उत्तराखंड की सियासत में एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। बीजेपी विधायक दिलीप रावत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह स्वतंत्रता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को लेकर कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं कि, “वीर चंद्र सिंह गढ़वाली कहीं से बुद्धिमान नहीं थे। क्रांति कब करी, जब बुद्धि नहीं थी।” इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। आखिर विधायक ने किस संदर्भ में यह बात कही और अब इस पर क्यों मचा है विवाद। दोस्तो वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को लेकर भाजपा विधायक दिलीप रावत का वायरल वीडियो देखकर सच में बिल्कुल निःशब्द हूँ। सत्ता में बैठा एक नेता उत्तराखंड के इतिहास और लोगों को इस तरह कैसे अपमानित कर सकता है?क्या इतिहास को इस तरह परखा जा सकता है? दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इस बार विवाद का केंद्र बने हैं लैंसडाउन से भाजपा विधायक दिलीप रावत, जिनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में विधायक कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं कि, “बुद्धिमान व्यक्ति कभी क्रांति नहीं करता। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली कहीं से बुद्धिमान नहीं थे। क्रांति कब करी? जब बुद्धि में ही बुद्धि नहीं थी। पढ़ा-लिखा भी नहीं था।” दोस्तो बयानों के सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में बहस छिड़ गई है। सवाल सिर्फ एक नेता के बयान का नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत का भी है, जिसे उत्तराखंड और पूरा देश सम्मान की नजर से देखता है। इस क्या है सियासी प्रतिक्रिया और समाजिक बताउंगा आपको लेकिन इसके एक अलावा एक और बयान दिलीप रावत ने दिया जिससे लेकर घिरते नजर आए। वो देखिए इतना ही नहीं, उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को लेकर भी टिप्पणी की कि “जो क्रांतिकारी आजकल विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, वे उत्तराखंड आंदोलन के समय अंडाणु भी नहीं बने थे।
तो दोस्तो ये वो ताया बयान बीजेपी के लैसडोन से विधायक दिलीप रावत के हैं जिसको देखर विधायक के साथ पार्टी भी घिरती नजर आ रही है यानी कि बीजेपी। दोस्तो वीर चंद्र सिंह गढ़वाली केवल उत्तराखंड के नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने 1930 में पेशावर में निहत्थे भारतीयों पर गोली चलाने के ब्रिटिश आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसा फैसला लेना किसी साधारण व्यक्ति का काम नहीं था। इसकी कीमत उन्हें वर्षों की जेल और कठिन यातनाओं के रूप में चुकानी पड़ी। आज भी उनका नाम साहस, मानवता और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। ऐसे में दोस्तो अगर किसी जनप्रतिनिधि की टिप्पणी को उनके योगदान को कमतर आंकने के रूप में देखा जाता है, तो स्वाभाविक है कि समाज के विभिन्न वर्गों में प्रतिक्रिया होगी। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी बयान का मूल्यांकन उसके पूरे संदर्भ के साथ किया जाए और यदि आवश्यक हो तो संबंधित व्यक्ति की सफाई या स्पष्टीकरण भी सामने आए। इसी तरह, दो्सतो उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास भी हजारों लोगों के संघर्ष, बलिदान और लंबे जनआंदोलन से जुड़ा है। आंदोलनकारियों को लेकर की गई किसी भी टिप्पणी पर संवेदनशीलता अपेक्षित रहती है, क्योंकि यह विषय आज भी प्रदेश के लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। दोस्तो लोकतंत्र में नेताओं को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन जनप्रतिनिधियों के शब्दों का प्रभाव भी व्यापक होता है। इसलिए इतिहास, स्वतंत्रता सेनानियों और जनआंदोलनों जैसे विषयों पर बोलते समय तथ्यों, संवेदनशीलता और मर्यादा का ध्यान रखना उतना ही आवश्यक है। अब इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यह देखना होगा कि विधायक दिलीप रावत अपने वायरल बयान पर कोई स्पष्टीकरण देते हैं या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और राज्य आंदोलन के नायकों पर सार्वजनिक मंचों से की गई टिप्पणियों में अधिक जिम्मेदारी और संयम की आवश्यकता नहीं है? दोस्तो क्योंकि इतिहास केवल किताबों में दर्ज घटनाएं नहीं होता, वह समाज की सामूहिक स्मृति और सम्मान का भी विषय होता है। और जब बात वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे राष्ट्रनायक की हो, तो हर शब्द का महत्व और भी बढ़ जाता है।