दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड की उस बेटी को याद कीजिए, जिसकी चीखों ने पूरे देश के हुक्मरानों को हिलाकर रख दिया था! मै बात कर रहा हूं अंकिता भंडारी की! अंकिता हत्याकांड में न्याय की चौखट से एक बहुत बड़ी खबर आई। अंकिता की जान लेने वाले दरिंदों को कोर्ट ने फिर से जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है! लेकिन साहब, एक तरफ जहां कोर्ट का यह कड़ा रुख है, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त एक महिला नेता ने ऐसा बयान दे दिया है, जिसने अंकिता के माता-पिता के साथ प्रदेश की जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है! राज्यमंत्री महोदया का कहना है कि अंकिता केस में कोई वीआईपी (VIP) था ही नहीं! आखिर कोर्ट के फैसले और सरकार के इस मंत्री के बयान के बीच का ये विरोधाभास क्या छुपा रहा है? बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो पहले बात करता हूं उस खबर की जो अंकिता के परिवार को थोड़ी राहत देती है। वनन्तरा रिसॉर्ट में हुए इस जघन्य हत्याकांड के मुख्य आरोपी पुलकित आर्य और उसके साथियों को निचली अदालत पहले ही उम्रकैद की सजा सुना चुकी है। इस सजा के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और अंतरिम जमानत की भीख मांगी थी, लेकिन सरकार के सरकारी वकीलों की कड़ी पैरवी और अंकिता के पक्ष में मजबूत सबूतों के आगे कोर्ट ने आरोपियों की इस चाल को नाकाम कर दिया।
कोर्ट ने साफ कह दिया कि इस खौफनाक अपराध के आरोपियों को किसी भी कीमत पर बेल नहीं मिल सकती! सरकार ने भी दावा किया है कि वो अंकिता को इंसाफ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक डटी रहेगी। लेकिन दोस्तो एक तरफ जहां सरकार कड़ी पैरवी का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकार के भीतर से ही एक ऐसा बयान आता है जो अंकिता के माता-पिता की रातों की नींद उड़ा देता है। उत्तराखंड सरकार में माटी कला बोर्ड की उपाध्यक्ष और राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त अनुराधा वालिया ने इस पूरे मामले पर एक बड़ा दावा कर दिया है। उन्होंने मीडिया के सामने साफ कहा कि—’अंकिता भंडारी मामले में कोई वीआईपी (VIP) था ही नहीं।’ वालिया ने आगे तर्क दिया कि मामले की जांच देश की बड़ी-बड़ी जांच एजेंसियां कर रही हैं और जब तक तथ्यों के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं आ जाता, तब तक किसी वीआईपी के शामिल होने की बात कहना पूरी तरह गलत है। अब सवाल यह उठता है कि जिस ‘वीआईपी’ को लेकर अंकिता के माता-पिता लगातार रो-रोकर नाम उजागर करने की मांग कर रहे हैं, उसे सरकार के ही नुमाइंदे क्लीन चिट क्यों दे रहे हैं?
दोस्तो अनुराधा वालिया के इस बयान ने उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर चिंगारी को सुलगाने का काम किया है। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि सरकार शुरुआत से ही उस रसूखदार ‘वीआईपी’ को बचाने की कोशिश कर रही है, जिसका नाम अंकिता ने अपने आखिरी व्हाट्सएप चैट में लिया था। अंकिता के माता-पिता आज भी पूछते हैं कि आखिर वो कौन सा रसूखदार सफेदपोश था, जिसे ‘स्पेशल सर्विस’ देने से मना करने पर उनकी बेटी को नहर में धकेल दिया गया? जब कोर्ट आरोपियों को उम्रकैद की सजा दे चुका है, तब सरकार की एक राज्यमंत्री द्वारा ‘कोई वीआईपी नहीं था’ का राग अलापना, क्या अंकिता आंदोलन को कमजोर करने की एक सोची-समझी सियासी साजिश है? दोस्तो कोर्ट ने आरोपियों की जमानत खारिज करके यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में अपराधी सिर्फ अपराधी होता है। लेकिन राजनीति की नजर में सच क्या है, यह आज भी एक बड़ा रहस्य बना हुआ है। क्या आपको लगता है कि राज्यमंत्री अनुराधा वालिया का यह बयान जायज है, या फिर यह पहाड़ की बेटी के साथ एक और राजनैतिक छलावा है? क्या उस तथाकथित ‘वीआईपी’ का नाम कभी सामने आ पाएगा? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। पहाड़ की बेटियों के हक और इंसाफ की इस आवाज को बुलंद करें।