UPNALकर्मियों के केस में बैकफुट पर सरकार! | Nainital High Court | Regularization | Uttarakhand News

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दोस्तो सरकारी नौकरी और कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या लंबे समय से संघर्ष कर रहे उपनल कर्मियों को अब राहत मिलने वाली है, या फिर यह मामला सिर्फ अदालत की फटकार तक ही सीमित रह जाएगा? UPNL से जुड़े मामलों पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी के बाद सरकार के रुख में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। क्या अब सरकार कॉन्ट्रैक्ट नीति में कोई बड़ा संशोधन करने जा रही है? और क्या उपनल कर्मियों को स्थायीकरण की दिशा में कोई ठोस कदम देखने को मिलेगा? हाई कोर्ट की वो फटकार क्या है जिससे नियम कायदे बदलने को मजबूर होना पड़ा है। दोस्तो मै आपको पूरी खबर बताउँ उससे पहले इस खबर की बुनियाद और हाईकोर्ट की वो सख्त फटकार। जी हां दोस्तो ये वो फटकार है जिससे ये खबर आ रही है कि अब सरकार प्रशासन अपने नियमों को ही बदलने को मजबूर हो गया। उत्तराखंड में उपनल कर्मचारियों को लेकर चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है, कर्मचारियों के तीखे विरोध के बाद सरकार ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि मौजूदा अनुबंध प्रणाली को जस का तस नहीं रखा जाएगा, बल्कि उसमें संशोधन किया जाएगा। वो क्यों किया इसलिए क्या जाएगा। दरअसल दोस्तो आपको बता दूं कि बीते दो-तीन अप्रैल को जारी किए गए अनुबंध पत्र को लेकर कर्मचारियों ने कई गंभीर आपत्तियां उठाई थीं। इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कार्मिक विभाग ने अब पूरे प्रारूप की समीक्षा शुरू कर दी है।

अधिकारियों का कहना है कि संशोधित प्रस्ताव जल्द ही सामने लाया जाएगा, जिसमें कर्मचारियों की आपत्तियों को शामिल करने की कोशिश की जाएगी, लेकिन मामला इधर कोर्ट में था कोर्ट ने जबरदस्त तरीके से लपेट लिया और जज साहब ने एक नहीं सुनी। बताते चलें कि उत्तराखंड सरकार पहले ही 10 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके उपनल कर्मियों को “समान कार्य, समान वेतन” का लाभ देने का निर्णय ले चुकी है। इस फैसले के तहत कर्मचारियों को अपने मूल विभाग के साथ नया अनुबंध करना प्रस्तावित था, लेकिन इसी प्रक्रिया की शर्तों को लेकर असहमति सामने आई। कर्मचारियों का कहना है कि प्रस्तावित अनुबंध में कई ऐसे प्रावधान थे, जो उनके भविष्य को अस्थिर बना सकते हैं। खास तौर पर नियमितीकरण, सेवा लाभ और नौकरी की निरंतरता को लेकर स्पष्टता नहीं होने से असंतोष बढ़ा। यही वजह रही कि सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा। सरकार के इस नए फैसले के बाद एक और बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या यह फैसला कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है या फिर आगे की कानूनी लड़ाई और तेज होगी?