कौन था Rudraprayag का वो गुमनाम वीर? | Sher Singh Shah | Kedarnath | Uttarakhand News

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दोस्तो सोचिए, केदारनाथ की इसी घाटी से एक ऐसी आवाज उठी, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दे दी थी। मंदिर में देश की आजादी की कसम खाने वाला ये पहाड़ी नायक कौन था?जिसे अंग्रेजों ने सलाखों के पीछे डाल दिया, लेकिन बरेली जेल की कालकोठरी भी उसका हौसला नहीं तोड़ पाई। रुद्रप्रयाग के इस गुमनाम क्रांतिकारी की कहानी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस जज्बे की कहानी है, जिसने पहाड़ों में आजादी की चिंगारी को आंदोलन की आवाज बना दिया। आखिर कौन था वो वीर, जिसने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया? बताउंगा आपको आज आजादी के जश्न के बीच। दोस्तो जब साल 1942 में महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया, तो देश के तमाम बड़े नेताओं को जेलों में ठूस दिया गया। आंदोलन लगभग नेतृत्वविहीन हो चुका था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि केदारनाथ की उन दुर्गम पहाड़ियों, बर्फीली घाटियों और ऊंचे दर्रों में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की चिंगारी को किसने जिंदा रखा था? रुद्रप्रयाग के एक साधारण किसान परिवार का वो बेटा, जिसने ललित माई मंदिर में हाथ में गंगाजल लेकर कसम खाई थी कि जब तक इस देश से गोरों को खदेड़ नहीं दूंगा, चैन से नहीं बैठूंगा! वो पहाड़ी बीर का नाम है वीर शेर सिंह शाह! एक ऐसा भूमिगत नायक, जिसने अंग्रेजों की पूरी खुफिया पुलिस को महीनों तक पहाड़ों में नचा कर रख दिया था। दोस्तो, रुद्रप्रयाग जिले के नाला गांव में एक साधारण कृषक परिवार में शेर सिंह शाह का जन्म हुआ था। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद मजबूत बना दिया था। जब वे युवा हुए, तो देश में आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था।

दोस्तो शेर सिंह शाह के दिल में देशभक्ति का ऐसा ज्वार उठा कि उन्होंने घर-बार छोड़कर खुद को पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया। उन्होंने स्थानीय ललित माई मंदिर के गर्भगृह में जाकर संकल्प लिया कि वे ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और इसके खिलाफ गांव-गांव जाकर अलख जगाएंगे। दोस्तो साल 1942 में जब ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ, तो केदारनाथ घाटी (कासेर गड़ से लेकर बाड़माव तक) के दुर्गम इलाकों में संचार का कोई साधन नहीं था। ऐसे में शेर सिंह शाह क्रांतिकारियों के लिए सबसे बड़े ‘कम्युनिकेशन हब’ बन गए, वे पूरी तरह भूमिगत (Underground) हो गए। वे रातों-रात 20-30 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर एक गांव से दूसरे गांव पहुंचते, ब्रिटिश शासन विरोधी पर्चे बांटते और युवाओं की गुप्त बैठकें लेते, वे भेष बदलने में इतने माहिर थे कि कभी साधु तो कभी किसान बनकर ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने से क्रांतिकारियों के लिए रसद, हथियार और खुफिया संदेश निकाल ले जाते थे। अंग्रेजों की पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए पहाड़ों की खाक छान रही थी, लेकिन शेर सिंह शाह उनके हाथ नहीं आ रहे थे। लेकिन कहते हैं ना दोस्तो कि देशभक्तों का रास्ता कांटों से भरा होता है। आखिरकार अंग्रेजों की खुफिया पुलिस ने चारों तरफ से घेराबंदी करके शेर सिंह शाह को गिरफ्तार कर लिया, उन्हें पहले स्थानीय जेल में नजरबंद किया गया और फिर उत्तर प्रदेश की कुख्यात बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया गया। बरेली जेल में उन्हें जो यातनाएं दी गईं, वे रूह कंपा देने वाली थीं। कड़कड़ाती ठंड की रातों में उन्हें नंगा करके कोड़ों से पीटा जाता था, कई-कई दिनों तक भूखा-प्यासा रखा जाता था ताकि वे अपने भूमिगत साथियों के नाम उगल दें। अंग्रेज अफसर चिल्लाते थे—’बताओ, तुम्हारे साथ और कौन-कौन है?’ लेकिन शेर सिंह शाह के मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकलता था— ‘वंदे मातरम!’

दोस्तो उनके इरादे हिमालय से भी ऊंचे थे, जिन्हें ब्रिटिश टॉर्चर भी नहीं तोड़ पाया। दोस्तो सालों की जेल काटने के बाद जब देश आजाद हुआ, तो शेर सिंह शाह वापस अपनी केदारघाटी लौट आए। उन्होंने कभी अपनी देशभक्ति का ढिंढोरा नहीं पीटा और एक साधारण जीवन जीने लगे, आजादी के रजत जयंती वर्ष यानी साल 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भारत सरकार ने उनकी अप्रतिम वीरता को स्वीकार करते हुए उन्हें ‘ताम्रपत्र’ देकर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया। और दोस्तो साल 1991 में केदारघाटी का यह शेर हमेशा के लिए शांत हो गया, लेकिन उनका त्याग आज भी मंदाकिनी की लहरों की तरह देवभूमि के युवाओं के दिलों में गूंजता है। दोस्तो शेर सिंह शाह जैसे वीरों की बदौलत ही आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन मौके पर केदारनाथ घाटी के इस अनसुने महानायक को हमारा कोटि-कोटि नमन।