‘Saurabh Bahuguna बने ‘सुपर CM’? | CM Dhami | Cabinet Politics | CMO | Fivecrore | Uttarakhand News

Spread the love

उत्तराखंड की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली हलचल है! क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी ही कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों पर से भरोसा खो दिया है? या फिर देहरादून के गलियारों में किसी बड़ी ‘सुपर सीएम’ की एंट्री हो चुकी है? जी हां, मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से निकले एक गोपनीय आदेश ने पूरी सरकार में हड़कंप मचा दिया है। 5 करोड़ से ऊपर का हर प्रोजेक्ट, हर सरकारी फाइल अब सीधे मुख्यमंत्री के पास नहीं जाएगी, बल्कि पहले उन्हें एक युवा मंत्री की ‘अग्निपरीक्षा’ से गुजरना होगा। आखिर क्यों धामी सरकार ने रातों-रात बदल दिए सत्ता के नियम? देखिए हमारी इस खास रिपोर्ट में। दोस्तो एक बार फिर देहरादून के सचिवालय की एलीट बिल्डिंग में इस वक्त सन्नाटा है, लेकिन मंत्रियों के कमरों में फुसफुसाहट तेज है। हाल में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के एक फैसले ने पूरी ब्यूरोक्रेसी और कैबिनेट को हिलाकर रख दिया। अब 5 करोड़ से ऊपर की हर फाइल पर पहली नजर मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि सौरभ बहुगुणा की होगी। दोस्तो एक बार फिर चर्चा इस बात की चल पड़ी है और राजनीतिक विशलेषक मानते हैं कि धामी कैबिनेट में सतपाल महाराज, प्रेमचंद अग्रवाल, सुबोध उनियाल जैसे कई दिग्गज और कद्दावर नेता मौजूद हैं। इनके पास दशकों का राजनीतिक अनुभव है। लेकिन मुख्यमंत्री ने भरोसा जताया सबसे युवा मंत्रियों में से एक सौरभ बहुगुणा पर! सवाल उठ रहा है कि क्या सीनियर मंत्रियों की फाइलों को री-चेक करने के लिए जानबूझकर यह ‘गेटवे’ बनाया गया है? क्या मंत्रियों के विभागों में चल रहे खेल पर लगाम कसने की यह कोई गुप्त रणनीति है?

इस फैसले के सियासी मायने बहुत गहरे हैं। पहला फायदा सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को है, जिन्होंने अपने एक बेहद वफादार मंत्री को ‘चेकपोस्ट’ बनाकर बिठा दिया है ताकि CMO तक पहुंचने से पहले हर फाइल में कोई भी गड़बड़ी पकड़ी जा सके। दूसरा फायदा खुद सौरभ बहुगुणा का है, जिनका कद रातों-रात उत्तराखंड की राजनीति में नंबर दो जैसा हो गया है। लेकिन नुकसान किसका हुआ? नुकसान हुआ उन अधिकारियों और मंत्रियों का, जो अब तक फाइलों को सीधे सीएमओ से मंजूर कराने की ताकत रखते थे। अब उन्हें एक और पायदान पर जवाब देना होगा। दोस्तो जैसा आपने सुना खुद मंत्री सौरभ बहुगुणा ने इस व्यवस्था के तहत फाइलों को खंगालना शुरू कर दिया है। सरकार इसे केवल ‘बेहतर को-ऑर्डिनेशन और पारदर्शिता’ का नाम दे रही है। लेकिन राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं। परदे के पीछे चर्चा है कि कई सीनियर मंत्री इस फैसले से बुरी तरह असहज हैं और अंदर ही अंदर विरोध की चिंगारी सुलग रही है। तो कुल मिलाकर कहानी सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश की नहीं है। इसके पीछे उत्तराखंड की आगामी चुनावी बिसात बिछाई जा चुकी है। सियासी गलियारों में साफ चर्चा है कि आगामी चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह बहुत बड़ा और नपा-तुला ‘चुनावी दांव’ खेला है!

दोस्तो इस फैसले को सीधे तौर पर दो बड़े चुनावी नजरियों से देखा जा रहा है। एंटी-इन्कंबेंसी और भ्रष्टाचार पर फाइनल स्ट्राइक,चुनाव में जाने से पहले सरकार पर किसी भी तरह के वित्तीय दाग या घोटाले के आरोप न लगें, इसलिए मुख्यमंत्री ने 5 करोड़ से ऊपर के बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट्स पर डबल-लेयर चेकिंग लगा दी है। दोस्तो जनता के बीच यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश है कि सरकार का एक-एक पैसा पूरी पारदर्शिता के साथ जमीन पर उतरेगा। दोस्तो दूसरा पहलू क्या है वो है। सत्ता की चाबी और ‘फिल्टर पॉलिटिक्स’, चुनाव से पहले टिकटों की दावेदारी और फंड्स के आवंटन को लेकर मंत्रियों के बीच खींचतान आम बात है। दोस्तो जानकारों का कहना है कि धामी ने युवा मंत्री सौरभ बहुगुणा को आगे करके एक तरह का ‘फिल्टर’ लगा दिया है, जिससे चुनावी साल में किसी भी वरिष्ठ मंत्री की मनमानी या बगावती तेवरों को पहले ही भांपा और नियंत्रित किया जा सके। क्या धामी सरकार का यह मास्टरस्ट्रोक भ्रष्टाचार पर चोट है या फिर अपनों को ही काबू में रखने का एक राजनीतिक चक्रव्यूह? आने वाले दिनों में यह फाइलें विकास की रफ्तार बढ़ाएंगी या फिर कैबिनेट के भीतर एक नई जंग की शुरुआत करेंगी, इस पर पूरे उत्तराखंड की नजर रहेगी।