उत्तराखंड में एक बार फिर आरटीआई से सामने आए खुलासे ने सियासी हलचल तेज बड़ा दिया है। क्या सत्ता के प्रभाव का इस्तेमाल निजी रिश्तों को फायदा पहुंचाने में किया गया? एक RTI रिपोर्ट में बीजेपी दर्जाधारी मंत्री पर गंभीर आरोप सामने आए हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी को चपरासी के पद पर नियुक्त किया। इस बर अब बवाल मचता दिखाई दे रहा है, लेकिन क्या यह सिर्फ एक नियुक्ति है या फिर नियमों की अनदेखी का बड़ा मामला? बताउँआ आपको पूरी खबर। दोस्तो पूरी खबर अंत तक जरूर देखना बड़ा चौकाने वाला मामला है जहां एक तरफ आपके बच्चे नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अच्छा खासा पढ़ लिख कर चपरासी ही बन जाएं ये सोच रहे हैं वहीं कैसे सिस्टम में बैठे कुछ लोग अपनों पर मेहरबान होते हैं, वो ये खबर बताने जा रही है। दोस्तो उत्तराखंड की धार्मिक व्यवस्थाओं से जुड़ी प्रतिष्ठित संस्था बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। इस बार मामला सीधे समिति के उपाध्यक्ष विजय कपरवाण से जुड़ा है, जिन पर अपनी पत्नी को कार्यालय में चपरासी (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) दर्शाकर वेतन लेने के गंभीर आरोप लगे हैं। दोस्तो ये पूरा मामला सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आया है, जिसने समिति की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दोस्तो जानकारी के अनुसार सामाजिक कार्यकर्ता और वकील विकेश नेगी की तरफ से दायर आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाया गया है कि उपाध्यक्ष ने अपनी पत्नी के नाम पर लगभग ₹12,000 प्रतिमाह का भुगतान समिति से लिया। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल पद के दुरुपयोग का मामला होगा, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग की श्रेणी में भी आएगा।
दोस्तो हैरानी वाली बात तो ये भी है कि मामला यहीं तक सीमित नहीं है. विकेश नेगी ने ये भी आरोप लगाया है कि उपाध्यक्ष को देहरादून स्थित बीकेटीसी कार्यालय में कक्ष आवंटित होने के बावजूद, उन्होंने रुद्रप्रयाग में निजी आवास व कार्यालय दर्शाकर करीब ₹25,000 प्रतिमाह भत्ते के रूप में प्राप्त किए, जबकि समिति का मुख्यालय जोशीमठ में और कैंप कार्यालय देहरादून में संचालित होता है। ऐसे में दोस्तो रुद्रप्रयाग में कार्यालय किराया और अन्य मदों के नाम पर भुगतान लेना गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर संकेत करता है। दोस्तो इन आरोपों के सामने आने के बाद क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ी संस्था में यदि इस तरह के आरोप लगते हैं, तो जवाबदेही किसकी होगी? अब बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकारी सिस्टम में इस तरह की नियुक्तियां नियमों के दायरे में आती हैं, या फिर सत्ता का दुरुपयोग खुलकर किया जा रहा है? और सबसे अहम—क्या इस मामले में अब कोई ठोस कार्रवाई होगी या फिर यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? इधर दोस्तो बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहते हैं कि
प्रकरण उनके संज्ञान में आ चुका है और इसकी जांच के निर्देश दे दिए गए हैं। उन्होंने साफ किया कि यदि जांच में किसी भी प्रकार की अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.दूसरी ओर, आरोपों से घिरे उपाध्यक्ष विजय कपरवाण ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा किउनकी पत्नी समिति की कर्मचारी नहीं हैं और न ही उन्हें किसी प्रकार का वेतन दिया गया है. उनके अनुसार, उनके निजी स्टाफ में कार्यरत दो महिला कर्मचारियों का भुगतान तकनीकी कारणों से एक ही नाम से बिल बनाकर किया गया, जिसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को थी। साथ ही दोस्तो उन्होंने पूरे मामले को उनकी छवि खराब करने की साजिश करार दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहेगा या फिर जांच के जरिए सच्चाई सामने आएगी? धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठे इस विवाद ने न केवल बीकेटीसी बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।