Champawat अंग्रेजों से अकेले भिड़ा पहाड़ी योद्धा! | Kalu Mahra | Freedom Fighter | Uttarakhand News

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दोस्तो जब साल 1857 में मंगल पांडे की बगावत के बाद पूरे देश में क्रांति की आग धधक रही थी, तब मेरठ से लेकर दिल्ली तक अंग्रेज अधिकारी मारे जा रहे थे। उस दौर में कुमाऊं के अंग्रेज कमिश्नर हेनरी रैमसे को घमंड था कि पहाड़ के सीधे-साधे लोग कभी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार नहीं उठाएंगे, लेकिन अंग्रेजों का ये वहम तोड़ने के लिए काली कुमाऊं की वादियों से एक ऐसी हुंकार उठी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दीं! आज कहानी उस उस पहाड़ी कुमानी शेर की जिसको अलग-अलग जेलों में छिपाकर रखना पड़ा। काली कुमाऊं के इस अनसुने महानायक की रोंगटे खड़े करने वाली गाथा! दोस्तो वो पहाड़ा का असली शेर था एक ऐसा जमींदार, जिसने अपनी सुख-सुविधाओं को लात मारी और देश की आजादी के लिए घने जंगलों के भीतर अपनी एक ‘सीक्रेट आर्मी’ तैयार कर दी नाम था—कालू सिंह महरा! उत्तराखंड के पहले स्वतंत्रता सेनानी! कैसे उन्होंने अपनी जांबाज गोरिल्ला सेना के दम पर कुमाऊं से ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने का चक्रव्यूह रचा था, दोस्तो साल 1831 में चम्पावत जिले के विशंग गांव के एक रसूखदार थोकदार (जमींदार) परिवार में कालू सिंह महरा का जन्म हुआ था। वे कुमाऊं के पारंपरिक मार्शल आर्ट और तीरंदाजी-तलवारबाजी में माहिर थे। दोस्तो साल 1857 में जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हुआ, तो रोहिलखंड के नवाब खान बहादुर खान ने कालू महरा की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें एक गुप्त पत्र भेजा। नवाब ने लिखा—’पहाड़ के शेर, अब वक्त आ गया है, कुमाऊं की तरफ से अंग्रेजों पर ऐसा वार करो कि उन्हें भागने का रास्ता न मिले।’

दोस्तो कालू महरा के भीतर का राष्ट्रभक्त जाग उठा। उन्होंने अपनी रियासत और धन-दौलत की परवाह किए बिना गोरों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। दोस्तो कालू महरा जानते थे कि सीधे तौर पर अंग्रेजों की आधुनिक सेना और तोपों का मुकाबला करना मुमकिन नहीं है। इसलिए उन्होंने पहाड़ों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ युवाओं को इकट्ठा किया और एक गुप्त सशस्त्र दस्ता बनाया, जिसे नाम दिया गया—’क्रांति संगठन’। इस सेना में आनंद सिंह फर्तियाल और बिशन सिंह करायत जैसे जांबाज शामिल थे। दोस्तो इन पहाड़ी शेरों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। वे रात के सन्नाटे में पहाड़ों से उतरते, ब्रिटिश चौकियों, सरकारी थानों पर धावा बोलते, उनके खजानों को लूटते और इससे पहले कि रैमसे की सेना संभल पाती, वे वापस घने जंगलों में गायब हो जाते। दोस्तो लोहाघाट और पिथौरागढ़ की कई बैरकें कालू महरा की सेना ने राख के ढेर में तब्दील कर दी थीं। दोस्तो अब कुमाऊं का कमिश्नर हेनरी रैमसे बौखला गया था। जब अंग्रेज आमने-सामने की लड़ाई में कालू महरा को नहीं पकड़ पाए, तो उन्होंने भारत के सबसे बड़े दुश्मन यानी ‘गद्दारों’ का सहारा लिया। कुछ स्थानीय मुखबिरों को पैसों का लालच देकर क्रांति संगठन के गुप्त ठिकानों का पता लगाया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने जो तांडव मचाया, वो रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

दोस्तो कालू महरा के साथियों, आनंद सिंह और बिशन सिंह को धोखे से पकड़कर सरेआम फांसी दे दी गई। अंग्रेजों का गुस्सा यहीं नहीं थमा, उन्होंने कालू महरा के पूरे विशंग गांव को आग के हवाले कर दिया, फसलों को नष्ट कर दिया और महिलाओं-बच्चों पर घोर अत्याचार किए। दोस्तो आगे देखिए एक भीषण मुठभेड़ के बाद कालू महरा को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेज उनसे इस कदर खौफ खाते थे कि उन्हें डर था कि अगर उन्हें कुमाऊं की किसी जेल में रखा गया, तो जनता जेल तोड़कर उन्हें छुड़ा ले जाएगी, इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें पहाड़ों से दूर मैदानी इलाकों की जेलों में ट्रांसफर कर दिया। दोस्तो इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि विद्रोह के डर से कालू महरा को उनके जीवनकाल में 52 अलग-अलग जेलों में शिफ्ट किया गया था, जहाँ उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। लेकिन दोस्तो इस पहाड़ी शेर ने कभी माफी नहीं मांगी। साल 1906 में देवभूमि के इस पहले स्वतंत्रता सेनानी ने अंतिम सांस ली और देश की आजादी की नींव में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों से दर्ज करा दिया। दोस्तो कालू महरा की कहानी हमें याद दिलाती है कि आजादी हमें खैरात में नहीं मिली, इसके लिए पहाड़ों की शांत वादियों ने भी अपना खून बहाया है। आज स्वतंत्रता दिवस के इस पावन मौके पर देवभूमि के इस पहले बागी को हमारा शत-शत नमन, कमेंट में ‘वीर कालू महरा अमर रहें’ जरूर लिखें।