देवभूमि की राजनीति में क्यों उमड़ा आंसुओं का समंदर?| Harak Singh | Harish Rawat | Uttarakhand News

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किच्छा में 15 साल पुराने थप्पड़ का रीटेक और सियासत में एंट्री हुई ‘अश्रु अस्त्र’ की!एक तरफ रंजिश, दूसरी तरफ आंसू। रो-धोओ, वोट पाओ की सियासत?हरक से लेकर बेहड़ और शुक्ला तक,देवभूमि की राजनीति में आखिर क्यों उमड़ाआंसुओं का ये सियासी समंदर? क्या ये चुनावी मौसम की नई पैंतरेबाजी है? खबर देखिए ये कोई पहली बार नहीं हुआ है देवभूमि की सियासत में जब आंसुओं का समंदर उतर आया हो। दोस्तो वसीम बरेलवी का एक बड़ा मशहूर शेर है – ‘वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए, ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता।’ लेकिन उत्तराखंड की सियासत में अब महज तकरीरों, जुमलों और लफ्फाजी से बात नहीं बनती। यहाँ जनता का वोट पाने के लिए अब नेताओं को ‘ग्लिसरीन’ और ‘गले रुंधने’ की कला में भी महारत हासिल होनी चाहिए! किच्छा नगर पालिका चुनाव के दौरान जो हाई-वोल्टेज मेलोड्रामा हुआ, उसने साबित कर दिया कि पहाड़ की असली राजनीति अब ‘आंसुओं के समंदर’ में ही तैरती है। चुनाव प्रचार से लेकर मतगणना तक, नेताओं के रोने का ऐसा दौर चला कि लगा मानो नगर पालिका के चुनाव नहीं, बल्कि किसी टीवी सीरियल का क्लाइमेक्स चल रहा हो। दोस्तो इसको ऐसे समझिए किच्छा के इस ‘रोने-धोने’ वाले राजनीतिक महासंग्राम का पहला अध्याय लिखा गया मंडी समिति स्थित स्ट्रांग रूम के बाहर। स्थानीय राजनीति के जानकार बताते हैं कि किच्छा की सियासत हमेशा से कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ और बीजेपी के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस दुश्मनी की जड़ें 15 साल पुरानी हैं। साल 2011 में रुद्रपुर के रामलीला मैदान विवाद के दौरान जब दोनों आमने-सामने आए थे, तब तिलकराज बेहड़ पर राजेश शुक्ला को थप्पड़ मारने का आरोप लगा था। ठीक 15 साल बाद, इस बार पासा पलटा। नगर पालिका चुनाव के बाद जब मतपेटियों की रखवाली के लिए पर्दे और तिरपाल लगाने को लेकर बहस शुरू हुई, तो बीजेपी समर्थक धीरज कुमार पर सिटिंग विधायक तिलकराज बेहड़ पर हाथ झपटने का आरोप लग गया। 15 साल पुराने थप्पड़ के इस रीटेक ने पुरानी रंजिश की आग में घी का काम कर दिया।

दोस्तो बहसबाज़ी के बीच अचानक किच्छा की राजनीति में ‘अश्रु अस्त्र’ का संधान हो गया। पूर्व बीजेपी विधायक राजेश शुक्ला कैमरे के सामने ही बिलख पड़े। आंखों में आंसू भरकर बोले, ‘अगर मुझ पर लगे आरोप सही निकले, तो मैं राजनीति ही छोड़ दूंगा!’ अब जनता समझ नहीं पा रही थी कि नेताजी विकास कार्यों का हिसाब दे रहे हैं या किसी पुरानी हिंदी फिल्म का संवाद बोल रहे हैं, लेकिन यहां तोड़ा थमना होगा। रुकना होगा, क्योंकि दूसरी तरफ कांग्रेसी विधायक तिलकराज बेहड़ साहब भी किसी से पीछे रहने वाले कहाँ थे! उन्होंने आरोप लगाया कि उनका गाल लाल कर दिया गया है। इस बदसलूकी के बीच विधायक जी इतने भावुक हुए कि रोते-बिलखते हुए वहीं ज़मीन पर गश खाकर गिर पड़े। कुछ देर को तो ऐसा लगा कि राजनीति की बिसात पर कोई गंभीर ऐतिहासिक हादसा हो गया है, और होश आते ही फिर से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। दोस्तो वैसे, किच्छा में रोने की यह परंपरा सिर्फ चुनाव या काउंटिंग वाले दिन की नहीं थी। इसकी शुरुआत तो टिकट बंटवारे के साथ ही हो चुकी थी। जब पार्टियों ने उम्मीदवारों की सूचियां जारी कीं, तो टिकट न पाने वाले नेताओं के घरों में सन्नाटा कम और सिसकियों की आवाज़ ज़्यादा सुनाई दी। कांग्रेस के नेता अब्दुल रशीद जक्कू साहब का जब टिकट काटा, तो वे समर्थकों के सामने ही फूट-फूटकर रो पड़े और निर्दलीय मैदान में उतरने की कसम खा ली। भाजपा के बागी दावेदार शैली फुटेला और लवी सहगल का भी यही हाल रहा। पार्टी की ‘बेवफाई’ से आहत होकर दोनों ने अपने-अपने समर्थकों के कंधे पर सिर रखकर आंसू बहाए और बग़ावत का परचम लहरा दिया। किच्छा के आम मतदाता अब एक-दूसरे से मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि भाई, विकास का बजट तो बाद में आएगा, लेकिन पहले यह बताओ कि इन रोते हुए नेताओं को चुप कराने का बजट कौन देगा? लेकिन दोस्तो इससे इतर और तस्वीरों को आप भूल नहीं सकते।

उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव प्रचार, टिकट बंटवारे और कुर्सी जाने के बाद नेताओं का भावुक होना और सहानुभूति बटोरने के लिए आंसू बहाने का इतिहास खासा पुराना रहा है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव को ही याद कर लीजिए। जब डॉ. हरक सिंह रावत को बीजेपी से निष्कासित किया गया और वे कांग्रेस में वापसी कर रहे थे, तो टीवी चैनलों पर इंटरव्यू देते समय वे कई बार भावुक होकर रो पड़े थे। वहीं लक्सर से तत्कालीन बीजेपी प्रत्याशी संजय गुप्ता का पैर पकड़कर रोने वाला वीडियो कौन भूल सकता है, जब उन्होंने कहा था, ‘चाहे मेरे कपड़े फाड़ दो, जूते की माला पहना दो, लेकिन मुझे वोट ज़रूर देना। लालकुआं से ओम प्रकाश प्रीतम भी टिकट न मिलने पर बिलख पड़े थे। यहाँ तक कि सूबे के कद्दावर नेता हरीश रावत भी 2017 और 2022 की चुनावी हार के बाद कार्यकर्ताओं के सामने नम आंखों और रुंधे गले से बोलते दिखाई दिए थे। दोस्तो जनता अब अच्छी तरह समझ चुकी है कि चुनाव में चाहे टिकट कटे, या गाल पर थप्पड़ पड़े, जब सारे पारंपरिक दांव-पेच फेल हो जाते हैं, तो ‘अश्रु अस्त्र’ ही नेताओं का सबसे अचूक ब्रह्मास्त्र बन जाता है। अब किच्छा के इस महासंग्राम का नतीजा जो भी हो, लेकिन जो जीतेगा, वो शायद हारने वाले से आनंद नारायण मुल्ला का यह शेर ज़रूर कहेगा— ‘रोने वाले तुझे रोने का सलीक़ा ही नहीं, अश्क पीने के लिए हैं कि बहाने के लिए।’