दोस्तो, उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनाव में युवा वोट ने बड़ा उलटफेर कर दिया!कहीं मंत्रियों-विधायकों के गढ़ में ABVP को झटका, तो कहीं निर्दलीयों और NSUI ने बाजी पलट दी!सुबोध उनियाल से लेकर सुरेश गढ़िया तक। दिग्गजों के गढ़ में छात्रों ने दिखा दिया दम!महेंद्र भट्ट के गृह जनपद चमोली में भी मुकाबला दिलचस्प रहा..तो सितारगंज में मंत्री सौरभ बहुगुणा के क्षेत्र में सियासी पकड़ बरकरार रही!आखिर छात्रसंघ चुनाव के इन नतीजों ने क्या संकेत दिया?क्या कैंपस का ये मिजाज आने वाले चुनाव की सियासत में भी दिखाई देगा? दोस्तो इसे छात्रसंघ चुनाव के साधारण नतीजे समझने की भूल कतई मत कीजिएगा। यह उत्तराखंड के ‘जेन-ज़ी’ यानी युवा वोटरों का वो खूनी जनादेश है, जिसने सूबे की सबसे ताकतवर सरकार और संगठन के सिपहसालारों की चूलें हिलाकर रख दी हैं! जिन चुनावों को जिताने के लिए संगठन के बड़े-बड़े आकाओं से लेकर कैबिनेट मंत्रियों और माननीय विधायकों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, वहां युवाओं ने बीजेपी की लोकप्रियता को पानी पिला दिया है। दिग्गजों के घरों में घुसकर एनएसयूआई (NSUI) और निर्दलीयों ने जो सर्जिकल स्ट्राइक की है, वो साफ बताती है कि माननीय विधायक और मंत्री अब युवाओं का दिल जीतने में नाकाम साबित हो रहे हैं। कांग्रेस इसे राहुल गांधी के ‘युवा कनेक्ट’ और न्याय की जीत बता रही है, तो वहीं बीजेपी के लिए यह साल 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महा-खतरे की घंटी है। हालांकि ये बात अलग है कि बीजेपी इन चुनावी नतीजों को बुस्टर डोज बता रही है। दोस्तो अब बीजेपी वाले जो भी कहें, लेकिन ये बात भी सच है कि जो भट्ट साहब नतीजों से गदगद हो कर आप सब का मूड भांप रहे हैं। उनके खुद के गृह क्षेत्र में बीजेपी की छात्र इकाई ABVP ओंधे मुंह गिरी है। खैर आगे बढ़ता हूं आगे दिखिए खबर बड़ी रौचक है।
दोस्तो उत्तराखंड की छात्र राजनीति के इन नतीजों ने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। यह हार सिर्फ एबीवीपी की नहीं है, बल्कि उन माननीय चेहरों की है जो खुद को अपने क्षेत्रों का निर्विवाद सम्राट समझते हैं। शुरुआत करते हैं सूबे के सबसे कद्दावर और वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के निर्वाचन क्षेत्र नरेंद्रनगर बेल्ट और ऋषिकेश से। जोशीमठ के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए, तो गोपेश्वर सहित तमाम बड़े डिग्री कॉलेजों में NSUI और निर्दलीय प्रत्याशियों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सरकार के दावों को जमींदोज कर दिया। दोस्तो जो तंत्र यह सोचकर बैठा था कि सत्ता के रसूख से चुनाव जीत लेंगे, उन्हें युवाओं ने बैलेट पेपर से करारा जवाब दिया है। ज़रा नुकसान की गहराई को समझिए! BJP के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के गृह जनपद चमोली में, गोपेश्वर कॉलेज समेत लगभग सभी मुख्य सीटों पर ABVP बेदम नजर आई। वहीं कपकोट से BJP के चर्चित और फायरब्रांड विधायक सुरेश गढ़िया के विधानसभा क्षेत्र में भी ABVP को करारी हार का मुंह देखना पड़ा है। दोस्तो हद तो तब हो गई जब पंत परिवार का अभेद्य किला कहे जाने वाले सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में भी ABVP के पैर उखड़ गए। दोस्तो युवा विधायकों और दिग्गज नेताओं की फौज धरी की धरी रह गई, लेकिन वो युवाओं के भीतर सुलग रहे गुस्से को भांप नहीं पाए। साफ़ है कि एंटी-इंकंबेंसी का जो करंट नीचे दौड़ रहा है, उसने बीजेपी के बड़े-बड़े टावरों को फ्यूज कर दिया है। अब कांग्रेस भी तंज कस रही है, और सरकारी मशीनरी के गलत इस्तेमाल समेत कई आरोप लगा रही है।
दोस्तो यहां कांग्रेस वाले भी अपनी डूबती नैया में छात्रों की जीत को देख रहे हैं, लेकिन सत्ता सीन बीजेपी के नजरिए से देखे तो इस पूरे महा-विस्फोट के बीच बीजेपी के लिए राहत की एकमात्र खबर मैदानी बेल्ट से आई। सितारगंज में सूबे के युवा मंत्री सौरभ बहुगुणा का जलवा और दबदबा कायम रहा। बहुगुणा के विधानसभा क्षेत्र में कड़े संघर्ष के बाद ABVP ने अध्यक्ष पद पर बाजी मारी और महेश कुमार शानदार वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे। दोस्तो बहुगुणा ने युवाओं के बीच अपनी पकड़ साबित की। उधर, बागेश्वर में दर्जाधारी भूपेश उपाध्याय के नेतृत्व में उत्तरकाशी और बागेश्वर बेल्ट में मुकाबला लगभग बराबरी का रहा, लेकिन वहां भी एबीवीपी अंदरूनी रूप से बेहद कमजोर दिखाई दी। कई कॉलेजों में निर्दलीय सचिव और वामपंथी विचारधारा के उपाध्यक्षों का मार्जिन इतना बड़ा था कि वह संगठन की कमियों को सरेआम उजागर कर रहा है। दोस्तो कांग्रेस इस नतीजों को बेहद उत्साह के साथ देख रही है और इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ रही है। कांग्रेसी दिग्गजों का दावा है कि राहुल गांधी ने देश के छात्रों के लिए जो ‘युवाओं की गूँज’ कार्यक्रम चलाया था, और जिस तरीके से उनका युवाओं के साथ एक सीधा और भावनात्मक अटैचमेंट है, उसी का नतीजा आज उत्तराखंड की माटी में दिख रहा है। चाहे वो नीट (NEET) पेपर लीक का मामला हो, चाहे परीक्षाओं में होने वाले बड़े घोटाले हों, या फिर उत्तराखंड के अपने स्थानीय भर्ती घोटाले और अंकिता भंडारी न्याय का मुद्दा हो—जब-जब युवाओं से जुड़ा कोई भी गंभीर सवाल उठा, तब-तब राहुल गांधी ने उसे पुरजोर तरीके से उठाया। युवाओं ने यह महसूस किया कि देश में कोई एक नेता है जो उनकी चिंताओं को समझता है, और इसी भरोसे ने आज एबीवीपी के पैर उखाड़ दिए। दोस्तो तो साफ बात यह है कि उत्तराखंड के इन छात्रसंघ चुनाव परिणामों ने भाजपा के थिंक टैंक को गहरी चिंता में डाल दिया है। ये नतीजे साफ इशारा कर रहे हैं कि युवाओं के बीच केवल बड़ी-बड़ी बातें और रैलियां काम नहीं आने वालीं। अगर समय रहते नौकरियों में पारदर्शिता, पेपर लीक पर परमानेंट लगाम और युवाओं की बुनियादी समस्याओं को दूर नहीं किया गया, तो साल 2027 की डगर सत्ताधारी दल के लिए बेहद कांटों भरी होने वाली है। युवाओं के इस बंपर और आक्रामक जनादेश पर आपकी क्या राय है? क्या वाकई यह परिणाम सरकार के खिलाफ एक बड़ा अल्टीमेटम है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय बेबाकी से दर्ज करें।