Delhi में युवाओं का महाविद्रोह! | Jantar Mantar | CEC | SIR | BJP | Gyanesh Kumar | Uttarakhand News

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क्या जंतर-मंतर पर उमड़ा युवाओं का यह सैलाब सत्ता के गलियारों में भूचाल लाने वाला है? आखिर क्यों देश की राजधानी की सड़कें युवाओं के हुंकार से दहल उठी हैं? रोज़गार की मांग है या सिस्टम के खिलाफ कोई बड़ा विद्रोह? देखिए दिल्ली के दिल से उठी इस सबसे बड़ी बगावत की इनसाइड स्टोरी! दोस्तो इन तस्वीरो को देखिए ये दिल्ली का जंतर-मंतर है। क्या लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रहरी पर से जनता का भरोसा उठ चुका है? आखिर क्यों देश की राजधानी में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इतना बड़ा विद्रोह खड़ा हो गया है? वोटर लिस्ट से लाखों नाम गायब होने की इनसाइड स्टोरी क्या है और क्या यह निष्पक्ष चुनाव की नींव पर सीधा प्रहार है? दोस्तो दिल्ली का जंतर-मंतर आज किसी सियासी कुरुक्षेत्र से कम नहीं नजर आ रहा। छात्र संगठन AISA, SFI, NSUI और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के साथ-साथ कई विपक्षी दलों ने एक सुर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग बुलंद कर दी है प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि जब तक चुनाव आयोग के शीर्ष पद से निष्पक्षता का संकट दूर नहीं होता, यह आंदोलन थमने वाला नहीं है। दोस्तो इस महा-आक्रोश की असली वजह है चुनाव आयोग का वो ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR), जिस पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि इस प्रक्रिया के नाम पर वोटर लिस्ट में भारी अनियमितताएं की गईं और जानबूझकर बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम हटा दिए गए। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, यह सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव की पारदर्शिता को खत्म करने की एक बड़ी साजिश है। जनता के इस गुस्से से प्रशासन इस कदर खौफ में आ गया कि जंतर-मंतर को पूरी तरह छावनी में तब्दील कर दिया गया। BNSS की धारा 163 लागू कर प्रदर्शन की अनुमति छीन ली गई, सेंट्रल दिल्ली के 11 मेट्रो स्टेशनों के दरवाजे बंद कर दिए गए और तो और, जंतर-मंतर के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में 12 घंटे के लिए इंटरनेट तक बंद कर दिया गया। सवाल यह है कि आखिर इस गुस्से को दबाने के लिए इतनी पाबंदियां क्यों लगानी पड़ीं?

दोस्तो पुलिस के कड़े पहरे के बावजूद जब प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे, तो सड़कों पर ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज, आतिशी और संजय सिंह के साथ-साथ योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और नेहा बोरा जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और सैकड़ों छात्रों को बर्बरता से हिरासत में ले लिया गया। आंदोलनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों को ही अपनी गिरफ्तारी देकर इसे ‘जेल भरो आंदोलन’ में बदल दिया है। दोस्तो इस पुलिसिया कार्रवाई ने विपक्ष को सरकार और चुनाव आयोग पर और आक्रामक होने का मौका दे दिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने खुलेआम मुख्य चुनाव आयुक्त को आड़े हाथों लिया है। उनका कहना है कि जो सरकार सच से डरती है, वो पुलिस के पीछे छिपती है। जंतर-मंतर से उठी यह चिंगारी अब सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, मुंबई के शिवाजी पार्क से लेकर देश के कोने-कोने तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग गूंजने लगी है। जंतर-मंतर पर आज जो कुछ भी हुआ, उसने सिर्फ दिल्ली की रफ्तार को ही नहीं रोका, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की पारदर्शिता पर भी एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। सवाल बहुत सीधा है—अगर चुनाव आयोग के फैसलों और वोटर लिस्ट की निष्पक्षता पर देश का युवा, विपक्ष और आम जनता इस तरह सड़कों पर उतरने को मजबूर है, तो क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? क्या पुलिस की लाठियां, बंद मेट्रो स्टेशन और इंटरनेट पर लगी पाबंदियां जनता के इस तीखे सवाल को दबा पाएंगी? सत्ता और चुनाव आयोग इस हुंकार का क्या जवाब देते हैं, यह देखना बेहद अहम होगा।