दोस्तो, वो पल आया जब पहाड़ की धियाणी मां नंदा अपने मायके से विदा हुईं और भक्तों की आंखें नम हो गईं!होमकुंड में ऐतिहासिक महायज्ञ के बाद चौसिंग्या खाड़ू संग कैलाश की ओर मां नंदा की विदाई हुई!हजारों भक्तों के जयकारों के बीच विदाई का ये दृश्य इतना भावुक क्यों था?आखिर मां नंदा की विदाई में क्यों रो पड़ा पूरा पहाड़? कैसे चौसिंग्या खाडू संग कैलाश को रवाना हुई जगतजननी बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो उत्तराखंड को सिर्फ देवभूमि ही नहीं कहा जाता, यह वो पावन धरा है जहाँ भगवान और इंसानों के बीच भावनाओं का सबसे अटूट रिश्ता देखने को मिलता है। एक बेटी जब अपने मायके से विदा होती है, तो पूरा परिवार रो पड़ता है, लेकिन जब पूरे पहाड़ की बेटी यानी जगतजननी मां नंदा अपने मायके से विदा होती हैं, तो हिमालय की चोटियाँ भी जैसे भावुक हो उठती हैं। जी हां, दोस्तो ऐतिहासिक और पौराणिक मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा का होमकुंड में विधिवत महायज्ञ और पूजा-अर्चना के साथ समापन हो गया है। चौसिंग्या खाडू के साथ पहाड़ की ये धियाणी अब कैलाश पर्वत की ओर विदा हो चुकी हैं। आँखों में आँसू और होठों पर मां की जयकार लिए भक्त अब वापस लौट रहे हैं। दोस्तो श्रद्धा, आस्था और आंसुओं का ऐसा सैलाब शायद ही दुनिया के किसी कोने में देखने को मिले। समूचे उत्तराखंड की आराध्य देवी, पहाड़ की लाडली धियाणी माँ नंदा राजराजेश्वरी की ऐतिहासिक बड़ी जात यात्रा का होमकुंड के निर्जन और पावन आंचल में विधिवत समापन हो गया है। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम और अलौकिक धाम में जब पुरोहितों ने अंतिम महायज्ञ की पूर्णाहूति दी, तो पूरा वातावरण मां नंदा के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
दोस्तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, होमकुंड ही वो स्थान है जहाँ से मां नंदा अपने मायके की सीमाओं को छोड़कर अपने पति की नगरी यानी भगवान शिव के धाम कैलाश पर्वत के लिए प्रस्थान करती हैं। स्थानीय परंपरा के मुताबिक, यहाँ से आगे इंसान नहीं जा सकते। इसलिए इंसानों की आस्था का प्रतीक बनकर, चार सींगों वाला रहस्यमयी चौसिंग्या खाडू, पीठ पर मां की पोटली और भेंटे लादे अकेले ही आगे के निर्जन रास्तों पर कैलाश के लिए रवाना हो गया। दोस्तो इस विदाई के पल को देखकर वहाँ मौजूद हर आंख नम थी। भक्तों ने आंशुओं से भरे आंखों से अपनी इस दैवीय बेटी को सुख-समृद्धि की कामना के साथ विदा किया। दोस्तो हिमालय के ऊंचे शिखरों पर विदाई की रस्म पूरी होने के बाद, अब उत्सव की बारी पहाड़ के अंचलों की है। बड़ी जात यात्रा के सफल समापन के बाद आज मां नंदा देवी की पावन देव डोलियाँ और छंतोलियाँ नंदानगर विकासखंड के खूबसूरत सुतोल गांव पहुँचने वाली हैं। देव डोलियों के आगमन को लेकर पूरे सुतोल और आस-पास के क्षेत्रों में भक्ति का अनूठा माहौल है। ग्रामीण अपनी आराध्य मां का स्वागत करने के लिए ब्रह्ममुहूर्त से ही पलकें बिछाए बैठे हैं।
दोस्तो सुतोल गांव में मां नंदा की आगवानी के लिए कड़े धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक रीति-रिवाजों की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। यहाँ मां की डोली को नए अनाज का भोग लगाया जाएगा और पहाड़ की बेटियां मंगल गीत गाकर मां की आरती उतारेंगी। भले ही मां भौतिक रूप से कैलाश की ओर बढ़ चुकी हैं, लेकिन उनकी देव डोलियों का आशीर्वाद लेने के लिए हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु सुतोल गांव में डेरा जमाए हुए हैं। दोस्तो 12 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आयोजित होने वाला यह हिमालयी महाकुंभ इस बात का गवाह है कि पहाड़ की संस्कृति आज भी कितनी जीवंत और अटूट है। माँ नंदा की यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक संस्कृति, भूगोल और इंसानी भावनाओं का सबसे अनूठा संगम है। दोस्तो, मां नंदा अपने मायके से कैलाश के लिए विदा हो चुकी हैं, लेकिन पीछे छोड़ गई हैं आस्था, भक्ति और भावनाओं से भरी अनगिनत यादें। होमकुंड में गूंजे जयकारे, चौसिंग्या खाड़ू के साथ हुई मां की विदाई और नम आंखों से उन्हें विदा करते भक्त, ये तस्वीरें आने वाली पीढ़ियों तक पहाड़ की इस महान परंपरा की कहानी सुनाती रहेंगी। अब मां नंदा की देव डोलियां गांव-गांव पहुंचेंगी और भक्तों को अपना आशीर्वाद देंगी। मान्यता है कि मां भले ही कैलाश चली गई हों, लेकिन अपने मायके यानी उत्तराखंड के हर घर और हर दिल में हमेशा विराजमान रहेंगी। तो मां नंदा से यही प्रार्थना। पहाड़ की हर धियाणी सुखी रहे, हर घर में खुशहाली आए और देवभूमि पर मां का आशीर्वाद हमेशा बना रहे।