Dushyant Gautam के विवादित बयान से बवाल! । Rahul Gandhi । BJP । Congress

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राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले आखिर ऐसा क्या हो गया कि राज्य की सियासत अचानक गर्मा गई? क्यों पूर्व सैनिकों को लेकर भी बयानबाज़ी तेज हो गई और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई? क्या यह सिर्फ एक सामान्य दौरा है या फिर इसके पीछे छिपा है कोई बड़ा सियासी संदेश? राहुल गांधी के दौरे को लेकर कांग्रेस जहां पूरी तैयारी में जुटी है, वहीं विपक्ष के तीखे हमलों ने माहौल को और गरमा दिया है। आखिर क्यों इस दौरे से पहले ही सियासी बवाल शुरू हो गया है? देखिए हमारी यह खास रिपोर्ट। उत्तराखंड में राहुल गांधी के दौरे से पहले सियासी पारा चढ़ गया है। एक ओर कांग्रेस राहुल गांधी के कार्यक्रमों को लेकर उत्साहित नजर आ रही है, तो वहीं बीजेपी ने उन पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें “सैनिक विरोधी” करार दिया है। सैनिकों के सम्मान और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर दोनों दल आमने-सामने आ गए हैं। सवाल यह है कि राहुल गांधी के दौरे से पहले आखिर ऐसी क्या वजह है कि सियासत में जुबानी जंग छिड़ गई है? देखिए यह रिपोर्ट। दोस्तो तो क्या राहुल के उत्तराखंड दौरे से क्यों घबराई बीजेपी? क्या कांग्रेस को मिलेगा राजनीतिक ऑक्सीजन? आखिर क्यों राहुल गांधी के दौरे पर मचा है सियासी संग्राम। दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर राहुल गांधी की एंट्री ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। 2027 विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राहुल गांधी का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा साफ संकेत दे रहा है कि कांग्रेस अब चुनावी जमीन तैयार करने में जुट गई है। अल्मोड़ा में जनसभा, पौड़ी में पूर्व सैनिकों के साथ संवाद और देहरादून में कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों से मुलाकात—यह सिर्फ एक दौरा नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है अब कांग्रेस तैयार है। दोस्तो क्या यही वजह है कि राहुल गांधी के पहुंचने से पहले ही बीजेपी ने मोर्चा खोल दिया है। मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व सैन्य अधिकारी और बीजेपी नेता अजय कोठियाल तक, सभी राहुल गांधी को सैनिकों के मुद्दे पर घेरने में जुटे हैं। सवाल है कि आखिर बीजेपी का निशाना राहुल गांधी ही क्यों हैं?

दरअसल दोस्तो अपने उत्तराखंड को वीरभूमि कहा जाता है राज्य के हजारों परिवार सीधे तौर पर सेना से जुड़े हैं। ऐसे में सैनिकों और पूर्व सैनिकों का मुद्दा यहां सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद प्रभावशाली है। बीजेपी राहुल गांधी के पुराने बयानों—सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और सेना से जुड़े विवादों—को फिर से सामने लाकर ये संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस सैनिकों के मुद्दे पर भरोसेमंद नहीं है इसलिए बीजेपी राहुल गांधी को बीजेपी वाले सैनिक विरोध बता रहे हैं। वहीं दोस्तो दूसरी तरफ कांग्रेस इस दौरे को बिल्कुल अलग तरीके से पेश कर रही है। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी सैनिकों का सम्मान करने, युवाओं के रोजगार, अग्निवीर योजना और प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों को उठाने आ रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गांधी की मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा आएगी और पार्टी के भीतर जो सुस्ती दिखाई दे रही थी, वह टूटेगी और कर्नल कोठियाल और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोदियाल के बीच एक अलग तरह की जंग चल पड़ी है। दोस्तो अब बात सियासी संग्राम से थोड़ा हट कर दोस्तो राजनीतिक नजर से देखें तो राहुल गांधी का यह दौरा कांग्रेस के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, पार्टी संगठन को संदेश देना कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को गंभीरता से ले रहा है। दूसरा, बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले कुमाऊं क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना। तीसरा, अग्निवीर योजना और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर युवाओं के बीच संवाद बढ़ाना। लेकिन यहां दोस्तो चुनौती भी कम नहीं है। उत्तराखंड में पिछले कई चुनावों में बीजेपी ने राष्ट्रवाद, सेना और मजबूत नेतृत्व के मुद्दों पर बढ़त बनाई है, ऐसे में राहुल गांधी के लिए केवल भीड़ जुटाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसा राजनीतिक संदेश देना होगा जो स्थानीय जनता, युवाओं और पूर्व सैनिकों के बीच प्रभाव छोड़ सके। इधर दोस्तो बीजेपी की बेचैनी का एक कारण ये भी माना जा सकता है कि राहुल गांधी अब पहले की तुलना में अधिक आक्रामक विपक्षी नेता के रूप में दिखाई दे रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है और कांग्रेस उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के प्रमुख चुनौतीकर्ता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। दोस्तो अब नजरें अल्मोड़ा रैली और पौड़ी के पूर्व सैनिक सम्मेलन पर टिकी हैं। अगर दस्तो राहुल गांधी बड़ी भीड़ जुटाने और स्थानीय मुद्दों को मजबूती से उठाने में सफल रहते हैं, तो कांग्रेस को राजनीतिक ऊर्जा मिल सकती है। वहीं यदि बीजेपी सैनिकों और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जनमत को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल रहती है, तो राहुल गांधी का दौरा केवल एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम बनकर रह सकता है। फिलहाल इतना तय है दोस्तो कि राहुल गांधी के उत्तराखंड पहुंचने से पहले ही सियासी जंग शुरू हो चुकी है। कांग्रेस इसे वापसी की शुरुआत बताने में लगी है, जबकि बीजेपी इसे चुनावी अवसरवाद साबित करने में जुटी है। फैसला अंततः जनता को करना है कि वह इस दौरे को राजनीतिक बदलाव की दस्तक मानती है या फिर चुनावी रणनीति का हिस्सा।