देवभूमि की कला, लोक-संस्कृति और पारंपरिक विरासत को वैश्विक मंच पर चमकाने के बड़े-बड़े सरकारी दावों की हवा एक बार फिर निकल गई है। पांडववास के कलाकारों का भुगतान अटकने के बड़े विवाद के बाद, अब उत्तराखंड की पहचान और ‘ऐपण गर्ल’ (Aipan Girl) के नाम से मशहूर मीनाक्षी खाती ने सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चौखट पर गुहार लगाई है। जब कला और कलाकारों के खून-पसीने की कमाई को देने में ही सरकारी बाबुओं के हाथ कांप रहे हैं, तो फिर संस्कृति को बढ़ावा देने का ढोंग क्यों? उत्तराखंड की लोक कला को फाइलों की दीमक में झोंकने वाले इस ढर्रे सवाल दर सवाल हैं। दोस्तो लिखा है – मानीय मुख्यमंत्री जी को अगला विनम्र निवेदन मेंरा भी आएगा,एक तरफ ऐपण कला को बढावा देने की बात हो रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ सरकारी विभाग हमारे काम करने के बावजूद भुगतान करने को राजी नहीं हैं, हमारे भुगतान करने की सयम सीमा को भी सार भर से ऊपर हो गया है। यानि दोस्तो पैसा यहां भी नहीं दिया गया। दोस्तो बड़े-बड़े होर्डिंग्स, आलीशान मंच, और वहां से गरजती हुई राजनेताओं की आवाजें, जो हर दिन दावा करती हैं कि उत्तराखंड की लोक-कला और संस्कृति को बचाना और उन्हें रोजगार से जोड़ना सरकार की पहली प्राथमिकता है। लेकिन हकीकत के धरातल पर इन दावों की सच्चाई कितनी खोखली है, इसका पर्दाफाश खुद उत्तराखंड की शान, ‘ऐपण गर्ल’ मीनाक्षी खाती (Minakshi Khati) ने कर दिया है। अपनी पारंपरिक लोक विधा ‘ऐपण’ को देहरी से उठाकर विदेशों तक पहुंचाने वाली इस बेटी को आज अपने ही जायज पैसे के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट पर घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसलिए इस तरफ की गुहार लगानी पड़ रही है।
दोस्तो इससे इससे पहले अपने उत्तराखंड की शान पांडववास के कलाकारों के भुगतान विवाद के बाद, अब मीनाक्षी खाती ने सोशल मीडिया पर सीधे मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए अपना दर्द साझा किया है। मीनाक्षी ने बेहद विनम्र लेकिन तीखे लहजे में लिखा है कि, “माननीय मुख्यमंत्री जी को अगला विनम्र निवेदन मेरा भी आएगा। एक तरफ ऐपण को बढ़ावा देने की बात हो रही है और दूसरी तरफ कुछ सरकारी विभाग हमारे काम करने के बाद भी भुगतान करने को राजी नहीं हैं। हमारे भुगतान की समय सीमा को भी साल भर से ऊपर हो गया है।” इस एक पोस्ट ने पूरी नौकरशाही को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दोस्तो जब मुख्यमंत्री स्वयं स्वरोजगार और लोकल फॉर वोकल का नारा देते हैं, तो उनके मातहत बैठे अधिकारी और विभाग इस कदर बेलगाम कैसे हो जाते हैं? जब काम पूरा हो चुका है, काम लेने वाले विभाग आज भी वजूद में हैं, तो फिर सवाल सीधा और साफ है—आखिर यह भुगतान अटका कहां है? कलाकारों के खून-पसीने की फाइल किस टेबल पर धूल फांक रही है? और अपनी कला के दम पर उत्तराखंड का नाम रोशन करने वाली बेटियों को मानसिक प्रताड़ना देने वाले इन अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा? दोस्तो यहां आपको ये बता दूं कि मीनाक्षी खाती ने न सिर्फ विलुप्त होती ऐपण कला को पुनर्जीवित किया है, बल्कि पहाड़ों की दर्जनों महिलाओं और युवाओं को इस कला के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया है। जब सरकार खुद उनके साथ काम करती है और प्रचार बटोरती है, तो समय पर भुगतान करना उनकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी बन जाती है, लेकिन एक साल से ज्यादा समय तक भुगतान लटकाए रखना यह साबित करता है कि सिस्टम को कलाकारों के स्वाभिमान की कोई परवाह नहीं है।
दोस्तो पांडववास के बाद अब ‘ऐपण गर्ल’ का यह मामला सामने आने से यह साफ हो गया है कि यह किसी एक कलाकार की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी विभागों में कलाकारों को दौड़ाना एक परम्परा बन चुका है। अब देखना यह होगा कि क्या मुख्यमंत्री धामी इस मामले का तुरंत संज्ञान लेकर दोषी अधिकारियों की क्लास लगाते हैं और मीनाक्षी खाती का लंबित भुगतान तत्काल जारी करवाते हैं, या फिर देवभूमि की कला ऐसे ही लापरवाह बाबुओं की लालफीताशाही की भेंट चढ़ती रहेगी। दोस्तो इससे पहले आपको याद होगा मेने वो खबर भी आपको दिखाई थी की नेशनल गेम को उत्तराखंड में चार चांद लगाने वाले पानडवास बैंड को मिलने वाला पैसा कहां फंसा है, या कौन डकार गया है। दोस्तो इससे पहले उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित डिजिटल प्रोडक्शन और म्यूज़िकल बैंड ‘पांडवाज’ (Pandavaas) ने हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को चिट्ठी लिखकर और सोशल मीडिया पर अपनी बात रखकर पूरे राज्य के सिस्टम को हिला दिया है। ‘पांडवाज’ ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर बेहद भावुक और आक्रामक पोस्ट करते हुए कहा कि, “हम पहाड़ छोड़कर नहीं गए, आज भी यहीं रहकर अपनी लोकसंस्कृति, कला और मातृभूमि के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन, जब हमारे हक के भुगतान की बात आती है, तो हमें दर-दर भटकाया जाता है।” और अब ये नया मामला जहां मीनाक्षी खाती ने बीते एक साल भुगतान नहीं होने को लेकर प्रदेश के मुखिया से गुहार लगाई है। तो दोस्तो क्या ऐसे बच पाएगा अपना पहाड़ अपना उत्तराखंड और यहां संस्कृति, आप बताना।