Rudraprayag जब अपनों ने ही घेरा मंत्री! | BJP | Bharat Chaudhary | Kamlesh Uniyal | Uttarakhand News

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दोस्तों, चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे सत्ता पक्ष के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। इस बार विपक्ष नहीं, बल्कि बीजेपी के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश मीडिया सह-प्रभारी कमलेश उनियाल ने रुद्रप्रयाग की बदहाल सड़कों को लेकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है, उन्होंने स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री भारत सिंह चौधरी से सीधे जवाब मांगा है। क्या ग्रउंड रिपोर्ट दिखाते बीजेपी के इस नेता ने बताउंगा आपको पूरी खबर आखिर क्या है ये मामला। दोस्तों, उत्तराखंड में चुनाव आते ही विकास की बातें तेज हो जाती हैं। सड़कें याद आने लगती हैं, गड्ढे दिखाई देने लगते हैं और नेताओं को जनता की परेशानियां अचानक समझ में आने लगती हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर चुनाव के समय ही विकास की याद क्यों आती है? जो सड़कें पांच साल तक बदहाल रहीं, उन पर चर्चा आखिरी कुछ महीनों में ही क्यों शुरू होती है? सवाल यह है कि जो गड्ढे वर्षों से सड़कों पर थे, क्या वे चुनाव आते ही दिखाई देने लगे? क्या यह जनता की नाराजगी का असर है या फिर चुनावी सियासत की शुरुआत? दोस्तों, मामला क्या ये आप समझ ही गए होंगे लेकिन इस बार मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सवाल विपक्ष ने नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के भीतर से उठा है। बीजेपी के पूर्व प्रदेश मीडिया सह-प्रभारी कमलेश उनियाल ने रुद्रप्रयाग की सड़कों की हालत पर सवाल उठाते हुए स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री भारत सिंह चौधरी से जवाब मांगा है। उन्होंने कहा कि आम जनता रोज़ टूटी सड़कों और गड्ढों से जूझ रही है। अब सवाल यह नहीं कि किसने आरोप लगाया, बल्कि सवाल यह है कि क्या ये गड्ढे आज बने हैं? क्या ये सड़कें चुनाव की घोषणा के बाद टूटी हैं? नहीं, ये समस्याएं लंबे समय से मौजूद हैं।

वैसे दोस्तो उत्तराखंड के लोग शायद इस तस्वीर के सबसे बड़े गवाह हैं। बरसात आते ही सड़कें टूट जाती हैं। कहीं डामर बह जाता है, कहीं पुल धंस जाते हैं, कहीं महीनों तक सड़कें बंद रहती हैं। गांव का व्यक्ति हो, व्यापारी हो, छात्र हो या चारधाम यात्रा पर आया श्रद्धालु—सबको इसकी कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की बात आती है तो फाइलें चलती हैं, बयान आते हैं और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है, लेकिन इस मामला दूसरा लगता है। दोस्तों, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विकास करने में कंजूसी क्यों? करोड़ों रुपये की योजनाएं बनती हैं, बजट स्वीकृत होता है, टेंडर जारी होते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों में सड़कें उखड़ने लगती हैं। अगर निर्माण गुणवत्ता के अनुसार हुआ है, तो हर साल वही सड़क फिर से क्यों बनानी पड़ती है? और अगर गुणवत्ता में कमी है, तो जिम्मेदार कौन है? क्या कभी किसी बड़े अधिकारी, ठेकेदार या जनप्रतिनिधि से जनता के सामने जवाब मांगा गया? दोस्तो अब बात चुनाव की। 2027 विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। ऐसे में हर नेता जनता के बीच जाएगा। हर मंच से विकास के दावे होंगे। नई घोषणाएं होंगी। नई योजनाओं का वादा होगा। लेकिन जनता के मन में सवाल भी होंगे। क्या पिछले पांच वर्षों के अधूरे कामों का हिसाब दिया जाएगा? क्या बदहाल सड़कें, पेयजल की समस्याएं, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पलायन जैसे मुद्दों पर ठोस जवाब मिलेगा?

दोस्तों, लोकतंत्र में जनता सिर्फ वादे नहीं, बल्कि काम देखती है। सड़क सिर्फ डामर की परत नहीं होती, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था, बच्चों की शिक्षा, मरीज की जान, किसान की फसल और पर्यटन की रीढ़ होती है। जब सड़क खराब होती है, तो उसका असर पूरे क्षेत्र की जिंदगी पर पड़ता है। आज जरूरत इस बात की है कि विकास चुनावी मौसम का मुद्दा न बने, बल्कि पूरे पांच साल की प्राथमिकता बने। जनता भी अब पहले से ज्यादा जागरूक है। सोशल मीडिया के दौर में हर टूटी सड़क, हर अधूरा पुल और हर लापरवाही कैमरे में कैद होकर लोगों तक पहुंच रही है। इसलिए अब केवल उद्घाटन और शिलान्यास से काम नहीं चलेगा, बल्कि टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण विकास ही जनता का भरोसा जीत पाएगा। आखिर सवाल सिर्फ रुद्रप्रयाग की सड़क का नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखंड के विकास मॉडल का है। चुनाव नजदीक हैं, नेता फिर जनता के बीच होंगे लेकिन इस बार जनता भी सवाल पूछेगी—पांच साल तक विकास कहां था? सड़कें चुनाव से पहले ही क्यों याद आती हैं? क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा फैसला भाषण नहीं, बल्कि जनता का वोट करता है।