देहरादून: जोशीमठ में लगातार हो रहे भू-धंसाव की घटना को लेकर राज्य और केंद्र सरकार गंभीर नजर आ रही है। यही वजह है कि सरकार जोशीमठ शहर में रहने वाले लोगों और शहर के अस्तित्व को बचाने की कवायद में दिन रात जुटी हुई है। अभी तक जोशीमठ के 800 से ज्यादा घरों में दरारें आ चुकी हैं। जिसके कारण शहर के परिवारों को अब किसी अन्य जगह स्थाई रूप से पुनर्वास किए जाने को लेकर उत्तराखंड सरकार ने गहन मंथन शुरू कर दिया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की एक विशेषज्ञ टीम ने जोशीमठ के विस्थापितों के लिए चार स्थान चुने है। टीम को जोशीमठ के प्रभावित निवासियों के पुनर्वास के लिए संभावित क्षेत्रों का अध्ययन करने का काम सौंपा गया है। टीम ने आसपास के चार स्थानों- कोटी फार्म, पीपलकोटी, जड़ी बूटी अनुसंधान और विकास संस्थान (एचआरडीआई) की जमीन और ढाक गांव को मंजूरी दे दी है। दो अन्य स्थानों- गौचर शहर और सेलंग गांव के लिए सर्वे अभी जारी है।
कोटी फार्म राजस्व भूमि पर है और जोशीमठ से लगभग 12 किमी दूर है। औली का एक रास्ता कोटी फार्म से भी जाता है। दूसरा विकल्प पीपलकोटी है, जो जोशीमठ से लगभग 36 किलोमीटर दूर है, जिसके पास एक विशाल भूमि है। एचआरडीआई के स्वामित्व वाली भूमि जोशीमठ, निकटतम स्थान से लगभग 9 किमी दूर है। जोशीमठ के विस्थापित लोगों को स्थानांतरित करने के लिए जड़ी बूटी अनुसंधान और विकास संस्थान के स्वामित्व वाली भूमि का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं ढाक गांव की जमीन मलारी रोड पर है और जोशीमठ से 12 किमी दूर है। जमीन राजस्व विभाग की है। इस बीच जोशीमठ से करीब 90 किलोमीटर दूर गौचर में सर्वे का काम चल रहा है। ये स्थान गौचर मेला के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में भूमि का एक बड़ा टुकड़ा है जिसका उपयोग उन परिवारों के पुनर्वास के लिए किया जा सकता है, जिन्होंने अपने घरों को छोड़ दिया है जो या तो टूट रहे थे या ढहने की कगार पर थे।