मां का इंतजार आखिर हुआ खत्म!| | The Rajneeti | Pithoragarh News | Bageshwar | Viral News | Trending

Spread the love

क्या कोई मां अपने बेटे की आवाज 46 साल बाद भी पहचान सकती है? क्या चार दशक से ज्यादा समय का बिछड़ना मां-बेटे के रिश्ते को कमजोर कर सकता है? और क्या सचमुच एक आवाज ने 46 साल पुरानी दूरी को पलभर में मिटा दिया? मै आपको इस मां- बेटे के अद्भुत मिलन को दिखाउंगाआपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो उत्तराखंड से सामने आई यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। एक मां, जिसने अपने बेटे के लौटने की आस कभी नहीं छोड़ी और एक बेटा, जो 46 साल बाद बाबा के भेष में अपने घर पहुंचा। घर के आंगन में जैसे ही उसकी आवाज गूंजी, 85 वर्षीय मां ने बिना एक पल गंवाए उसे पहचान लिया। इसके बाद जो हुआ, उसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। वर्षों का इंतजार, अनगिनत यादें और मां-बेटे का मिलन, ऐसा भावुक दृश्य जिसने हर किसी का दिल छू लिया। आखिर कैसे बिछड़ा था बेटा, कहां रहा इतने साल और कैसे हुआ यह चमत्कारिक मिलन? उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसे पढ़कर शायद ही किसी की आंखें नम होने से बचें। यह कहानी है एक मां के अटूट विश्वास, इंतजार और ममता की, जिसने पूरे 46 वर्षों तक अपने बेटे की राह देखी और आखिरकार उसे पहचान भी लिया। पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले की अंतिम सीमा पर स्थित बेरीनाग क्षेत्र के ग्राम पंचायत पौषा पोस्ताला के दौलीगाड़ गांव में 85 वर्षीय नंदी देवी का अपने बिछड़े बेटे से 46 साल बाद मिलन हुआ। जिस बेटे को परिवार ने दशकों पहले खो दिया था, वह एक साधु के वेश में भिक्षा मांगते हुए अपनी मां के दरवाजे पर पहुंचा और मां ने उसे उसकी आवाज से पहचान लिया।

दरअसल दौलीगाड़ गांव निवासी तारा दत्त उपाध्याय का बेटा बुद्धि बल्लभ उपाध्याय मात्र 15 वर्ष की उम्र में अचानक घर से लापता हो गया था। परिवार ने उसे खोजने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। समय बीतता गया, वर्ष 2005 में पिता तारा दत्त उपाध्याय का भी निधन हो गया, लेकिन मां नंदी देवी ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। वह हमेशा गांव वालों और रिश्तेदारों से कहती थीं कि अगर कहीं उनका बेटा दिखाई दे तो उन्हें जरूर बताएं। बेटे की राह देखते-देखते उनकी उम्र 85 वर्ष हो गई, लेकिन मां का विश्वास कभी नहीं टूटा कि एक दिन उसका बेटा जरूर लौटेगा। दोस्तो एक साधु भिक्षा मांगते हुए नंदी देवी के घर पहुंचा। मां ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह कुछ पल उसे निहारती रहीं। फिर अचानक उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने उस साधु को अपने बेटे बुद्धि बल्लभ के रूप में पहचान लिया और उसे गले लगाकर फफक-फफक कर रो पड़ीं। यह दृश्य देखकर साधु बने बेटे की आंखें भी नम हो गईं। मां और बेटे के इस मिलन को देखकर आसपास के ग्रामीण और परिवार के सदस्य भी भावुक हो उठे। हर किसी की आंखों में आंसू थे और दिल में एक ही भावना थी कि आखिरकार 46 वर्षों का इंतजार खत्म हो गया। दोस्तो बुद्धि बल्लभ ने बताया कि घर छोड़ने के बाद उन्होंने ट्रकों और अन्य वाहनों में काम किया। बाद में उनका रुझान धार्मिक जीवन की ओर बढ़ गया और वह विभिन्न मंदिरों में रहने लगे। हरिद्वार से होते हुए वह राजस्थान के बीकानेर पहुंचे, जहां एक मंदिर में रहकर उन्होंने साधु जीवन अपना लिया। इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर बुद्धनाथ रख लिया और अपना पता भी हिमाचल प्रदेश का बताने लगे। वर्तमान में उनकी जटाएं 12 फीट से अधिक लंबी हैं। उन्होंने बताया कि परंपरा के अनुसार साधु बनने के बाद मां के हाथों से भिक्षा लेना आवश्यक माना जाता है, इसी कारण वह अपने पैतृक घर पहुंचे थे। दोस्तो घर पहुंचने के बाद बुद्धि बल्लभ उर्फ बुद्धनाथ ने अपने पिता, भाई, चाचा और ताऊ के बारे में जानकारी ली। बेरीनाग से उनके चचेरे भाई आनंद बल्लभ उपाध्याय भी परिवार सहित उनसे मिलने पहुंचे, जिन्हें उन्होंने तुरंत पहचान लिया। दोनों ने घर छोड़ने से पहले की कई पुरानी यादें भी साझा कीं। गांव में जैसे ही यह खबर फैली, बड़ी संख्या में ग्रामीण उनसे मिलने पहुंचे और बाबा के रूप में उनका आशीर्वाद लिया। बुद्धनाथ ने बताया कि वह अभी कुछ दिन अपनी मां के साथ रहेंगे और उसके बाद वापस बीकानेर लौट जाएंगे। 46 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद मां और बेटे के इस मिलन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दुनिया में मां की ममता से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता और उसकी उम्मीदें कभी नहीं मरतीं।