जी हां दोस्तो उत्तराखंड के हजारों परिवारों पर बड़ा खतरा, क्या उत्तराखंड में हर साल आने वाली आपदाओं के बावजूद 1050 परिवार आज भी विस्थापन का इंतजार करने को मजबूर हैं?आखिर कब तक ये गांव खतरे की जद में अपनी जिंदगी गुजारते रहेंगे, और कब मिलेगा इन लोगों को सुरक्षित ठिकाना?हर मानसून में तबाही, हर साल नुकसान लेकिन समाधान आज भी कागजों तक ही सीमित क्यों है?क्या प्रशासन और व्यवस्था की धीमी रफ्तार इन परिवारों की जिंदगी से भी ज्यादा भारी पड़ रही है?और सबसे बड़ा सवाल—आखिर कब जागेगा सिस्टम, और कब खत्म होगा ये अनिश्चितता का डर?इन्हीं सवालों के साथ देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट दोस्तो खबर बड़ी है और चौकाने वाली है। दोस्तो हजारों परिवार ऐसे हैं बल अपने प्रदेश में जो जिंदगीऔर मौत की जंग लड़ने को मजबूर हैं और ये सब बता है क्यों है ये इसलिए हो रहा है क्यों कि सिस्टम की उदासीनता के कारण खबर पूरी देखना दोस्तो बेहतर समझ पाएंगे आप दोस्तो उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर विस्थापन, पुनर्वास को लेकर सवाल उठने लगते हैं. लेकिन मानसून सीजन के समाप्त होने के बाद विस्थापन, पुनर्वास की चर्चाएं फाइलों में बंद हो जाती है। उत्तराखंड, आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है, यही वजह है कि वैज्ञानिकों समेत तमाम सामाजिक संगठनों की ओर से पुनर्वास पर जोर दिया जाता रहा है, लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इस पर ठोस निर्णय नहीं हो पाया है। दोस्तो राज्य में हर साल मानसून सीजन के दौरान भीषण आपदाओं का दंश झेलना पड़ता है। जिससे न सिर्फ जान माल को काफी अधिक नुकसान पहुंचता है, बल्कि सैकड़ों परिवार प्रभावित होते हैं. जिसके चलते संवेदनशील/ अति संवेदनशील क्षेत्रों में बसे लोगों का विस्थापन, पुनर्वास किया जाता है ताकि उनको किसी सुरक्षित स्थान पर बसाया जा सके इसके लिए जिलाधिकारी के स्तर से प्रभावित परिवारों को बसाया जाता है लेकिन लंबे से सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जिनका अभी तक विस्थापन, पुनर्वास नहीं हो पाया है हालांकि, दोस्तो इसके पीछे सरकारी प्रक्रिया के साथ ही लोगों का सामाजिक ताना बाना भी है।
आपदा प्रबंधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, प्रदेश के 270 गांव यानी 3744 परिवारों को विस्थापन की श्रेणी में रखा गया है. जिसमें से साल 2012 से 11 फरवरी 2026 तक 236 गांव यानी 2904 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है. जिसके चलते 128 करोड़ 98 लाख 32 हजार 817 रुपए खर्च हो चुके हैं। वहीं, अभी भी 34 गांव यानी 843 परिवारों का विस्थापन नहीं हो पाया है. इसके अलावा, आपदा की वजह से समय समय पर नए गांव भी जोड़ते रहे हैं, जिनको विस्थापित करने की जरूरत है। आंकड़ों के अनुसार, 28 गांव यानी 207 परिवार ऐसे हैं, जो विस्थापन की श्रेणी में नए जुड़े हैं, जिनको विस्थापित किया जाना बाकी है। ऐसे में कुल 62 गांव यानी 1050 परिवारों को विस्थापित किया जाना बाकी है। कहते हैं कि विस्थापन के क्षेत्र में उत्तराखंड सरकार ने बेहतर काम किए हैं क्योंकि विस्थापन में लिए प्रक्रिया को काफी अधिक सरल कर दिया गया है। जिसके तहत विस्थापन से संबंधित कोई भी पत्र शासन स्तर पर नहीं आती है, बल्कि इसके लिए जिला स्तर पर बनी कमेटी के जरिए ही इसका निस्तारण कर दिया जा रहा है। हालांकि, विस्थापन में खर्च होने वाले धनराशि के लिए ही पत्र शासन के पास आता है. ऐसे में डिमांड के आधार पर पैसा जारी कर दिया जाता है. विस्थापन के लिए नीति मौजूद है, जिसके आधार पर विस्थापन किया जाता है। ऐसे में लोगों को विस्थापन के लिए आवेदन किया जाता है और जिला स्तर से स्वीकृत होने के बाद विस्थापन की कार्रवाई की जाती है।
यही नहीं दोस्तो आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है। क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है। यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है। लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है। साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है तो सवाल फिर वही खड़ा हो जाता है। क्या 1050 परिवारों का यह इंतजार कभी खत्म होगा या हर साल मानसून के बाद यह मुद्दा फिर एक बार फाइलों में दबकर रह जाएगा? आखिर क्यों आपदा प्रभावित गांवों का विस्थापन आज भी एक लंबी और जटिल प्रक्रिया बना हुआ है?क्या सरकार की योजनाएं और दावे जमीन पर उस रफ्तार से नहीं पहुंच पा रहे, जिसकी इन परिवारों को सबसे ज्यादा जरूरत है?और सबसे बड़ा सवाल—जब हर साल आपदा में जान-माल का नुकसान होता है, तो क्या सुरक्षित पुनर्वास को और तेज और प्रभावी बनाने की जरूरत नहीं है?हालांकि विभाग का दावा है कि विस्थापन की प्रक्रिया सरल हुई है और कई गांवों का पुनर्वास भी किया जा चुका है, लेकिन अभी भी 1050 परिवारों का इंतजार जारी है।अब देखना होगा कि क्या आने वाले समय में इन परिवारों को सुरक्षित ठिकाना मिल पाएगा या यह समस्या यूं ही लंबित बनी रहेगी।