देवभूमि के वीर का 84 दिन का अद्भुत संघर्ष! | Freedom Fighters | Shridev Suman | Uttarakhand News

Spread the love

84 दिन, सिर्फ 84 दिन नहीं, बल्कि हौसले, संघर्ष और अदम्य साहस की ऐसी मिसाल, जिसने टिहरी राजशाही की नींव तक हिला दी। 29 साल का एक नौजवान, जिसने जेल की यातनाएं सहीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटा। ये कहानी है उत्तराखंड के उस अमर बलिदानी की, जिसका नाम आज भी देवभूमि गर्व से लेती है—श्रीदेव सुमन। दोस्तो आज हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं तो वो अपने वीरों के संघर्ष और बलिदान के दम पर। दोस्तो हम सबने भूख हड़ताल और आंदोलनों की कई कहानियां सुनी हैं। कई देखी भी हैं जो आज आजादा भारत के दौर में होते हैं, लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि कोई इंसान। कोई हाड़-मांस का बना युवा, बिना अन्न के, बिना पानी की एक बूंद पिए, पूरे 84 दिनों तक मौत के सामने सीना ताने खड़ा रह सकता है? आज मै आपको देवभूमि के एक ऐसे क्रांतिकारी की दास्तान बताने जा रहा हूं जिसकी उम्र मात्र 29 साल थी, लेकिन उसका हौसला हिमालय से भी ऊंचा था। एक ऐसा वीर, जिसे झुकाने के लिए क्रूर राजा और अंग्रेजी हुकूमत ने उसके पैरों में भारी लोहे की बेड़ियां डाल दीं, उसे कालकोठरी में बंद कर दिया, और जब उसने माफी मांगने से इनकार कर दिया, तो उसके खाने में जानबूझकर रेत और पिसा हुआ कांच मिलाया गया! लेकिन उस महामानव ने तड़प-तड़प कर जान दे दी, पर अपना ईमान नहीं बेचा। नाम था—श्रीदेव सुमन! आज आजादी के जश्म में चलिए एक बार फिर श्रीदेव सुमन के याद करते हैं। “25 मई 1916 को टिहरी गढ़वाल के बमूंड पट्टी के जौल गांव में एक लड़के का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया श्रीदत्त बडोनी, जो आगे चलकर इतिहास में ‘श्रीदेव सुमन’ के नाम से अमर हुए। उस दौर में देश जहां अंग्रेजों की गुलामी से लड़ रहा था, वहीं टिहरी की जनता दोहरी गुलामी झेल रही थी—एक तरफ अंग्रेज थे, तो दूसरी तरफ टिहरी के राजाओं की क्रूर राजशाही।

जनता पर भारी टैक्स थपे जाते थे, उन्हें बोलने की आजादी नहीं थी। मात्र 14 साल की उम्र में श्रीदेव सुमन नमक सत्याग्रह में कूद पड़े और उन्हें 15 दिन की जेल हुई। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वे टिहरी की जनता को इस दमनकारी शासन से मुक्त कराकर रहेंगे और उन्होंने ‘टिहरी राज्य प्रजामंडल’ की स्थापना कर सीधे राजा के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। दोस्तो, श्रीदेव सुमन की बढ़ती लोकप्रियता से राजा का सिंहासन डोलने लगा। 27 दिसंबर 1943 को जब वे टिहरी आ रहे थे, तो उन्हें सीमा पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। 30 दिसंबर को उन्हें टिहरी जेल की एक ऐसी कालकोठरी में डाल दिया गया, जहाँ सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंचती थी। और दोस्तो जेलर और सिपाहियों को निर्देश था कि सुमन को इतना प्रताड़ित करो कि वो माफीनामा लिख दे, उनके पैरों में पूरे 20 किलो की भारी लोहे की बेड़ियां डाल दी गईं, जिससे उनके पैर लहूलुहान हो गए। उन्हें हर दिन कोड़ों से पीटा जाता था। क्रूरता की हद तो तब पार हो गई, जब भूखे-प्यासे सुमन को जो खाना दिया जाता, उसमें जानबूझकर भारी मात्रा में रेत और पिसा हुआ कांच मिला दिया जाता था, ताकि उनकी अंतड़ियां कट जाएं। लेकिन सुमन ने वो खाना छूने से भी मना कर दिया।

दोस्तो इस अमानवीय व्यवहार और राजशाही के अत्याचार के खिलाफ श्रीदेव सुमन ने 3 मई 1944 से अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू किया। उन्होंने कसम खाई कि जब तक राजा प्रजामंडल को मान्यता नहीं देता और जेल में जुल्म बंद नहीं होते, वे अन्न और जल का त्याग करेंगे। दोस्तो अब दिन बीतते गए। 10 दिन हुए, 30 दिन हुए, 50 दिन हुए! सुमन का सोने जैसा शरीर अब सिर्फ हड्डियों का ढांचा बन चुका था। राजा के नुमाइंदे हर दिन जेल में आते और कहते— ‘सुमन, सिर्फ एक कागज पर दस्तखत कर दो कि तुम राजा के खिलाफ आंदोलन बंद कर दोगे, तुम्हें रिहा कर दिया जाएगा।’ लेकिन उस 29 साल के शेर का एक ही जवाब था—’तुम मेरा शरीर तोड़ सकते हो, मेरी आत्मा को नहीं झुका सकते।’

दोस्तो पूरे 84 दिनों तक बिना पानी की एक बूंद के, यह योद्धा सिर्फ अपने संकल्प के दम पर मौत से लड़ता रहा। दोस्तो आखिरकार 25 जुलाई 1944 की शाम को, भूख हड़ताल के 84वें दिन, इस महान राष्ट्रभक्त ने भारत मां की गोद में दम तोड़ दिया। दोस्तो सुमन शहीद हो चुके थे, लेकिन राजा का प्रशासन इस कदर डरा हुआ था कि उन्हें भय था कि अगर सुमन की लाश जनता के हाथ लग गई, तो पूरी रियासत में क्रांति की आग लग जाएगी। कायरता की सारी हदें पार करते हुए, रात के सन्नाटे में राजा के सिपाहियों ने श्रीदेव सुमन के पवित्र पार्थिव शरीर को एक बोरे में बंद किया, उसमें भारी पत्थर भरे और चुपके से उफनती हुई भिलंगना नदी में फेंक दिया, उन्होंने सोचा कि कहानी खत्म हो गई, लेकिन वे गलत थे। सुमन की इस शहादत ने पूरे उत्तराखंड में वो आग लगाई कि कुछ ही सालों में क्रूर राजशाही का हमेशा के लिए खात्मा हो गया। दोस्तो श्रीदेव सुमन ने कहा था, ‘यदि गंगा हमारी माता होकर भी हमें गुलाम देखना चाहती है, तो हम गंगा को भी पार कर जाएंगे।’ दोसतो आज स्वतंत्रता के इस जश्न में देवभूमि के इस अमर बलिदानी की अमर गाथा को हर घर तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य है। इस महान शहादत पर अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें और वीडियो को शेयर करें।