Uttarakhand में UKD की क्यों नहीं बनती सरकार? | Ashutosh Negi Politics | Uttarakhand News

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दोस्तो, जय पहाड़, जय पहाड़ी का नारा तो हर चुनाव में गूंजता है, लेकिन नतीजे आते ही सियासत की चढ़ाई, यूकेडी के लिए फिर ढलान बन जाती है। जो पार्टी उत्तराखंड की तकदीर बदलने निकली थी, वो आज अपनी ही तस्वीर बदलने में जुटी दिखाई दे रही है।सत्ता परिवर्तन के दावे तो दूर, कई बार तो प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाते और अब विधानसभा चुनाव से पहले फिर वही कहानी। आज एक बार फिर बात करुंगा उत्तराखंड क्रांति दल की और उसके संघर्ष के साथ सत्ता तक नहीं पहुंच पाने की। दोस्तो सबसे आपको ये बता दूं कि उत्तराखंड का एक मात्र ये क्षेत्रीय दल जो अपने ही प्रदेश अपनी सरकार को लेकर हर चुनाव छटपटाता रहा है। चुनाव से पहले माहौल और दवा कि इस तो सरकार बन ही जाएगी लेकिन चुनाव होते -होते और चुनाव होने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगता। आज एक बार इस दल में बड़ा एक्शन हुआ तो सोचा थोड़ा बात कर ली जाए इस दल के वर्तमान के साथ चुनौतिपूर्ण भविष्यकी दोस्तो ये खबर तो आप लोगों तक वैसे पहुंच ही गई होगी कि केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाए गए आशुतोष नेगी रिटायर्ड कैप्टन राकेश ध्यानी को तो पार्टी से निष्कासित ही कर दिया, तो सवाल बड़ा है। क्या यूकेडी की सबसे बड़ी लड़ाई बीजेपी या कांग्रेस से नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर है? क्या हर चुनाव से पहले उठने वाला यह सियासी तूफान ही यूकेडी को सत्ता से दूर रखता है? या फिर दोस्तो “जय पहाड़” का नारा, हर बार अंदरूनी घमासान में दब जाता है?

आखिर चुनाव से पहले यूकेडी में फिर क्यों मचा सियासी भूचाल?क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल ने बड़ी कार्रवाई करते हुए केंद्रीय उपाध्यक्ष रहे आशुतोष नेगी को पद मुक्त कर दिया है। आशुतोष नेगी ने करीब 2 वर्ष पूर्व यूकेडी ज्वाइन की थी। इस दौरान उन्होंने दल के भीतर नई चेतना और ऊर्जा जगाने का काम भी किया, और लगातार जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों को उठाया, लेकिन दोस्तो दल के केंद्रीय महामंत्री और केंद्रीय कार्यालय प्रभारी देव चंद उत्तराखंडी की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि केंद्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर पार्टी शीर्ष नेतृत्व की ओर से लिए गए निर्णय के अनुसार आशुतोष नेगी को उत्तराखंड क्रांति दल में वर्तमान केंद्रीय उपाध्यक्ष के पद और अन्य दायित्वों से तत्काल प्रभाव से पद मुक्त किया जाता है। दोस्तो आशुतोष नेगी को पद से हटाने वाले लेटर में ये लिखा तो गौर कीजिए। दरअसल यूकेडी का कहना है कि आशुतोष नेगी के अब तक पार्टी के प्रति दिए गए योगदान के लिए दल उनका आभारी रहेगा। भविष्य में उनके पार्टी के लिए किए गए कार्यों को ध्यान में रखते हुए नई जिम्मेदारी के लिए विचार किया जा सकता है। दोसतो एक तो आशुतोष नेगी दूसरा एक और नेता जिसे यूकेडी ने 6 साल के निष्कासित कर दिया। दोस्तो उत्तराखंड क्रांति दल ने सेवानिवृत्त कैप्टन राकेश ध्यानी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से 6 वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया है. दल ने इसकी वजह यह बताई है कि 19 जून को पदमुक्त किए जाने के बाद उनका व्यवहार दल के प्रति उचित और अनुकूल नहीं रहा। इसलिए उनके विरुद्ध प्राप्त तथ्यों और संगठन के हितों के दृष्टिगत पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें तत्काल प्रभाव से उत्तराखंड क्रांति दल की प्राथमिक सदस्यता और दल से 6 वर्षों के लिए निष्कासित किए जाने का निर्णय लिया है। इस आदेश के प्रभावी होने के बाद वह दल के किसी भी पद, दायित्व या फिर संगठनात्मक गतिविधि में भाग लेने के लिए अधिकृत नहीं होंगे।

दोस्तो यूकेडी यानी उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना 25 जुलाई 1979 को हुई थीये राज्य की एकमात्र क्षेत्रीय पार्टी है. यूकेडी ने राज्य आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इस पार्टी का उद्देश्य उत्तराखंड का सर्वांगीण विकास, राज्य के निवासियों के अधिकारों और स्थानीय संस्कृति को बचाए रखना था। हालांकि राज्य बनने के बाद यूकेडी छिटपुट सीटें जीतने के बाद बैकग्राउंड में चली गई। इसके लिए इसके नेताओं की अति महात्वाकांक्षा को जिम्मेदार बताया जाता है। दोस्तो, उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बुलंद आवाज़ मानी जाने वाली पार्टी आज भी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश रही है। जिस यूकेडी ने अलग राज्य के सपने को जन-जन तक पहुंचाया। वही यूकेडी आज अपने ही संगठन को संभालने की चुनौती से जूझती नजर आती है। बीजेपी और कांग्रेस पर सवाल उठाना आसान है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यूकेडी से ही है। आखिर हर चुनाव से पहले पार्टी में उठने वाला असंतोष, बगावत और संगठनात्मक बदलाव क्या महज संयोग है या फिर यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन चुका है?अगर एक क्षेत्रीय दल अपने नेताओं को साथ लेकर नहीं चल पाएगा, तो पूरे उत्तराखंड को साथ लेकर चलने का भरोसा जनता कैसे करेगी? और अगर चुनाव से पहले ही पार्टी के भीतर सियासी भूचाल आता रहेगा, तो जनता सत्ता की चाबी आखिर किस भरोसे सौंपेगी?उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल की जरूरत से शायद ही कोई इनकार करे, लेकिन जरूरत के साथ भरोसा भी चाहिए, संगठन भी चाहिए और एकजुटता भी चाहिए। वरना “जय पहाड़ जय पहाड़ी” का नारा हर चुनाव में तो गूंजेगा, लेकिन सत्ता की सीढ़ियां हर बार दूर ही रह जाएंगी।फिलहाल यूकेडी के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि पहले अपने संगठन को मजबूत करने और जनता का भरोसा वापस जीतने की है।आपकी क्या राय है?क्या यूकेडी की हार की सबसे बड़ी वजह अंदरूनी कलह है, या फिर बदल चुका उत्तराखंड का राजनीतिक समीकरण?