दोस्तो, सरहदें अलग हैं, मुल्क अलग है, लेकिन आस्था का रिश्ता आज भी अटूट है! लाहौर से उज्बेकिस्तान और फिर उत्तराखंड के हेमकुंड साहिब तक पहुंचे 40 पाकिस्तानी सिख श्रद्धालु! आखिर 18 साल पुरानी इस आस्था के पीछे क्या कहानी है? हेमकुंड साहिब में माथा टेकने के बाद इन श्रद्धालुओं ने उत्तराखंड के इंतजामों को लेकर क्या कहा? क्या है इनका अनुभव, और कैसे पूरा हुआ सरहद पार से देवभूमि तक का ये सफर? और विदा हुए तो क्यों हो गए भावुक। दोस्तो क्या मजहब, क्या सरहदें और क्या देशों की बंदिशें! जब आत्मा अपने परमात्मा से मिलने के लिए मचलती है, तो दुनिया की कोई भी दीवार आस्था के कदमों को नहीं रोक सकती! पाकिस्तान के लाहौर से चलकर, उज्बेकिस्तान के रास्ते दिल्ली होते हुए 40 सिख श्रद्धालुओं का एक जत्था देवभूमि उत्तराखंड के परम पवित्र धाम श्री हेमकुंड साहिब पहुंचा! हिमालय की दुर्गम और बर्फीली चोटियों के बीच बसे गुरुद्वारे में जब इन पाकिस्तानी नागरिकों ने मत्था टेका, तो उनकी आंखों से छलक गए और जब देवभूमि से विदाई हुई तो बड़े भाउक दिखाई दिए। दोस्तो गुरु महाराज के प्रति उनकी निष्ठा कितनी गहरी है। 18 सालों से चली आ रही इस ऐतिहासिक यात्रा में कई बार तकनीकी अड़चनें आईं, लेकिन इस बार जो हुआ, उसने भारत और पाकिस्तान के बीच आध्यात्मिक सेतु को एक नया जीवन दे दिया है! दोस्तो पहले इस जत्थे के लंबे और कठिन सफर को समझो। यह जत्था सीधे पाकिस्तान से भारत नहीं आ सका। कानूनी और कूटनीतिक पेचीदगियों के कारण इन श्रद्धालुओं ने लाहौर से उज्बेकिस्तान की उड़ान भरी, और वहां से दिल्ली पहुंचे।
दोस्तो ऋषिकेश के गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब मैनेजमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन सरदार नरिंदरजीत सिंह बिंद्रा ने खुद इन मेहमानों का स्वागत किया। ऋषिकेश में जरूरी रजिस्ट्रेशन और बायोमेट्रिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, यह जत्था चमोली जिले की दुर्गम पहाड़ियों को पार करता हुआ 15,225 फीट की ऊंचाई पर स्थित श्री हेमकुंड साहिब धाम पहुंचा, जहां गुरु गोबिंद सिंह जी ने पूर्व जन्म में घोर तपस्या की थी। दोस्तो दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी श्रद्धालुओं का यह जुड़ाव आज का नहीं है। पिछले 18 वर्षों से लगातार पाकिस्तानी सिख श्रद्धालु इस पावन धाम की यात्रा करते आ रहे हैं। हालांकि, बीच-बीच में दोनों देशों के बीच उपजे तनाव या तकनीकी दिक्कतों की वजह से यह यात्रा रोकी गई, लेकिन इस साल इस परंपरा ने फिर से रफ्तार पकड़ ली है दोस्तो पवित्र सरोवर में स्नान और गुरु ग्रंथ साहिब के दर्शन करने के बाद जब यह जत्था वापस ऋषिकेश लौटा, तो श्रद्धालुओं के चेहरों पर एक अलौकिक सुकून था। पाकिस्तानी नागरिक अमरजीत सिंह और सतवंत कौर ने भावुक होकर अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा श्रद्धालुओं के लिए की गई बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था, सुगम रास्तों और ठहरने के वीआईपी इंतजामों की जमकर तारीफ की! उन्होंने कहा कि अगर जिंदगी ने दोबारा मौका दिया, तो वे बार-बार इस देवभूमि की मिट्टी को अपने माथे से लगाने आएंगे।
दोस्तो दर्शन की यह ऐतिहासिक बेला पूरी होने के बाद, 12 अक्टूबर की रात को यह जत्था वापस ऋषिकेश गुरुद्वारे में विश्राम के लिए रुका। और आज सुबह करीब 11:30 बजे इस जत्थे ने देहरादून के लिए प्रस्थान कर दिया है। देहरादून में स्थित AFRRO (फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस) कार्यालय में इनके एग्जिट परमिट (निकासी अनुमति) संबंधी जरूरी कागजी कार्रवाई पूरी की जा रही है। इसके तुरंत बाद, सभी 40 पाकिस्तानी नागरिक नए दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के चमचमाते रास्ते से होते हुए वापस दिल्ली लौट जाएंगे, जहां से वे अपने वतन पाकिस्तान के लिए उड़ान भरेंगे। वे अपने साथ भारत के लोगों का प्यार और गुरु महाराज का आशीर्वाद लेकर जा रहे हैं। दोस्तो पॉलिटिक्स अपनी जगह चलती रहेगी, बंदूके सरहदों पर तैनात रहेंगी, लेकिन हनोल से लेकर हेमकुंड तक, उत्तराखंड की यह धरती हमेशा से वैश्विक शांति और अध्यात्म का केंद्र रही है। पाकिस्तान से आए इन श्रद्धालुओं की खुशहाली और संतुष्टि यह बताती है कि ‘अतिथि देवो भव:’ का नारा सिर्फ कागजों पर नहीं, देवभूमि के कण-कण में बसता है। सीमाओं के पार से आई इस खूबसूरत और पावन भक्ति गाथा पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दर्ज करें और इस ऐतिहासिक यात्रा के वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें!