हुए, फिर भी सहारा सिस्टम का नहीं, इंसानों के कंधों का लेना पड़ रहा है। कैसे 32 करोरोड़ रुपये की लागत से बना आधुनिक शूटिंग रेंज को लेकर उठ गए बड़े सवाल। दोस्तो, उत्तराखंड में करीब 32 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक शूटिंग रेंज बनाई गई, ताकि खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिल सकें। लेकिन जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने इन दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दोस्तो एक पैरा एथलीट को शूटिंग रेंज तक पहुंचने के लिए लोगों के कंधों का सहारा लेना पड़ा, जब करोड़ों रुपये खर्च किए गए, तो दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए बुनियादी सुविधाएं और सुगम व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई? दोस्तो खेलों में जीत और हार का फैसला निशाने पर लगने वाली गोली करती है, लेकिन देहरादून में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की शूटिंग प्रतियोगिता में कुछ पैरा खिलाड़ियों को निशाना साधने से पहले एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. यह चुनौती किसी प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है, जो खिलाड़ियों को प्रतियोगिता स्थल तक सुगमता से पहुंचाने में भी नाकाम साबित हो रही है। दरअसल, दोस्तो देहरादून स्थित महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज परिसर की त्रिशूल शूटिंग रेंज इन दिनों राष्ट्रीय स्तर की शूटिंग प्रतियोगिता की मेजबानी कर रही है. देश के विभिन्न राज्यों से आए खिलाड़ी यहां अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में पैरा खिलाड़ी भी शामिल हैं, लेकिन दोस्तो यहां चौकाने वाली बात ये कि जिन खिलाड़ियों को अपनी क्षमता और हौसले के दम पर देश का प्रतिनिधित्व करना है, उन्हें प्रतियोगिता स्थल की पहली मंजिल तक पहुंचने के लिए दूसरों के सहारे का इंतजार करना पड़ रहा है।

दोस्तो प्रतियोगिता के कई इवेंट पहली मंजिल पर आयोजित किए जा रहे हैं, जबकि भवन की लिफ्ट खराब पड़ी हुई है। ऐसे में व्हील चेयर का इस्तेमाल करने वाले खिलाड़ियों के लिए ऊपर पहुंचने का एकमात्र विकल्प सीढ़ियां बचती हैं। यह स्थिति उन खिलाड़ियों के लिए बेहद कठिन और अपमानजनक महसूस होती है, जिन्हें अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन उन्हें पहले भवन की बाधाओं से लड़ना पड़ रहा है, लेकिन इस परेशानी को उत्तराखंड की खेल मंत्री रेखा आर्या कैसे देखती है वो दिखाता हूं कि क्या तर्क हैं मंत्री का। दोस्तो, किसी भी प्रदेश की पहचान सिर्फ बड़े-बड़े स्टेडियम या करोड़ों की परियोजनाओं से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां हर खिलाड़ी—खासकर दिव्यांग खिलाड़ियों—को कितनी सम्मानजनक और सुगम सुविधाएं मिलती हैं। अगर 32 करोड़ रुपये की आधुनिक शूटिंग रेंज में भी एक पैरा खिलाड़ी को प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचने के लिए लोगों के कंधों का सहारा लेना पड़े, तो यह सिर्फ एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या खराब लिफ्ट को जल्द दुरुस्त किया जाएगा? क्या भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए स्थायी इंतजाम किए जाएंगे? क्योंकि खिलाड़ी का हौसला उसकी ताकत होना चाहिए, मजबूरी नहीं।